पश्चिम बंगाल धीरे सांस्कृतिक आत्मविस्मृति के दौर में चला गया था ,जहां से इस विधानसभा चुनाव के बाद उसके क्षितिज और परिसर में “कमल ” खिल गया है। इसलिए विश्वास है कि बंगाल अपने गौरव और मानवीय धरातल को हासिल कर विकास के नये कीर्तिमान स्थापित करेगा, जिसे उसने खो दिया था। जहां लिथड़ रही थी करुणा और सहानुभूति, जहां बंगलियों का भद्रलोकी समाज ममता बनर्जी का बंधक बन कर रह गया थ।
सनातनी विचारों की विधायी विजय
इसे समझना सचमुच कठिन है कि जिस लोकतान्त्रिक गुलाल और अबीर के जनमतों से चुनी जाती सरकारें कैसे हिंसा अराजकता और अधिनायकवाद क़ी गिरफ्त में आ जाती हैं और झेलना पड़ता है असहाय जनता को। यह भयाक्रांत लोगों के भावों की नयी वर्णमाला की विजय है। यह सनातनी विचारों की विधायी विजय है। इस विजय का अर्थ उन आंखों से पूछो, जिनमें न्याय के बजाय ताकत का काला धुआं भर दिया गया था। फिर वह 2021 की हिंसा से हो या सन्देशखाली के ज़ख्म, अथवा महिलाओं के साथ हर कहीं ज्यादिती का मसला हो, गांवों से शहर तक सिर्फ और सिर्फ परिवर्तन की आवाज थी। यही वजह है भवानीपुर से ममता बनर्जी स्वयं 15000 वोटों से ज्यादा से हार गईं।
विजय के संकल्प से लड़ा गया चुनाव
यह चुनाव बेहद गंभीरता और विजय की संकल्पबद्धता से लड़ा गया। भाजपा ने महीन से महीन चुनावी रणनीति पर नजर रखी।समिक भट्टाचार्य को प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष को सक्रिय किया। समिक अटल -आडवाणी दौर के समर्पित हैं, उन्होंने कोलकाता और उपनगरीय भद्रलोक को जोड़ा। ध्रुवीकरण, गुंडागर्दी और सरकार से नाराज़ी ने दक्षिण बंगाल से टीएमसी के पैर उखाड़ दिए। जंगल महल जनजातीय बेल्ट में आवास-पानी जैसे मुद्दों ने टीएमसी को गूंगा बना दिया। नतीजतन भाजपा 40 में से 36 सीटें निकाल ले गयी।
हुगली किले पर ममता बनर्जी को था गुमान
दक्षिण बंगाल के हुगली किले पर ममता को बड़ा गुमान था ,वहां की 18 में से 16 सीटों पर भाजपा ने टीएमसी को शिकस्त दी। यहां सीमावर्ती हिन्दू और मतुआ वोट निर्णायक रहे। यह परिणाम अचानक नहीं आया, इसकी रणनीति और श्रेय गृहमंत्री अमित शाह और उनकी टीम को जाता है। इसमें विप्लव देव भी थे और सुनील बंसल भी, धर्मेंद्र प्रधान भी और भूपेंद्र यादव भी। किसी के पास जातीय संतुलन का काम था तो किसी के पास माइक्रो मैनेजमेंट का, किसी के जिम्मे कार्यकर्ताओं का नेटवर्क और आंतरिक मतभेदों को दूर करने की जिम्मेदारी थी। इसमें पुराने समर्पितों और नए लोगों की ऊर्जा का समावेश था।
भाजपा को साम्प्रदायिक कहना गलत
यह कहना निहायत एकांगी राजनीतिक विमर्श है कि भाजपा का विस्तार महज साम्प्रदायिकता की धुरी पर होता है। कैसे कह सकते हैं यह बात जब बंगाल में दो तिहाई बहुमत हासिल करती पार्टी, तमिलनाडु में अपनी उपस्थिति का एहसास कराती पार्टी और 2014 से 2026 तक में 76 फीसदी क्षेत्र पर अपनी विचारधारा को स्थापित कर देने वाली पार्टी कैसे साम्प्रदायिकता के आरोप में घेरी जा सकती है। यह सिर्फ आरोपों को उछालकर अपनी पराजय से मुंह मोड़ना है। इन चुनावों के परिणामों ने द्रमुक और टीएमसी के उग्रवाद को दफना दिया है।
एक परजीवी राजनीतिक दल है कांग्रेस
इसी बीच कांग्रेस कहीं अपनी जगह और ज़मीन तलाश कर रही थी और जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते रहे हैं कि कांग्रेस एक परजीवी राजनीतिक दल है। इसलिए उसे परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप में गहरा सदमा लगना चाहिए। शायद यह इसलिए अखिलेश यादव और राहुल गांधी की पराजय की घोषणा के बाद टीएमसी की भी पीठ में गुड़ मसलने के लिए फोन घनघनाने लगे। अब तक इनके राजनीतिक उपले इन्हें जरूरी ऊष्मा नहीं दे पा रहे थे, तो यह भाजपा को हिंदी पट्टी की पार्टी बताते हुए नहीं अघाते थे। इस चुनाव ने बताया कि बिना अपनी अवधारणा को तोड़े हुए भी क्षेत्रीय दूरियों को नजदीकियों में और नजदीकियों को आत्मीयता में बदला जा सकता है। यह परिणाम क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए भी चुनौती हैं और उन्हें आगाह भी करते हैं कि वे सदैव अजेय नहीं हैं।
