भारत ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में वह असाधारण उपलब्धि हासिल कर ली है, जिसे पाने के लिए अमेरिका, फ्रांस और जापान जैसे विकसित देश अरबों डॉलर खर्च करने के बाद भी असफल रहे। तमिलनाडु के कल्पक्कम में स्थित 500 मेगावाट प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) ने 6 अप्रैल 2026 को पहली बार ‘क्रिटिकलिटी’ हासिल कर ली। यानी रिएक्टर ने पहली बार नियंत्रित तरीके से खुद से चलने वाली न्यूक्लियर चेन रिएक्शन शुरू कर दी है।
इस तकनीक को विकसित करने के लिए अमेरिका ने 15 अरब डॉलर, जापान ने 12 अरब, ब्रिटेन ने 8 अरब और जर्मनी ने 6 अरब डॉलर खर्च कर दिए। लेकिन मनमाफिक सफलता न मिलने के कारण एक-एक करके इन सभी देशों ने प्रोजेक्ट बीच में ही छोड़ दिया। उधर भारत ने महज 90 करोड़ डॉलर में अपना पहला प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विकसित कर लिया है, जो वैश्विक मानकों की तुलना में अत्यंत किफायती है। जहां फ्रांस का अंतरराष्ट्रीय ताप-नाभिकीय प्रायोगिक रिएक्टर 2000 करोड़ डॉलर से अधिक की लागत वाला है और कई देशों के बड़े परमाणु संयंत्र 500 से 1000 करोड़ डॉलर प्रति यूनिट तक पहुंच जाते हैं, वहीं भारत ने इतनी जटिल और उन्नत तकनीक को अपेक्षाकृत बहुत कम लागत में विकसित कर एक आत्मनिर्भर और किफायती इंजीनियरिंग मॉडल प्रस्तुत किया है।
तमिलनाडु के कल्पक्कम स्थित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) ने “प्रथम क्रिटिकलिटी” हासिल कर ली है, यानी इसमें नियंत्रित और सतत परमाणु विखंडन श्रृंखला अभिक्रिया सफलतापूर्वक शुरू हो चुकी है। इस उपलब्धि को वैज्ञानिकों ने “अक्षय पात्र क्षण” कहा है, यानी एक ऐसा स्रोत जो लगातार 700 सालों तक ऊर्जा का सृजन करता रहेगा। 6 अप्रैल 2026 को रात 8:25 बजे, 500 मेगावाट क्षमता वाले इस अत्याधुनिक रिएक्टर ने यह ऐतिहासिक अवस्था प्राप्त की, जब इसमें नाभिकीय श्रृंखला अभिक्रिया (न्यूक्लियर चेन रिएक्शन) सफलतापूर्वक प्रारंभ हो गई और यह परमाणु रिएक्टर स्वयं नियंत्रित रूप से ऊर्जा उत्पन्न करने लगा। यह उपलब्धि भारत के परमाणु इतिहास में एक बड़ा मोड़ है। कल्पक्कम में स्थापित यह रिएक्टर पूरी तरह स्वदेशी है।
चंद्रयान भी मिसाल
भारत की वैज्ञानिक पहचान आज केवल बड़ी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि कम लागत में विश्वस्तरीय परिणाम देने की अपनी विशिष्ट कार्यसंस्कृति से बन रही है। जिस प्रकार देश ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में किफायती और उच्च दक्षता वाला आत्मनिर्भर मॉडल विकसित किया, वही दृष्टि आज अंतरिक्ष विज्ञान में भी स्पष्ट दिखाई देती है। जहां अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे देश चंद्र अभियानों पर अरबों डॉलर खर्च करते हैं, वहीं भारत ने चंद्रयान-3 जैसे जटिल और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण मिशन को लगभग 615 करोड़ रुपये में सफलतापूर्वक पूरा कर दुनिया को चौंका दिया। यह लागत अनेक देशों के चंद्र अभियानों की तुलना में 10-15 गुना कम थी।
फास्ट ब्रीडर तकनीक
फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भारत की दीर्घकालिक परमाणु ऊर्जा रणनीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता और आश्चर्य यह है कि सामान्य परमाणु रिएक्टर जहां केवल ईंधन का उपयोग करके ऊर्जा उत्पन्न करते हैं, वहीं यह रिएक्टर ईंधन खर्च करने के साथ नया ईंधन भी उत्पन्न करता है।
इस रिएक्टर में यूरेनियम और प्लूटोनियम के मिश्रित ऑक्साइड ईंधन का उपयोग किया जाता है। इसके कोर के चारों ओर यूरेनियम-238 की एक विशेष परत (ब्लैंकेट) होती है। जब इस पर तेज न्यूट्रॉन टकराते हैं, तो यूरेनियम-238 धीरे-धीरे परिवर्तित होकर प्लूटोनियम-239 में बदल जाता है। यही प्लूटोनियम आगे चलकर नए परमाणु ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है।
