'अब बंदूकों से नहीं धारणा से लड़े जा रहे हैं युद्ध' : पूर्व सैन्य दिग्गजों की चेतावनी
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सावधान! अब बंदूकों से नहीं ‘धारणा’ से लड़े जा रहे हैं युद्ध’ : पूर्व सैन्य दिग्गजों ने मीडिया को लेकर दी बड़ी चेतावनी

अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद (ABPSSP) की संगोष्ठी में सैन्य विशेषज्ञों ने 'धारणा प्रबंधन' (Perception Management) को राष्ट्रीय सुरक्षा का नया हथियार बताया। जानिए कैसे मीडिया और सोशल मीडिया भारत की सुरक्षा चुनौतियों को प्रभावित कर रहे हैं।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Apr 28, 2026, 11:29 pm IST
inभारत, रक्षा, विश्लेषण
media national security perception management abpssp seminar

राष्ट्रीय सुरक्षा में मीडिया की भूमिका : सैन्य विशेषज्ञों ने बताए 'धारणा प्रबंधन' के नए मंत्र

Media and National Security : समकालीन सामरिक परिवेश में राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में मीडिया की भूमिका अभूतपूर्व रूप से महत्वपूर्ण हो गई है। आज मीडिया केवल सूचना के प्रसार का माध्यम मात्र नहीं रह गया है, बल्कि यह एक अत्यंत प्रभावशाली साधन बन चुका है, जो जनमानस की धारणा को आकार देता है, राष्ट्रीय विमर्श का निर्माण करता है, राष्ट्र की मनोस्थिति को प्रभावित करता है तथा समग्र रूप से देश की सुरक्षा संरचना में महत्वपूर्ण योगदान देता है। इस महत्वपूर्ण एवं निरंतर विकसित हो रहे संबंध को ध्यान में रखते हुए, अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद (ABPSSP) द्वारा “मीडिया और राष्ट्रीय सुरक्षा : चुनौतियाँ एवं दायित्व” विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी (ABPSSP Seminar 2026) का आयोजन 25 अप्रैल 2026 को भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली में किया गया।

यह संगोष्ठी इस उद्देश्य से परिकल्पित की गई थी कि एक ऐसा साझा मंच उपलब्ध कराया जाए जहाँ प्रमुख हितधारक—जैसे वरिष्ठ सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी, मीडिया जगत (इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल एवं प्रिंट), सामरिक विशेषज्ञ एवं शिक्षाविद—एक साथ आकर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मीडिया के बहुआयामी पहलुओं पर विचार-विमर्श कर सकें। यह अपने प्रकार की एक विशिष्ट पहल थी, जहाँ हितधारकों और आमजन के बीच प्रस्तुतियों, चर्चाओं, विश्लेषणों एवं प्रश्नोत्तर सत्रों के माध्यम से सीधा संवाद स्थापित हुआ, जिससे समग्र विमर्श और अधिक समृद्ध एवं प्रभावशाली बना।

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संगोष्ठी में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया कि मीडिया राष्ट्रीय सुरक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है—यह जनधारणा और अंतरराष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित करता है, संकट की घड़ी में सटीक एवं समयबद्ध सूचना उपलब्ध कराता है तथा किसी भी प्रकार की अनुचित गतिविधियों पर निगरानी रखने वाले प्रहरी के रूप में कार्य करता है। मीडिया की जिम्मेदारी केवल समाचार प्रसारण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना, भय अथवा सनसनी फैलाने वाली रिपोर्टिंग से बचना तथा ऐसी संवेदनशील सूचनाओं की सुरक्षा करना भी शामिल है, जो किसी भी सैन्य या राष्ट्रीय अभियान को प्रभावित कर सकती हैं।

इस प्रकार, मीडिया को सदैव अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार तथा राष्ट्रीय हित, सुरक्षा, स्थिरता एवं एकता के समान रूप से महत्वपूर्ण दायित्व के बीच संतुलन स्थापित करना होता है।

मीडिया–सैन्य संबंध स्वभावतः जटिल है और इसके लिए परिपक्व, खुले दृष्टिकोण एवं गहन समझ की आवश्यकता होती है। कई बार यह संबंध असमंजसपूर्ण प्रतीत हो सकता है क्योंकि एक ओर परिचालन गोपनीयता होती है, तो दूसरी ओर जनता के सूचना अधिकार की अपेक्षा। तथापि, जब यह संबंध संतुलित एवं समन्वित रूप में कार्य करता है, तो मीडिया सशस्त्र बलों के शौर्य, बलिदान, राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यता एवं व्यावसायिकता को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर एक “बल गुणक” (force multiplier) के रूप में कार्य करता है। यह राष्ट्रीय उद्देश्यों के समर्थन में रणनीतिक विमर्श एवं सकारात्मक कथानक निर्माण का सशक्त माध्यम भी बनता है।

