उग्रं वीरं महा विष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्
नरसिम्हं भेषणां बद्रं मृत्युओर मृत्युं नमाम्यहम्
भावार्थ : हे नरसिम्हा, उग्र, वीर, महाविष्णु, तेजस्वी मुख वाले, सर्वव्यापी, शुभता प्रदान करने वाले और जन्म-मृत्यु के चक्रों को दूर करने वाले, आपको प्रणाम है। श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार की यह देव स्तुति मात्र एक पौराणिक कथानक नहीं है। इसमें यह गहरा आध्यात्मिक तत्वदर्शन समाया हुआ है कि भक्ति की पराकाष्ठा ‘असंभव’ को भी ‘संभव’ में बदल सकती है। भगवान विष्णु का यह उग्र अवतार बैसाख मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि को हुआ था। यह तिथि इस वर्ष 30 अप्रैल को पड़ रही है।
भक्ति के आगे पराजित हुई असुरता
भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार की कथा वस्तुतः पांच वर्ष बाल भक्त प्रह्लाद की गहन भक्ति और उनके राक्षसी पिता हिरण्यकशिपु के स्वयं को ईश्वर समझ लेने के अहंकार के विनाश से जुड़ी है। श्रीमद्भागवत कहती है कि राक्षसराज हिरण्यकशिपु ने कठोर तपस्या कर भगवान ब्रह्मा से एक दुर्लभ वरदान प्राप्त कर लिया था। हिरण्यकश्यप का यह वरदान था कि वह न दिन में मरे, न रात में, न घर के अंदर, न बाहर, न अस्त्र से, न शस्त्र से, न मानव से और न ही पशु से। इस अजेय वरदान के बल पर सत्ता मद में चूर होकर उसने सर्वत्र हाहाकार मचा दिया और स्वयं को ईश्वर मान कर समूचे राज्य के मंदिरों में अपनी प्रतिमाएं स्थापित कर पूजा करने की राजाज्ञा घोषित करवा दी। मृत्यु के भय से सभी राज्यवासी उसकी आज्ञा मानने को विवश हो गये। किन्तु; उसका स्वयं का एकलौता पांच वर्षीय पुत्र प्रहलाद पिता के इस अनाचार के आगे न झुका।
क्रूर पिता ने उस अबोध बालक पर यातनाओं की सभी सीमायें तोड़ दीं किन्तु गुरु नारद द्वारा दिये गए ‘श्रीहरि’ के मंत्रजप से उसे पल भर भी डिगा न सका। पिता ने अपना आदेश मनवाने के लिए काल कोठरी में डाला, सर्प से कटवाने का प्रयास किया, पर्वत से सागर में फेंका, भोजन में विष दिया, यहाँ तक कि वरदानी बहन होलिका के साथ आग में जलाने का भी षड्यंत्र रचा; बहन जल मरी पर प्रहलाद का बाल बांका भी न हुआ। अन्ततः थकहार कर क्रोधित हिरण्यकशिपु ने जब पुत्र को उसके आराध्य के दर्शन करने की चुनौती दी तो बालक प्रहलाद ने कण कण व्यापी अपने प्रभु को पिता को दर्शन देने को पुकारा। सर्वान्तर्यामी प्रभु अपने उस नन्हे भक्त की करुण पुकार अनसुनी न कर सके और निकट के एक प्रस्तर स्तम्भ से ‘नृसिंह’ स्वरूप में प्रकट हो उठे। ऐसा अवतार जिसका ‘धड़’ मनुष्य जैसा था और ‘शीश’ बब्बर शेर जैसा। शास्त्र कहता है कि भगवान के उस उग्र स्वरूप की भयानक गर्जना सुन हिरण्यकशिपु भय से थर थर कांपने लगा।
भगवान विष्णु ने ‘आधा सिंह-आधा मानव’ (नरसिंह) रूप धरकर, ‘चौखट’ पर (न अंदर, न बाहर), ‘गोधूलि बेला’ में (न दिन, न रात) अपने ‘नाखूनों’ से (न अस्त्र, न शस्त्र) उसका अंत कर दिया। भगवान विष्णु के इस ‘नृसिंह’ स्वरूप का आध्यात्मिक रहस्य है उग्रता में करुणा। भले ही उनका वाह्य स्वरूप भयानक (भीषण) हो लेकिन वे भक्तों के लिए “भद्रं” (कल्याणकारी) हैं। उनका क्रोध केवल अधर्म के प्रति है। जैसे एक माँ अपने बच्चे को बचाने के लिए शेरनी बन सकती है, वैसे ही भगवान नृसिंह अपने भक्तों के लिए उग्र रूप धारण करते हैं। वे “मृत्युमृत्युं” हैं अर्थात मृत्यु के भी मृत्यु हैं।