यूरेनियम-238 को एक ऐसे “कच्चे ईंधन” की तरह समझा जा सकता है, जो स्वयं सीधे ऊर्जा उत्पन्न नहीं करता। लेकिन जब इसके भीतर तेज न्यूट्रॉन प्रवेश करते हैं, तो यह एक परिवर्तन प्रक्रिया (ट्रांसम्यूटेशन) के माध्यम से प्लूटोनियम-239 जैसे उपयोगी और ऊर्जा-समृद्ध ईंधन में बदल जाता है। इस प्रकार यह पदार्थ सही परिस्थितियों में एक शक्तिशाली ऊर्जा स्रोत बन जाता है। यह रिएक्टर तेज न्यूट्रॉनों पर काम करता है, जिन्हें धीमा नहीं किया जाता। इसी वजह से यह जितना ईंधन खर्च करता है, उससे ज्यादा नया ईंधन बना सकता है। इसलिए इसे “ब्रीडर रिएक्टर” भी कहा जाता है।
प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर्स प्राकृतिक यूरेनियम से बिजली उत्पादन करते हैं और साथ ही प्लूटोनियम भी उत्पन्न करते हैं। यही प्लूटोनियम पुनर्संसाधन के बाद पीएफबीआर जैसे फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों का मुख्य ईंधन बनता है।
पीएफबीआर भारत के क्लोज्ड फ्यूल साइकिल मॉडल पर आधारित है, जिसमें परमाणु ईंधन को एक बार उपयोग करने के बाद फेंका नहीं जाता, बल्कि उसे पुनः संसाधित करके दोबारा उपयोग में लाया जाता है। इस प्रक्रिया से न केवल ईंधन की बचत होती है, बल्कि रेडियोधर्मी अपशिष्ट भी काफी हद तक कम हो जाता है। भारत ने इस तकनीकी क्षमता को 1960 के दशक से धीरे-धीरे विकसित किया है। इस प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ यह है कि ईंधन की कमी भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित नहीं करती। बल्कि यह ऐसा चक्र बनाती है जिसमें सिस्टम स्वयं नए ईंधन के निर्माण में सक्षम रहता है, जिससे दीर्घकालिक और सतत ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित होती है।
तीसरे चरण की ओर
पीएफबीआर को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि भविष्य में इसमें थोरियम-232 का उपयोग संभव हो सके। यह थोरियम न्यूट्रॉन अवशोषण के बाद यूरेनियम-233 में परिवर्तित हो सकता है, जो भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के तीसरे चरण का प्रमुख ईंधन है। भारत के पास लगभग 1.07 मिलियन टन प्राकृतिक थोरियम संसाधन मौजूद हैं। यही विशाल भंडार भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा स्वतंत्रता की कुंजी माना जाता है। यह रिएक्टर भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, ताकि थोरियम-आधारित ऊर्जा प्रणाली की मजबूत नींव रखी जा सके। इस प्रक्रिया में थोरियम-232 को यूरेनियम-233 में बदला जाएगा, जो आगे चलकर भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के तीसरे चरण का मुख्य ईंधन बनेगा।
सुरक्षा और वैज्ञानिक चुनौतियां
कल्पक्कम स्थित पीएफबीआर में अत्याधुनिक सुरक्षा प्रणालियां स्थापित की गई हैं, जो इसे सुरक्षित और विश्वसनीय बनाती हैं। इसमें उच्च तापमान पर कार्य करने वाली तरल सोडियम शीतलक तकनीक का उपयोग किया गया है, जो इसकी ऊर्जा दक्षता को बढ़ाती है। साथ ही इसमें बंद ईंधन चक्र की व्यवस्था है, जिसके माध्यम से परमाणु ईंधन का पुनर्चक्रण संभव हो पाता है।
इस व्यवस्था का एक बड़ा लाभ यह है कि इससे परमाणु अपशिष्ट कम होता है और उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित होता है। कल्पक्कम में एफबीआर-1 और एफबीआर-2 जैसे अगले रिएक्टरों की तैयारी भी शुरू हो चुकी है, जो इस तकनीकी यात्रा को आगे बढ़ाएंगे।
भारत का तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम एक बहुत ही दूरदर्शी योजना है, जिसे देश की भविष्य की ऊर्जा जरूरतों और आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर बनाया गया है। भारत के पास यूरेनियम सीमित मात्रा में है, लेकिन थोरियम बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध है। इसी प्राकृतिक संसाधन संतुलन का उपयोग करने के लिए यह पूरा कार्यक्रम तैयार किया गया है, जिसका लक्ष्य है कम संसाधनों में अधिक और स्थायी ऊर्जा प्राप्त करना।