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संगोष्ठी में एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय के रूप में “धारणा प्रबंधन (Perception Management)” को राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रमुख स्तंभ माना गया। आज के सूचना-प्रधान एवं वैश्विक रूप से जुड़े विश्व में वास्तविकता से अधिक प्रभावी अक्सर धारणा होती है। धारणा प्रबंधन का अर्थ है—मीडिया के माध्यम से देश की स्थिरता, सामाजिक एकता, सैन्य शक्ति एवं नीतिगत वैधता के प्रति घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय जनमानस की सोच को रणनीतिक रूप से प्रभावित करना। इस दृष्टि से मीडिया को राज्य की “स्वायत्त कूटनीतिक शक्ति” के रूप में भी देखा गया, जो राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति हेतु दृष्टिकोण, व्यवहार एवं विचारों को प्रभावित करने में सक्षम है। यह भी स्वीकार किया गया कि प्रभावी धारणा प्रबंधन से न केवल प्रतिरोध क्षमता बढ़ती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता तथा आंतरिक एकता भी सुदृढ़ होती है। इस विषय पर सैन्य कूटनीति की भूमिका को लेकर भी व्यापक सहमति बनी।

यह भी सुझाव दिया गया कि सैन्य अभियानों, मानवीय राहत अभियानों तथा रक्षा कूटनीति से संबंधित ब्रीफिंग्स का नेतृत्व यथासंभव सैन्य अधिकारियों द्वारा ही किया जाना चाहिए। साथ ही यह भी अनुभव किया गया कि एक समन्वित धारणा प्रबंधन प्राधिकरण/संस्था की अत्यंत आवश्यकता है, जिसे “मंथन”, “चिंतन” अथवा किसी अन्य उपयुक्त नाम से स्थापित किया जा सकता है, लेकिन ऐसी संस्था को  सरकार का पूर्ण अधिकार प्राप्त हो।

संगोष्ठी में भारत की सैन्य एवं सुरक्षा संचार व्यवस्था में कुछ कमियों को भी ईमानदारी से स्वीकार किया गया। इनमें सूचना के विलंबित एवं प्रतिक्रियात्मक प्रसार की प्रवृत्ति, अत्यधिक गोपनीयता के कारण सूचना शून्यता का निर्माण, परिचालन सफलताओं का राजनीतिकरण, तथा हताहतों एवं सामरिक परिणामों की पारदर्शिता में सीमाएँ शामिल हैं। यह भी उल्लेख किया गया कि कुछ रक्षा अभियानों, जैसे ‘ऑपरेशन सिंदूर’, के संदर्भ में यह चुनौतियाँ विशेष रूप से उभरकर सामने आईं, जिससे एक अधिक संरचित एवं सक्रिय संचार प्रणाली की आवश्यकता स्पष्ट होती है।

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संगोष्ठी का प्रारंभ लेफ्टिनेंट जनरल विष्णु कांत चतुर्वेदी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद्, के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने कहा कि सशस्त्र बल जहाँ राष्ट्र की संप्रभुता एवं अखंडता के संरक्षक हैं, वहीं मीडिया लोकतंत्र, सांस्कृतिक मूल्यों एवं वैश्विक छवि का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इन दोनों स्तंभों के बीच समन्वय आज के सुरक्षा परिदृश्य में अत्यंत आवश्यक है।

भारतीय विद्या भवन के निदेशक डॉ. के. शिव प्रसाद ने अपने उद्घाटन संबोधन में इस विचार को और सुदृढ़ किया। उन्होंने कहा कि आज का युग “धारणा युद्धों” का युग है, जहाँ पारंपरिक संघर्षों के समानांतर सूचना एवं विमर्श का युद्ध भी चल रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह संगोष्ठी नीति-निर्माताओं एवं हितधारकों के लिए उपयोगी निष्कर्ष प्रदान करेगी।

प्रथम सत्र का संचालन लेफ्टिनेंट जनरल दुष्यंत सिंह ने किया, जिसमें उन्होंने वैश्विक सामरिक स्थिरता एवं महान शक्तियों के प्रतिस्पर्धा पर विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने अमेरिका, चीन एवं रूस के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा तथा बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ते संक्रमण को रेखांकित किया।

लेफ्टिनेंट जनरल राज शुक्ला, सदस्य UPSC ने वैश्विक शक्ति संतुलन, व्यापार मार्गों, तकनीकी प्रभुत्व एवं सैन्य श्रेष्ठता के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा पर प्रकाश डाला। ईरान, पश्चिम एशिया तथा अमेरिका–इज़राइल रणनीति के प्रभावों पर भी गहन चर्चा हुई।

