बालोद जिले का छोटा सा गांव औराटोला आज एक बड़ी मिसाल बन गया है। “लखपति दीदी” अभियान के बाद यह गांव अब “लखपति ग्राम” के रूप में जाना जा रहा है। यहां लगभग हर घर की एक महिला साल में एक लाख रुपये या उससे ज्यादा कमाई कर रही है। यह उपलब्धि सिर्फ इस गांव के लिए नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण भारत के लिए प्रेरणा है।
महिलाओं की मेहनत और एकजुटता से बना “लखपति ग्राम”- इस सफलता के पीछे गांव की महिलाओं की मेहनत और एकजुटता है। करीब 65 महिलाओं ने मिलकर छह स्व-सहायता समूह बनाए और साथ काम करना शुरू किया। इन समूहों के जरिए उन्होंने नए-नए काम सीखे और अपनी आय बढ़ाई। आज ये सभी महिलाएं आत्मनिर्भर बन चुकी हैं और “लखपति दीदी” कहलाती हैं। इस बदलाव की शुरुआत ग्राम सभा के एक फैसले से हुई, जिसमें महिलाओं की आय बढ़ाने पर जोर दिया गया। इसके बाद जिला प्रशासन और आजीविका मिशन ने महिलाओं को प्रशिक्षण और जरूरी साधन उपलब्ध कराए। महिलाओं ने आधुनिक खेती, पशुपालन, मशरूम उत्पादन और छोटे व्यवसाय जैसे काम शुरू किए। इससे उनकी कमाई के कई नए रास्ते खुले।
सामूहिक प्रयास से बदली किस्मत- औराटोला की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां सबने मिलकर काम किया। “आजीविका सखी” और “पशु सखी” गांव की महिलाओं को घर-घर जाकर सिखाती हैं, नई जानकारी देती हैं और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं। इससे गांव में एक मजबूत आर्थिक व्यवस्था बन गई है। कुमेश्वरी मसिया की कहानी इस बदलाव को साफ दिखाती है। उन्होंने समूह से जुड़कर मछली पालन सीखा और 50 हजार रुपये का कर्ज लेकर अपना काम शुरू किया। साथ ही उन्होंने सब्जी की खेती भी शुरू की। आज वे साल में दो बार मछली बेचती हैं और सब्जियों से भी अच्छी कमाई करती हैं। उनकी सालाना आय करीब 1.17 लाख रुपये हो गई है।
आत्मविश्वास और आय में बढ़ोतरी- इसी तरह लोकेश्वरी साहू ने पशुपालन, मशरूम उत्पादन और सिलाई का काम शुरू किया। उन्होंने कर्ज लेकर दो जर्सी गायें खरीदीं और दूध बेचने लगीं। अब वे हर महीने 11 हजार रुपये से ज्यादा कमा रही हैं। औराटोला की यह सफलता सिर्फ पैसे तक सीमित नहीं है। इससे महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ा है और वे अब फैसले लेने में भी आगे रहती हैं। यह गांव आज दूसरे गांवों के लिए एक सीख बन गया है कि मिलकर काम करने से हर मुश्किल आसान हो सकती है।

