इस कार्यक्रम का पहला चरण जल रिएक्टर है, जिसमें प्राकृतिक यूरेनियम से बिजली बनाई जाती है। इस प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण उप-उत्पाद के रूप में प्लूटोनियम भी बनता है, जो आगे के चरणों के लिए आधार तैयार करता है।
दूसरे चरण में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर का उपयोग किया जाता है। इसकी खास बात यह है कि यह जितना ईंधन उपयोग करता है, उससे अधिक ईंधन उत्पन्न करने की क्षमता रखता है। कल्पक्कम का पीएफबीआर इसी चरण का महत्वपूर्ण उदाहरण है, जो भारत को इस उन्नत तकनीक में आगे ले जाता है। इसी चरण में थोरियम को यूरेनियम-233 में बदलने की प्रक्रिया भी शुरू होती है, जो तीसरे चरण के लिए बेहद जरूरी है।
तीसरा और अंतिम चरण थोरियम आधारित रिएक्टरों का है, जिसमें भारत अपने विशाल थोरियम भंडार का बड़े पैमाने पर उपयोग करेगा। इस चरण में यूरेनियम-233 को ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। क्योंकि थोरियम भारत में बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध है, इसलिए यह चरण देश को लगभग असीमित और दीर्घकालिक ऊर्जा स्रोत प्रदान करने की क्षमता रखता है।
वर्तमान परमाणु ऊर्जा परिदृश्य
भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम देश की बिजली जरूरतों में लगातार योगदान दे रहा है और अब यह एक महत्वपूर्ण विस्तार चरण में प्रवेश कर चुका है। आने वाले समय में भारत अपने विशाल थोरियम भंडार का उपयोग कर स्वच्छ, सस्ती और दीर्घकालिक ऊर्जा उत्पादन कर सकेगा। वर्तमान में भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता लगभग 8.78 गीगावाट है। वर्ष 2024–25 में इससे लगभग 56,681 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ, जो देश के कुल बिजली उत्पादन का करीब 3% हिस्सा है। 2031–32 तक इसे लगभग 22.38 गीगावाट तक पहुंचाने की योजना है, जिसके लिए नए स्वदेशी रिएक्टरों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग से विकसित रिएक्टरों का भी उपयोग किया जाएगा।
डॉ. होमी जे. भाभा की जिस तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कल्पना ने भारत के कार्यक्रम की नींव रखी थी, वह अब वास्तविकता के बेहद करीब पहुंच चुकी है। कल्पक्कम स्थित यह उपलब्धि उस वैज्ञानिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो भारत को थोरियम आधारित ऊर्जा भविष्य की ओर ले जाती है।
प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की नियंत्रित परमाणु श्रृंखला अभिक्रिया की सफलता का मायने समझिए। यह क्षण केवल एक रिएक्टर के आरंभ होने का नहीं, बल्कि भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे और सबसे महत्वपूर्ण चरण में निर्णायक प्रवेश का प्रतीक है।
वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में आज भारत केवल एक सहभागी नहीं, बल्कि दिशा-निर्धारक के रूप में उभर रहा है। वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन द्वारा जारी वर्ल्ड न्यूक्लियर आउटलुक रिपोर्ट 2026 ने भारत को चीन, फ्रांस, रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे स्थापित परमाणु महाशक्तियों के साथ उन पांच प्रमुख राष्ट्रों में स्थान दिया है, जो 2050 तक वैश्विक परमाणु क्षमता को 1,446 गीगावॉट तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे। अनुमान है कि ये पांच देश मिलकर लगभग 980 गीगावॉट क्षमता का भार अपने कंधों पर उठाएंगे। इस अग्रिम पंक्ति में भारत की उपस्थिति उसके बढ़ते सामर्थ्य और वैश्विक विश्वास का प्रतीक है।

