पूर्व राजदूत अनिल त्रिगुणायत तथा प्रोफेसर अंशु जोशी (जेएनयू) ने उभरती वैश्विक व्यवस्था, मध्यम शक्तियों के उदय तथा “ग्लोबल साउथ” की बढ़ती भूमिका का विश्लेषण किया।

द्वितीय सत्र, जिसका संचालन मेजर जनरल राकेश भदौरिया ने किया, पूर्णतः धारणा प्रबंधन पर केंद्रित रहा। उन्होंने वर्तमान प्रणाली की कमियों तथा एक सुदृढ़, सक्रिय एवं समन्वित ढांचे की आवश्यकता पर बल दिया।

मेजर जनरल सिन्हा ने हाइपरसोनिक हथियारों, साइबर युद्ध एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी उभरती तकनीकों के कारण युद्ध के स्वरूप में आ रहे परिवर्तन पर प्रकाश डाला।

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तीसरे सत्र में प्रोफेसर  के.जी. सुरेश पूर्व डायरेक्टर जनरल IIMC ने सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित किया तथा इसे सूचना युद्ध, भ्रामक प्रचार एवं साइबर खतरों का प्रमुख माध्यम बताया।

श्री आशीष सिंह सीनियर पत्रकार ने सोशल मीडिया को रणनीतिक संचार के एक प्रभावी साधन के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि श्रीमती शालिनी कपूर तिवारी पत्रकार ने इसे सैन्य जनसंपर्क एवं छवि निर्माण का सशक्त माध्यम बताया। श्री मनु पबी वरिष्ठ पत्रकार ने भ्रामक प्रचार एवं मनोवैज्ञानिक अभियानों के विरुद्ध समयबद्ध, विश्वसनीय एवं पारदर्शी संचार की आवश्यकता पर बल दिया।

सुश्री नीरा मिश्रा द्वारा “सांस्कृतिक विरासत” पर दिए गए संबोधन में भारतीय परंपराओं, संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा की समृद्धता को रेखांकित किया गया।

प्रमुख निष्कर्ष एवं आगे की दिशा

संगोष्ठी से निम्नलिखित महत्वपूर्ण निष्कर्ष एवं अनुशंसा अंकलित हुई:-

  • एक समन्वित राष्ट्रीय संस्था की आवश्यकता है, जो प्रमुख सेना अध्यक्ष (CDS) के अंतर्गत सभी हितधारकों को एकीकृत करे।
  • धारणा प्रबंधन एवं विमर्श निर्माण को सतत एवं वास्तविक समय में संचालित किया जाना चाहिए।
  • प्रतिद्वंदी देशों की सूचना रणनीतियों की गहन समीक्षा आवश्यक है।
  • अंतरराष्ट्रीय मीडिया नेटवर्क के साथ भारतीय मीडिया के संबंधों को सुदृढ़ किया जाए।
  • युवा वर्ग को धारणा निर्माण, विमर्श का प्रमुख केंद्र बनाया जाए।
  • सैन्य विषयों पर संचार सशस्त्र बलों द्वारा किया जाना अधिक विश्वसनीय होगा।
  • संवेदनशील सूचनाओं के प्रसार पर कठोर मीडिया दिशानिर्देश आवश्यक हैं।
  • डिजिटल एवं सोशल मीडिया पर जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता।
  • भ्रामक सूचना एवं फर्जी खबरों के विरुद्ध जन-जागरूकता एवं डिजिटल साक्षरता बढ़ाई जाने की आवश्यकता।
  • मीडिया को राष्ट्रीय सुरक्षा विषयों पर अधिक जिम्मेदारी एवं संयम के साथ कार्य करने की जरूरत।

अंततः यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया कि मीडिया और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संबंध विरोधात्मक नहीं बल्कि पूरक हैं। दोनों संस्थाएँ राष्ट्र की सेवा में समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आज के युग में, जहाँ सूचना स्वयं एक युद्धक्षेत्र बन चुकी है, वहाँ विश्वसनीय संचार, जिम्मेदार पत्रकारिता एवं रणनीतिक विमर्श निर्माण राष्ट्र की सुरक्षा एवं प्रभावशीलता के लिए अनिवार्य हो चुके हैं।

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अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद की यह पहल मीडिया एवं सुरक्षा संस्थानों के बीच सार्थक संवाद स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो भारत को न केवल भौतिक सुरक्षा के स्तर पर सुदृढ़ बनाएगा, बल्कि सूचना एवं धारणा के क्षेत्र में भी उसे एक प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने में सहायक होगा।

Topics: Indian MediaNational securityPerception ManagementABPSSP Seminar 2026भारतीय सैन्य कूटनीतिसूचना युद्धInformation WarfareABPSSPMilitary DiplomacySocial Media WarfareDefence News Hindi
Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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