महिलाओं ने विपक्षी दलों को दी सजा
मोदी का विकास, राष्ट्रगौरव और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ उनकी गारंटी किसी भी क्षत्रप प्रभावमंडल पर भारी है। विपक्षी दलों को समझना होगा कि हर राज्य में महिलाओं ने उनकी करतूतों की सजा उन्हें दी है। महिला आरक्षण बिल पर उनके रवैये ने विशेषकर संसद के तीन दिवसीय विशेष अधिवेशन में उनकी रूखी और टीका-टिप्पणियों ने उन्हें यह दिन दिखाया। रही बात केरल की तो वहां जनता वामपंथ से आजिज आ चुकी थी, इसलिए कांग्रेस को लाभांश मिल गया, वरना वहां भी नतीजा कुछ और होता। बेरोज़गारी, उद्योगों की कमी और दानव की तरह बढ़ते भ्रष्टाचार को ममता बहानेबाजी और कुतर्कों से छुपा नहीं पायीं। पंद्रह साल में ममता ने बंगाल को कोमा में पहुंचा दिया। ये सारी वजहें हैं जिसने पूर्वी मिदनापुर की सभी सोलह सीटों पर टीएमसी को शिकस्त मिली।
मतुआ समुदाय ने दिया भाजपा का साथ
इसी तरह दार्जिलिंग, कलिंगपोंग, जलपाईगुड़ी में भी भाजपा का परचम लहराया । दो हजार इक्कीस तक झाड़ग्राम टीएमसी के कब्जे में था, वहां की सभी चार और पुरुलिया की सभी नौ सीटों पर भाजपा को विजय हासिल हुई। ठीक इसी तरह मतुआ समुदाय ने एसआईआर की वजह से अनेक नामों के घट जाने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी में अपना भरोसा बरकरार रखा और ममता ने इस बार का चुनाव 2021 की तरह ही लड़ा। वे कहती रहीं कि सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं वे जितना यह सब कहती रहीं उतनी उनकी दुर्गति होती चली गई। प्रशासन और आम आदमी के बीच टूट गए संपर्क को वह देख ही नहीं पा रहीं थीं ।
हिंसक भाषा से सरकने लगी ममता की सत्ता
2011 में जब बंगाल ने 34 वर्ष के वामपंथी शासन के बाद ममता को अवसर दिया , तो उसे बदलावी प्रतीक मानकर अवसर दिया गया था ,लेकिन वे धीरे-धीरे शाब्दिक क्षय से ग्रस्त होने लगीं। तोलाबाज़ी, कटमनी, सिंडिकेट के बाद उपजी हिंसक भाषा से उनकी सत्ता सरकने लगी। उन्हें अनुमान भी नहीं हुआ। आखिर कैसे जयश्री राम का उद्घोष, तुष्टिकरण के विरुद्ध सुदृढ़ प्रतिकार में बदल गया? वह भी ऐसे राज्य में जो सांस्कृतिक स्मृति के साथ चलता है। इसी चुनाव ने साबित किया कि मुस्लिम मतदाताओं के अंकगणित को समझाते हुए अनेक विमर्श गढ़े गए ,लेकिन वे सभी आधारहीन साबित हुए। पहले भी यूपी, बिहार, असम के चुनावों में ये विमर्श बहस में आए जिसे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति की मेड़ों पर रहने वाले चलाते आए लेकिन गलत साबित हुए। इस बार भी जो और जितने लोग बंगाल चुनाव को संघर्षपूर्ण या कांटे के टक्कर बता रहे थे, उनकी नजर में भी मुस्लिम अंकगणित था। ममता खुद उहापोह में थीं कि जय श्री राम के नारे लगाने वालों के साथ सख्ती से निपटें या दुर्गा पूजा की इमदाद पर हिंदू विरोध को शांत कर लिया जाए। हालांकि उन्होंने अपनी तुष्टिकरण की नीति में कोई बदलाव नहीं किया। उन्हें पक्का भरोसा था कि उनकी नाव मुस्लिम ही पार लगा सकते हैं।
ममता का झुंझलाना अप्रत्याशित नहीं
ममता का खिसियाना, झुंझलाना, प्रलाप करना और आरोप लगाना इसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है। उनके हाथों से बंगाल छूटा, जिसके दम पर वे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की अगुवाई करना चाह रही थीं। इतना ही नहीं, भाजपा के समानांतर राजनीतिक विमर्श भी खड़ा करने की अतिमहत्वकांक्षी हसरत और से ग्रस्त और त्रस्त थीं। इसलिए वे स्टालिन-राहुल गांधी जैसे राजनेताओं के संपर्क में रहीं और अब भी वे इसी रस्सी पर चलने का प्रयास करेंगी। बिना यह समझे कि भाजपा सिर्फ एक राजनीतिक दल ही नहीं है, एक विचारधारा भी है। खैर, उनसे समझने की उम्मीद बेकार है। उन्होंने तो पूछा था अमित शाह कौन है? उन्होंने कहा था, मैं पार्टी का छोटा सा कार्यकर्ता हूं जो तृणमूल कांग्रेस को उखाड़ फेंकने आया है।

















