मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर स्थित एकात्म धाम में 17 से 21 अप्रैल तक ‘आदि शंकराचार्य प्रकटोत्सव-एकात्म पर्व’ का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य अद्वैत वेदांत के दर्शन, भारतीय सांस्कृतिक एकता और आध्यात्मिक परंपराओं को समकालीन संदर्भों में पुनर्स्थापित करना था।
कार्यक्रम का उद्घाटन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किया। उन्होंने कहा, ”अद्वैत ज्ञान के सूर्योदय के केंद्र ओंकारेश्वर की चेतना की अनुभूति आज हम सबको हो रही है। ज्ञान और ध्यान की धरती मध्य प्रदेश ने ऐतिहासिक रूप से धर्म, संस्कृति और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार किया है। हर युग में इसके प्रमाण विद्यमान हैं। श्रीरामचंद्र जी वनवास मिलने पर मंदाकिनी माता के किनारे चित्रकूट धाम पधारे और प्रभु श्रीराम का आगे का जीवन मानव मात्र के लिए पूजनीय हो गया, समाज ने रामराज्य का अनुभव प्राप्त किया। भगवान श्रीराम ने संस्कारों, व्यवहारगत मूल्यों, परस्पर संबंधों सहित शासन के ऐसे सूत्र प्रदान किए जो आज भी महत्वपूर्ण हैं। इसी प्रकार श्रीकृष्ण, कंस वध के बाद शिक्षा ग्रहण करने उज्जयिनी स्थित सांदिपनि आश्रम पधारे। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मवाद का संदेश दिया, जो वर्तमान में भी प्रासंगिक है।”
एकात्म बोध होना आवश्यक
श्री द्वारका शारदा पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री सदानंद सरस्वती ने अपने संबोधन में एकात्म धाम की संकल्पना को सराहा। उन्होंने कहा, ”प्राणी मात्र में परमात्मा का दर्शन करने वाला ही एकात्मता सिद्ध कर सकता है। व्यक्ति में एकात्म बोध होना आवश्यक है। ब्रह्म, भगवान और आत्मा तीनों एक हैं। प्राणी मात्र में विद्यमान आत्मतत्व का ज्ञान ही एकता का आधार है। प्राणी मात्र में आत्मा रूपी जो तत्व विद्यमान है, वही एकात्म है। इसे समझते हुए हमें अपने लक्ष्य और उसकी प्राप्ति की जानकारी होनी चाहिए। शरीर केवल भोग-विलास के लिए नहीं है, इस दृश्य जगत से हमें अदृश्य ईश्वर को प्राप्त करना है। एकात्मता को सिद्ध करने के लिए वेदों की आवश्यकता है। वेदों में कही गई बातों का पालन करना चाहिए। वेदांत का आश्रय लेकर ही अद्वैत और एकात्मता को सिद्ध किया जा सकता है।”

‘एकात्मता का व्यवहार करना ही धर्म का आधार’
विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी की उपाध्यक्ष पद्मश्री निवेदिता भिड़े ने कहा, ”हम सभी की आत्मा एक है, शरीर मात्र एक साधन है। मनुष्य शरीर, एकात्म का सबसे सुंदर उदाहरण है, शरीर में कई अंग हैं, लेकिन चेतना एक है। संपूर्ण विश्व में हम सभी ईश्वर की कोशिकाओं की तरह हैं, इन कोशिकाओं का प्राण ईश्वर ही है, जो सर्वथा एक है। हमारे वेदों में विद्यमान क्वांटम फिजिक्स और पर्यावरण के सिद्धांतों को विश्व आज समझ रहा है। दुनिया के लोग कहते हैं कि अगर मानव समाज की रक्षा करनी है तो भारत के वेद, उपनिषदों का अध्ययन करना होगा। सभी के साथ एकात्मता का व्यवहार करना धर्म का आधार है, अतः हमारी वाणी लोगों को जोड़ने वाली होनी चाहिए। सृष्टि का भाग होने के नाते हमें अपने कर्तव्यों का पालन धर्मानुसार करना चाहिए।”
मंच पर उतरीं शास्त्रीय कलाएं

सांस्कृतिक संध्या में भारत की समृद्ध शास्त्रीय नृत्य परंपरा के माध्यम से शंकर के दर्शन को प्रस्तुत किया गया। प्रसिद्ध नृत्यांगना शुभदा वराड़कर ने अपने समूह के साथ ओडिसी शैली में आचार्य शंकर द्वारा रचित स्तोत्रों पर भावपूर्ण प्रस्तुति दी। उन्होंने नृत्य के माध्यम से नदियों की चंचलता और उनके प्रति भक्ति भाव को बखूबी दर्शाया। सुप्रसिद्ध कलाकार पद्मजा सुरेश ने शक्ति पर केंद्रित भरतनाट्यम की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम में केवल नदियों पर केंद्रित स्तोत्र ही नहीं, बल्कि आचार्य शंकर की अन्य महान रचनाओं जैसे ‘निर्वाणषटकम्’ और ‘गणेश पंचरत्नम्’ पर भी कोरियोग्राफी प्रस्तुत की गई।
