गत 29 अप्रैल को राजगीर (नालंदा) में प्रमुख जन संगोष्ठी आयोजित हुई। इसके मुख्य वक्ता थे राष्ट्रीय स्वयेसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख श्री स्वांत रंजन। उन्होंने कहा कि भारत और राष्ट्रीयता हमारे लिए न तो कोई आर्थिक विषय है और न ही राजनीतिक; यह किसी एक भाषा से निर्मित राष्ट्र भी नहीं है।
इस राष्ट्र का वास्तविक आधार हमारी संस्कृति, हमारे संस्कार और हमारे भीतर की आत्मीयता है। यह भाव तब प्रकट होता है जब भुज में भूकंप आता है और पूरा देश सहायता के लिए खड़ा हो जाता है। अथवा जब केदारनाथ में मन्दाकिनी फटती है तो देश के कोने-कोने से लोग पहुंचकर सेवा करते हैं।
चंद्रयान के चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर पहुंचने पर पूरे देश को एक साथ उल्लास से भर देता है और यही भावना क्रिकेट टीम के विश्व कप जीतने पर हर भारतीय के मन में झलकती है। उन्होंने कहा कि भारत की एकात्म चेतना नई नहीं है। इसे भारतीय इतिहास में भी देखा जा सकता है-शंकर देव हों या गुरुनानक देव, दोनों ने भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक भ्रमण किया। उन्हें भाषाई बाधाओं ने कभी नहीं रोका।
शंकराचार्य जब केरल से निकलकर देश की चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना कर रहे थे, तब भाषा उनके मार्ग में अवरोध नहीं बनी। यही इस राष्ट्र की मूल भावना है-एक संस्कृति, एक आत्मा और एक साझा अनुभूति। उन्होंने अपने उद्बोधन में ‘पंच परिवर्तन’ की संकल्पना को विस्तार से समझाया। उनका कहना था कि वास्तविक परिवर्तन का आरंभ हमेशा स्वयं से होता है। स्वयं में आए परिवर्तन से परिवार में परिवर्तन आता है।
परिवार का परिवर्तन समाज में और समाज का परिवर्तन राष्ट्र में प्रवाहित होता है। राष्ट्र के स्तर पर यह परिवर्तन संपूर्ण सृष्टि को प्रभावित करता है और अंततः यह परिवर्तन परमेष्ठी तक पहुंचता है। इस अवसर पर प्रांत प्रचारक श्री उमेश कुमार, विद्या भारती के क्षेत्र संगठन मंत्री श्री ख्याली राम, विभाग कार्यवाह श्री मुरारी, विभाग प्रचारक श्री इन्द्रनारायण समेत कई गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति रही।

















