यों ही ध्वस्त नहीं हुआ ममता बनर्जी का साम्राज्य, हिंदुओं के प्रति निर्ममता बनी पतन की वजह
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यों ही ध्वस्त नहीं हुआ ममता बनर्जी का साम्राज्य, हिंदुओं के प्रति निर्ममता बनी पतन की वजह

ममता दीदी का साम्राज्य ध्वस्त करने में बड़ी भूमिका निभाई हिंदू समाज में आई जागृति ने।

Written byराजेश शांडिल्यराजेश शांडिल्य
May 7, 2026, 01:09 pm IST
inमत अभिमत, पश्चिम बंगाल

फिल्मों, लोकगीतों और धार्मिक आयोजनों में बरसों से एक पंक्ति गूंजती रही है, जय काली कलकत्ते वाली, तेरा वचन न जाए खाली… कभी कलकत्ता और अब कोलकाता ही नहीं,बल्कि पूरे पश्चिम बंगाल के जिला,तहसील,गांवों में बसे हिंदू समाज के लिए 4 मई ममता गई से ज्यादा ,नया सवेरा जैसा महसूस किया जा रहा है।

कभी इसी कोलकाता से पूरे पश्चिम बंगाल का नियंत्रण ममता बनर्जी के हाथ में था, मगर ममता दीदी का साम्राज्य ध्वस्त करने में बड़ी भूमिका निभाई हिंदू समाज में आई जागृति ने। सब जानते हैं कि पश्चिम बंगाल सिर्फ संस्कृति, साहित्य और कला की धरती भर नहीं रहा, बल्कि लंबे अर्से से तीखी राजनीतिक और धार्मिक विवादों का कुरुक्षेत्र बन चुका था।

बंगाल की राजनीति में लंबे समय से एक ऐसा माहौल बना, जब सनातनी संगठन और हिंदू समाज का बड़ा वर्ग खुद को उपेक्षित, दबाव और भय के वातावरण में खुल कर बात करने से भी कतराता रहा। खासकर उन इलाकों में, जहां मुस्लिम आबादी अधिक है, वहां त्योहारों, शोभायात्राओं और धार्मिक आयोजनों को लेकर विवाद लगातार सुर्खियों में रहे। चुनाव से पहले सोशल मीडिया और कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ऐसी कई तस्वीरें और वीडियो सामने आए, जिनमें स्थानीय लोग प्रशासन पर पक्षपात के आरोप लगाते दिखाई दिए। हालांकि इन दावों का दूसरा पक्ष भी मौजूद रहा, लेकिन बहस लगातार तेज होती गई।

इसी बीच मुख्यमंत्री ममता दीदी की राजनीति भी चर्चा के केंद्र में रही। कुशल और कुटिल राजनेत्री होने के चलते उन्होंने 2021 के चुनावी माहौल का गणित समझ लिया था। बाजी भाजपा के पक्ष में जाते देख उन्होंने मार्च 2021 में वह पूजा की धुनी में रमी हुई नजर आई। इस दौरान शायद ममता दीदी ने पहली बार खुले मंच से खुद को ब्राह्मण और शांडिल्य गोत्र उजागर किया।

भाजपा 2021 में ही बड़ा उलट फेर करने की स्थित में दिख रही थी, लेकिन ममता बैनर्जी की हिंदू मतदाताओं को साधने की कोशिश सफल रही। हालांकि ममता के राजनीतिक विरोधियों ने आरोप लगाया था कि यह चुनावी रणनीति है। भाजपा और अन्य विरोधी दल लगातार यह कहते रहे कि चुनाव के दौरान हिंदू पहचान की बात करने वाली दीदी, चुनाव जीतने के बाद फिर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति पर लौटेगी और हुआ भी वही। 4 मई के चुनावी नतीजों ने यह सिद्ध किया कि पश्चिम बंगाल में इस बार स्थिति मत चूको चौहान जैसी थी, धार्मिक ध्रुवीकरण ने ममता दीदी से ना केवल सीएम की कुर्सी छीनी,बल्कि उन्हें भी पराजित करते हुए सीटों का आंकड़ा तीन अंकों तक भी पहुंचने नहीं दिया,जबकि जिनका आंकड़ा दो अंकों में था उन्हें 200 पार पहुंचा दिया।

चुनावी नतीजों के बाद आसनसोल की एक तस्वीर अचानक पूरे सोशल मीडिया पर छा गई। यहां हिंदू आस्था से जुड़े एक धार्मिक स्थल पर लंबे समय से ताला लगा था। स्थानीय लोगों का दावा था कि अदालत के आदेश के बावजूद मंदिर नहीं खुल सका था। चुनावी हार के बाद बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंचे और जयघोष करते हुए ताला खोल दिया। यह दृश्य देखते ही देखते पश्चिम बंगाल की बदली हुई राजनीति का प्रतीक बन गया। दरअसल बंगाल अब सिर्फ वामपंथ बनाम तृणमूल या भाजपा बनाम तृणमूल की लड़ाई तक सीमित नहीं रह गया है। यहां पहचान, आस्था और राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई खुलकर सामने आई। एक वर्ग इसे हिंदू समाज की जागृति बता रहा है, तो दूसरा वर्ग इसे खतरनाक धार्मिक ध्रुवीकरण मान रहा है। सवाल सिर्फ चुनावी हार जीत का नहीं है। सवाल उस बदलते बंगाल का है, जहां कभी दुर्गा पूजा, काली पूजा और सूफी परंपरा साथ साथ चलती थी, लेकिन अब राजनीतिक भाषणों, नारों और सोशल मीडिया की लड़ाइयों ने समाज को नए खांचों में बांटना शुरू कर दिया है। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि बंगाल अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाए रख पाएगा या राजनीति की आग उसे और ज्यादा विभाजित कर देगी।

Topics: Mamata BanerjeetmcHindu Vote Bank in BengalBengal Politics Latest NewsBJP victory in West BengalHindu awakening in West BengalMamata Banerjee political setbackBJP vs TMC West BengalBJP
राजेश शांडिल्य
राजेश शांडिल्य
वरिष्ठ पत्रकार [Read more]
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