‘अहोबिलम’ जहाँ नृसिंह अवतार ने किया था हिरण्यकशिपु का वध
आंध्र प्रदेश की नल्लामाला वन श्रृंखला के मध्य कर्णूल जिले में पूर्वी घाट की पहाड़ियों में स्थित ‘अहोबिलम’ वह पौराणिक स्थल है जहाँ भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार धारण कर हिरण्यकशिपु का वध कर भक्त प्रहलाद को बचाया था। अहोबिलम की प्राचीनता की जड़ें पुराणों में निहित हैं। पौराणिक कथा के अनुसार जब देवताओं ने भगवान विष्णु के नरसिंह रूप को देखा, जो महान शक्ति (“अहोबल”) और उस दिव्य गुफा (“अहोबिल”) का संगम था जिसमें अब गर्भगृह स्थित है तो वे विस्मय से भर उठे। इसी कारण इस पवित्र स्थान का नाम अहोबिलम पड़ा। श्रद्धालुओं के अनुसार यह स्थल एक आध्यात्मिक स्वर्ग है, जहाँ भगवान नरसिम्हा की दिव्य आभा समूचे वातावरण में व्याप्त है। इस अहोबिलम के मंदिर का रखरखाव अहोबिलम मठ द्वारा किया जाता है, जो लगभग 600 वर्ष पूर्व स्थापित एक महत्वपूर्ण वैष्णव संस्था है।
“नरसिंह कवच” से हुई विदेशी विद्वान की जीवन रक्षा
हमारे भारत को मंदिर और चमत्कारों का देश भी कहा जाता है। दक्षिण भारत का अहोबिलम मंदिर क्षेत्र ऐसा ही एक चमत्कारी स्थल है। इस मंदिर से जुड़ी एक पुरानी घटना अहोबिलम के मौखिक इतिहास का हिस्सा है; जो यहाँ के स्थानीय निवासियों के मध्य आज भी खासी लोकप्रिय है। इस घटनाक्रम के अनुसार कुछ दशक पहले एक विदेशी शोधकर्ता; जो हिंदू धर्मग्रंथों विशेषकर ‘नरसिंह कवच’ पर शोध कर रहा था, अहोबिलम के घने जंगलों में भटक गया। यह क्षेत्र अत्यंत दुर्गम और हिंसक जानवरों से भरा था। रात हो चुकी थी और उसके पास न भोजन था, न पानी और न ही कोई हथियार। तभी उसे दूर से भेड़ियों और तेंदुओं की आवाज सुनाई देने लगी। मौत सामने खड़ी थी। लेकिन; उस क्षण, उसने अपनी पुस्तक में पढ़ा “नरसिंह कवच” याद आया। उसने डर और हताशा में, टूटी-फूटी संस्कृत में आत्मा की गहराई से पुकारा- “उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥”
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उसने सोचा, “क्या यह पत्थर की मूर्तियाँ, जिनके बारे में मैंने पढ़ा है, सचमुच रक्षा कर सकती हैं?” और तभी सहसा चमत्कार हुआ! जंगल के सन्नाटे को चीरती हुई एक ऐसी दहाड़ गूंजी, जो शेर की दहाड़ से कहीं ज्यादा भयानक और गूंजने वाली थी। वह आवाज़ किसी एक दिशा से नहीं, बल्कि “सर्वतोमुखम्” (हर दिशा) से आ रही थी। उस शोधकर्ता ने देखा कि भेड़िये और तेंदुए, जो उसे घेरने वाले थे, भय से थर-थर कांपते हुए दुम दबाकर भाग खड़े हुए। शोधकर्ता को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसके चारों ओर एक अदृश्य, प्रचंड ऊर्जा की दीवार बन गई हो। उसने पूरी रात उस अदृश्य सुरक्षा कवच को महसूस किया। सुबह होने पर, स्थानीय आदिवासियों ने उसे ढूंढ निकाला। जब उसने उन्हें अपनी आपबीती सुनाई, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “तुमने जहाँ पुकारा, वह भगवान नरसिंह का क्षेत्र है। जब कोई निष्कपट मन से उन्हें याद करता है, तो वे स्तंभ (पत्थर) से भी प्रकट होकर अपने भक्त की रक्षा करते हैं।” वह विदेशी विद्वान, जो केवल शोध करने आया था, उस दिन से भगवान नरसिंह का अनन्य भक्त बन गया।

















