जब 26 मार्च से 3 अप्रैल 2026 के बीच नासिक स्थित टीसीएस बीपीओ में कर्मचारियों के खिलाफ नौ एफआईआर दर्ज की गईं, तो शुरुआती तौर पर इसे एक कार्यस्थल से जुड़ा घोटाला बताया गया। इसमें यौन उत्पीड़न, कार्यस्थल पर दुष्कर्म, यौन उत्पीड़न निवारण अधिनियम की विफलता और एचआर की मिलीभगत की बातें सामने आईं। यह सब सत्य है, लेकिन पूरी कहानी नहीं है। इस प्रकरण की वास्तविक परतों को समझने के लिए हमें विदेशी तत्वों से इसके संबंध और इसके प्रभावों की गहराई में जाना होगा।मामले की जांच कर रही एसआईटी ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों की पुष्टि की है। व्हाट्सएप चैट में मलेशिया में रहने वाले मजहबी कट्टरपंथी ‘इमरान’ का नाम सामने आया है। आरोपियों ने वीडियो कॉल के जरिए कर्मचारियों को उससे जोड़ा।
जांच एजेंसियों का मानना है कि इन कॉल्स के जरिए पहले से प्रभावित महिलाओं पर मजहबी प्रभाव डालकर उनका कन्वर्जन करने की कोशिश की गई। इस ऑपरेशन की सुनियोजित संरचना अब धीरे-धीरे सामने आ रही है।
पहली शिकायत करने वाली महिला अनुसूचित जाति से थी। उसकी एफआईआर के बाद ही मामले की जांच शुरू हुई। उसने बताया कि उसे मलेशिया में उच्च वेतन वाली नौकरी का लालच दिया गया था। इसके लिए उसका पासपोर्ट, आधार कार्ड, बैंक डिटेल्स और शैक्षणिक प्रमाणपत्र पहले ही जब्त कर लिए गए थे।
यह केवल उत्पीड़न नहीं, बल्कि मानव तस्करी की तैयारी का संकेत है। मलेशिया में नौकरी का लालच देना, वीडियो कॉल के माध्यम से मजहबी प्रभाव में लेने की कोशिश और दस्तावेजों की जब्ती, सब कुछ इस साजिश का हिस्सा प्रतीत होता है। मलेशिया से इस घटना का संबंध होना कोई संयोग नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित षड्यंत्र की ओर इशारा करता है। भारत से भाग जाकिर नाइक वहीं पहुंचा है। उस पर एनआईए ने आतंकवाद को बढ़ावा देने और कन्वर्जन के आरोप लगाए हैं। उसका यूट्यूब चैनल कई देशों में प्रतिबंधित है। वह 2016 से मलेशिया में शरण लिए हुए है। भारत द्वारा उसके प्रत्यर्पण के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं, लेकिन वहां की सरकार ने इन्हें नजरअंदाज किया है। यहां तक कि इंटरपोल के रेड कॉर्नर नोटिस भी स्वीकार नहीं किए गए।
ऐसे माहौल में अगर मलेशिया से जुड़े लोग भारतीय कॉर्पोरेट कर्मचारियों को प्रभावित कर रहे हों, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह सब आपस में जुड़ा हुआ है? दाऊद इब्राहिम का डी-कंपनी नेटवर्क, जो आईएसआई के साथ मिलकर काम करता है, मलेशिया में अपनी जड़ें जमा चुका है। यह नेटवर्क पैसे के लेन-देन, दस्तावेज प्रबंधन और मानव तस्करी जैसे कामों में सक्रिय बताया गया है। 2020 में भारत की खुफिया एजेंसियों ने बताया था कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने मलेशिया के जरिए भारत में आतंकी गतिविधियों के लिए पैसा भेजा था। 2025 में मलेशिया में 36 बांग्लादेशी नागरिकों को आईएसआईएस से जुड़े ऑनलाइन नेटवर्क चलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। ऐसे माहौल में नासिक के कर्मचारियों को मलेशिया से जोड़ने वाली गतिविधियां अलग-थलग घटना नहीं लगतीं।
यह मामला केवल कॉर्पोरेट अपराध नहीं है, क्योंकि टीसीएस जिन सिस्टम्स को संभालती है, वे बेहद संवेदनशील हैं। टीसीएस भारत सरकार के लिए क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर, टैक्सेशन, कानून व्यवस्था, जमीन रिकॉर्ड और रक्षा से जुड़े डेटा सिस्टम्स का प्रबंधन करती है। इसके अलावा बैंकिंग, स्टॉक एक्सचेंज और जेईई, नीट तथा सिविल सेवा जैसी परीक्षाओं के सिस्टम भी इससे जुड़े हैं।
ऐसे में यदि कोई कर्मचारी, जो लंबे समय से मानसिक दबाव में है और जिसके पास अभी भी सिस्टम एक्सेस है, बाहरी नेटवर्क के संपर्क में आता है, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर मुद्दा बन जाता है। इसे केवल साजिश कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
2000 से लेकर जुलाई 2025 तक भारत में 313 मामलों में 630 आईएसआई एजेंट गिरफ्तार किए जा चुके हैं। संवेदनशील संस्थानों में अंदरूनी लोगों को जोड़ने की रणनीति लगातार सक्रिय है। कॉर्पोरेट आईटी सेक्टर, खासकर जहां सरकारी डेटा जुड़ा हो, अब एक नया और अहम लक्ष्य बन चुका है।
नासिक का मामला केवल कार्यस्थल का विवाद नहीं माना जा सकता। यह एक बहुस्तरीय विदेशी नेटवर्क की संभावित साजिश का हिस्सा हो सकता है, जहां मलेशिया वैचारिक आधार देता है, आईएसआई आर्थिक मदद करता है, डी-कंपनी लॉजिस्टिक्स संभालती है और स्थानीय नेटवर्क मानव संसाधन तैयार करता है।
इसकी जांच को आगे बढ़ाते हुए इसकी कड़ियों को मलेशिया तक खंगाले जाने की जरूरत है। साथ ही भारत को मलेशिया के प्रति अपने कूटनीतिक रुख पर भी पुनर्विचार करना चाहिए, क्योंकि अब सवाल सिर्फ एक कंपनी का नहीं है,खतरा हमारे कार्यस्थलों तक पहुंच चुका है। अब असली सवाल यह है कि क्या हम इसे पहचानने के लिए पर्याप्त सतर्क हैं?

