द्वितीय दिवस : पर्यावरण हमारा ही एक हिस्सा
एकात्म पर्व के दूसरे दिन देश के विभिन्न वक्ताओं एवं संतों की उपस्थिति में विभिन्न सत्रों का आयोजन हुआ। कार्यक्रम में सिख संप्रदाय पर विशेष सत्र हुआ, जिसमें गुरु ग्रंथ साहिब से लेकर अद्वैत दर्शन की चर्चा हुई।
रामकृष्ण मिशन पर आधारित सत्र में स्वामी जापसिद्धानंद, स्वामी वेदतत्त्वानंद पुरी तथा स्वामी सर्वभद्रानंद ने सहभागिता की। इस सत्र में वक्ताओं ने रामकृष्ण परमहंस के जीवन, उनके अद्वैत दर्शन तथा मिशन की व्यापक भूमिका पर गहन विचार प्रस्तुत किए। स्वामी वेदतत्त्वानंद पुरी जी के अनुसार, रामकृष्ण मिशन को केवल एक संस्था के चश्मे से देखना इसकी व्यापकता को सीमित करना होगा। स्वामी सर्वभद्रानंद ने कहा कि रामकृष्ण परमहंस ने सन् 1897 में अपने शिष्यों के साथ मिलकर रामकृष्ण आश्रम की स्थापना की। उन्होंने यह भी कहा कि परमहंस जैसे संत विरले होते हैं, जो यह कह सकें कि वे ईश्वर के साक्षात दर्शन करा सकते हैं।
पर्यावरण पर हुए सत्र में डॉ. बालकृष्ण पिसुपति ने कहा कि पर्यावरण हमसे अलग नहीं है, अपितु यह हमारा ही एक हिस्सा है, इसलिए किसी भी चीज को अलग समझना भ्रम है। उन्होंने कहा कि प्रकृति को बाहरी मानने के कारण ही संकटों की शुरुआत होती है। हम पर्यावरण संसाधनों के मालिक नहीं हैं, बल्कि उसके संरक्षक हैं।
सिख संप्रदाय पर आयोजित सत्र में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के प्रो. रामनाथ जी ने गुरु ग्रंथ साहिब, वेदांत और संत साहित्य के अटूट संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब का उदाहरण देते हुए कहा कि इस पवित्र ग्रंथ में अनेक महान संतों की वाणी संकलित है, जो प्रत्यक्ष रूप से वेदों के मूल सिद्धांतों का ही विस्तार है।
उन्होंने धर्म की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि “वेद ही धर्म का मूल है” और सत्य का साक्षात्कार या अनुभव करना ही वास्तव में वेदांत है। सत्र में निर्मल अखाड़ा के महंत दर्शन सिंह ने कहा कि गुरुनानक देव गुरुवाणी का मंगलाचरण अद्वैत से ही करते हैं। एक ओंकार की अनुगूंज सर्वप्रथम इसी ओंकारेश्वर की पुण्य भूमि से हुई है। उन्होंने कहा कि सभी शास्त्रों के पीछे की मूल शक्ति एक ओंकार ही है। उन्होंने कहा कि गुरुवाणी में ब्रह्म के अनेक उदाहरण हैं, ब्रह्म ही इस संसार का आधार है।
तृतीय दिवस : परंपरा और तकनीक का संगम
एकात्म पर्व के तीसरे दिन अद्वैत एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशल इंटेलिजेंस) विषय पर देश के प्रमुख चर्चित ए.आई. प्लेटफॉर्म के संस्थापक डॉ. प्रत्युष कुमार, आई.आई.टी. नई दिल्ली के प्रोफेसर राहुल गर्ग, रामकृष्ण मिशन चेन्नई के स्वामी परम शिवानंद एवं श्री कल्याण मुत्तुराजन उपस्थित रहे। वहीं अद्वैत एवं शांति विषय पर आयोजित सत्र में स्वामी परमात्मानंद सरस्वती, यूनेस्को चेयर बीएचयू के प्रोफेसर प्रियंकर उपाध्याय एवं नीना मजूमदार का संवाद हुआ। “एक भारत: आचार्य शंकर के पदचिह्नों पर“ विषय पर आयोजित सत्र में भारत सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरामन, स्वामी परिपूर्णानंद सरस्वती एवं सुश्री अनुराधा गोयल ने संवाद किया। संवाद के साथ सत्त्व, रज, तम पर कार्यशाला में नई दिल्ली के विशाल चौरासिया एवं स्वामी वेदतत्त्वानंद पुरी ने संबोधित किया।
अद्वैत और एआई
