कोणार्क सूर्य मंदिर में रेत हटाने की प्रक्रिया शुरू, ASI दे रही सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता
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कोणार्क सूर्य मंदिर में रेत हटाने की प्रक्रिया शुरू, ASI दे रही सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने विश्व प्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर के जगमोहन (सभा मंडप) से रेत हटाने की एक सुनियोजित और वैज्ञानिक प्रक्रिया शुरू कर दी है।

Written byडॉ. समन्वय नंदडॉ. समन्वय नंद — edited by Lalit Fulara
Apr 25, 2026, 11:28 am IST
inओडिशा

भुवनेश्वर। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने विश्व प्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर के जगमोहन (सभा मंडप) से रेत हटाने की एक सुनियोजित और वैज्ञानिक प्रक्रिया शुरू कर दी है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह कार्य अत्यंत सावधानी और कड़े सुरक्षा मानकों के तहत किया जा रहा है, ताकि ऐतिहासिक धरोहर की संरचनात्मक स्थिरता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। यह कार्य अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर आरंभ किया गया। योजना के तहत मंदिर के पश्चिमी भाग की दीवार में एक संकीर्ण मार्ग तैयार किया जा रहा है, जिसके माध्यम से अंदर भरी रेत को धीरे-धीरे हाथ से निकाला जाएगा। ASI के अधिकारियों के अनुसार, जगमोहन के भीतर रेत निष्कासन की यह प्रक्रिया, जो पिछले 120 वर्षों से अधिक समय से बंद है, लगभग तीन महीने में पूरी होने की संभावना है।

इस कार्य के लिए इंजीनियरों द्वारा मंदिर की पश्चिमी दीवार के पहले और दूसरे “पीढ़ा” (स्तर) के बीच लगभग 6 फीट चौड़ा और 5 फीट लंबा नियंत्रित मार्ग बनाया जा रहा है। इस मार्ग के जरिए रेत को पूरी तरह मैन्युअल तरीके से निकाला जाएगा, ताकि प्राचीन संरचना पर किसी प्रकार का दबाव न पड़े। प्रारंभिक चरण में चार कुशल श्रमिक बिना किसी भारी मशीनरी के खुदाई कार्य में जुटे हुए हैं। चौथे दिन तक वे लगभग 2 फीट चौड़ाई और 4 फीट लंबाई तक खुदाई कर चुके हैं। पूरी प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक विशेष टीम तैनात की गई है, जो हर चरण पर बारीकी से नजर रख रही है।

इसका उद्देश्य कार्य में सटीकता बनाए रखना और स्मारक की संरचनात्मक मजबूती को सुरक्षित रखना है। इसके अलावा, इंजीनियरों ने रेत को बाहर निकालने के लिए ट्रॉलियों के उपयोग हेतु एक कार्य प्लेटफॉर्म भी तैयार किया है। ड्रिलिंग कार्य भी बेहद धीमी गति से किया जा रहा है, ताकि कंपन कम से कम हो और मंदिर की दीवारों पर कोई दबाव न पड़े। इस परियोजना को एएसआई के महानिदेशक की स्वीकृति मिलने के साथ ही भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास से तकनीकी मंजूरी भी प्राप्त हुई है।

आईआईटी मद्रास ने विस्तृत अध्ययन के बाद निष्कर्ष निकाला कि रेत हटाने से मंदिर की संरचना को कोई खतरा नहीं होगा। इससे पहले पश्चिमी दीवार पर उन्नत डायमंड ड्रिलिंग तकनीक का उपयोग करते हुए दो कोर ड्रिलिंग भी की जा चुकी हैं, जो पूरी तरह कंपन-मुक्त परिस्थितियों में संपन्न हुईं। आगे की संरचनात्मक जांच के लिए दो और कोर ड्रिलिंग की योजना बनाई गई है। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, ब्रिटिश काल के दौरान वर्ष 1901 से 1904 के बीच मंदिर के जगमोहन में रेत भरी गई थी। उस समय मंदिर की संरचना मौसम के प्रभाव और बिजली गिरने से कमजोर हो गई थी, जिससे उसके ढहने का खतरा उत्पन्न हो गया था। इस खतरे को टालने के लिए पश्चिमी दिशा से लगभग 80 फीट ऊंचाई पर एक सुरंग बनाकर रेत भरी गई थी और बाद में उस मार्ग को पत्थर की दीवार से बंद कर दिया गया। समय के साथ अंदर भरी रेत असमान रूप से सख्त हो गई, जिससे अंदर खाली स्थान (वॉयड) बनने लगे और पत्थरों तथा लोहे के बीम पर आंतरिक दबाव बढ़ने की आशंका पैदा हुई। प्रारंभिक आकलन के अनुसार, संरचना के भीतर कई मीटर तक रेत जमा है, जिसे हटाना अत्यंत संवेदनशील और समय लेने वाली प्रक्रिया है।

13वीं शताब्दी में गंगा वंश के राजा लांगुला नरसिंह देव प्रथम द्वारा निर्मित यह मंदिर सूर्य देव को समर्पित एक अद्भुत स्थापत्य कृति है। समय के साथ मंदिर का मुख्य गर्भगृह और नाट्य मंडप नष्ट हो चुके हैं, जबकि जगमोहन ही इसका प्रमुख संरक्षित हिस्सा बचा हुआ है। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त यह मंदिर देश-विदेश के लाखों पर्यटकों को आकर्षित करता है। हालांकि कुछ संरक्षण विशेषज्ञों ने इतने प्राचीन स्मारक से रेत हटाने के जोखिम को लेकर चिंता जताई है, लेकिन एएसआई ने आश्वस्त किया है कि यह कार्य अत्याधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों और रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम के साथ पूरी सावधानी से किया जा रहा है। एएसआई के एक अधिकारी ने कहा, “यह कोई सामान्य खुदाई नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक संरक्षण प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य स्मारक की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करना है।”

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