अद्वैत और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) पर चर्चा करते हुए सर्वम एआई के संस्थापक डॉ. प्रत्युष कुमार ने कहा कि वर्तमान समय में हम पुनः डेटा-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर अग्रसर हो रहे हैं और एआई के माध्यम से उसे अधिक अर्थपूर्ण और उपयोगी बना रहे हैं। उनके अनुसार, तकनीक का स्तर निरंतर बढ़ेगा, किंतु वर्तमान समय में हमारे पास यह अवसर है कि हम एआई को किसी भी दार्शनिक दृष्टिकोण के साथ संरेखित कर सकते हैं।
स्वामी परम शिवानंद ने बताया कि वे वेदांत दर्शन को आधुनिक तकनीक से जोड़कर युवा पीढ़ी के मानसिक एवं आध्यात्मिक उत्थान के लिए अथक प्रयासरत हैं।

अद्वैत का व्यापक संदेश
संवाद सत्र में भारत सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरामन ने अपने वक्तव्य में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के अद्वितीय योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य ने भारत की आध्यात्मिक और धार्मिक परंपराओं को न केवल व्यवस्थित किया, बल्कि उन्हें एक अखंड धारा के रूप में प्रवाहित भी किया।
‘चिन्मय मिशन की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक यात्रा’ सत्र में स्वामिनी विमलानंद सरस्वती ने कहा कि आदि शंकराचार्य ने अद्वैत की समृद्ध परंपरा स्थापित की, जबकि स्वामी चिन्मयानंद ने उसे जन-जन तक पहुंचाने का सशक्त कार्य किया। उन्होंने कहा कि आज देश में जब भी वेदांत की चर्चा होती है, तो उसका केंद्र अद्वैत ही होता है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में संस्कृति मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी ने कहा कि आज का दिन केवल उत्सव नहीं, बल्कि भारत की पारंपरिक चेतना के पुनर्जागरण का अवसर है। आचार्य शंकर संन्यासी होकर निकले तो उनके दिव्य चरण यहीं ओंकारेश्वर की धरती पर पड़े। नर्मदा के तट पर जब भगवत्पाद गोविंद ने उनसे पूछा कि तुम कौन हो, तो उन्होंने उत्तर दिया-‘चिदानंद रूपः, शिवोहम शिवोहम’।

चतुर्थ दिवस
चतुर्थ दिवस में चिन्मय मिशन पर आयोजित सत्र में स्वामिनी विमलानंद सरस्वती और स्वामी अद्वैतानंद सरस्वती मिशन के कार्यों और वेदांत के प्रसार पर अपनी बात रखी।
पर्व का समापन
एकात्म पर्व के पांचवें दिन 21 अप्रैल को जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि, चिन्मय मिशन के पूर्व वैश्विक प्रमुख स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री मध्यप्रदेश शासन धर्मेंद्र सिंह लोधी, दक्षिणामूर्ति मठ के प्रमुख स्वामी पूर्णानंद गिरी, मां पूर्ण प्रज्ञा, प्रख्यात शिक्षाविद् गौतम भाई पटेल, महंत मंगलदास त्यागी तथा वेंकटेश्वर वेद विज्ञान पीठम् के प्राचार्य ब्रह्मर्षि कुप्प शिव सुब्रमण्यम अवधानी की गरिमामयी उपस्थिति में समापन हुआ। जगद्गुरु श्रृंगेरी शंकराचार्य विधुशेखर भारती ने वीडियो संदेश के माध्यम से शुभाशीष प्रदान करते हुए कहा कि ऐसे प्रकल्पों की आज अत्यंत आवश्यकता है, जो आदि शंकराचार्य के विचारों को वैश्विक स्तर तक पहुंचाएं। शंकराचार्य ने पूरे भारत को एक सूत्र में बांधने के लिए चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना की, जहां से एकता और अद्वैत का संदेश प्रसारित हुआ।
इस अवसर पर शैक्षणिक जगत की दो प्रखर विभूतियों को सम्मानित किया गया, जिसमें चिन्मय मिशन के पूर्व प्रमुख स्वामी तेजोमयानंद जी को उनकी अखंड अद्वैत निष्ठा के लिए सम्मानित किया गया। पद्म भूषण से विभूषित स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती ने ‘उपनिषद गंगा’ और विभिन्न ग्रंथों की व्याख्या के माध्यम से वेदांत को जन-जन तक पहुंचाया है। साथ ही प्रख्यात विद्वान प्रोफेसर गौतम भाई पटेल को संस्कृत वाङ्मय और अद्वैत दर्शन में उनके अतुलनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

















