संयुक्त राष्ट्र (UN) के विशेषज्ञों ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ जारी अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और जबरन विवाह की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की है। विशेषज्ञों का कहना है कि वहां पर जबरन कन्वर्जन और विवाह एक व्यापक पैटर्न बन चुका है, जिसे सजा न मिलने की स्थिति और कानूनी सुरक्षा के अभाव के कारण बढ़ावा मिल रहा है।
यूएन के विशेषज्ञों ने अपनी ताजा रिपोर्ट में जबरन कन्वर्जन और निकाह पर कड़ी चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र के एक पैनल ने पाकिस्तान सरकार को चेतावनी देते हुए कहा है कि देश में हिंदू और ईसाई लड़कियों का अपहरण कर उन्हें जबरन इस्लाम में परिवर्तित करने और फिर उनकी शादी कराने के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं।
इस रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने साफ शब्दों में कहा है कि किसी भी व्यक्ति का कन्वर्जन पूरी तरह से उसकी इच्छा पर आधारित होना चाहिए न कि दबाव या जबरन।
75 प्रतिशत हिंदू और 25 फीसदी ईसाई लड़कियां शिकार
संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, यह समस्या विशेष रूप से दो अल्पसंख्यक समुदायों को सबसे अधिक प्रभावित कर रही है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पीड़ित महिलाओं में 75 फीसदी हिंदू और 25 प्रतिशत ईसाई लड़कियां शामिल हैं। विशेषज्ञों ने नोट किया कि 14 से 18 वर्ष के बीच की किशोर लड़कियां इन अपराधियों का प्राथमिक लक्ष्य होती हैं। हालांकि, कुछ मामलों में इससे भी कम उम्र की बच्चियों के साथ ऐसी घटनाएं रिपोर्ट की गई हैं।
विशेषज्ञों ने तर्क दिया कि जब पीड़ित एक बच्चे (नाबालिग) होते हैं, तो कानूनी तौर पर पूर्ण और स्वतंत्र सहमति संभव नहीं है।
सिंध प्रांत बना जबरन कन्वर्जन का सेंटर
विशेषज्ञों ने 2025 के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे कुल मामलों के 80 फीसदी केस सिंध प्रांत से सामने आए हैं। वह जबरन कन्वर्जन का केंद्र बनता जा रहा है। जबरन कन्वर्जन के शिकार लोगों को शारीरिक और यौन शोषण, सामाजिक कलंक और गंभीर मानसिक आघात का सामना करना पड़ता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अपराधियों को मिलने वाली छूट और सजा न होना इस प्रथा के जारी रहने का सबसे बड़ा कारण है।
पाकिस्तानी पुलिस और एजेंसियों पर उठे सवाल
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में पाकिस्तान की पुलिस और कानूनी एजेंसियों की भूमिका पर भी कड़े सवाल उठाए गए हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि पीड़ितों के परिवारों द्वारा दर्ज की गई शिकायतों को अक्सर पुलिस गंभीरता से नहीं लेती या उन्हें सिरे से खारिज कर देती है।
साथ ही अपहरण के मामलों में त्वरित जांच का अभाव होता है, जिससे अपराधी को लड़की का जबरन निकाह और कन्वर्जन कराने का समय मिल जाता है। एजेंसियां अक्सर पीड़ितों की सही उम्र का आकलन करने में विफल रहती हैं और जबरन विवाह को ‘अपनी मर्जी से किया गया निकाह’ मानकर कानूनी सुरक्षा प्रदान कर देती हैं।
विशेषज्ञों ने कहा- “कन्वर्जन वास्तव में दबाव से मुक्त होना चाहिए और विवाह पूर्ण और स्वतंत्र सहमति पर आधारित होना चाहिए जो कानूनी रूप से तब संभव नहीं है जब पीड़ित नाबालिग हो।”
विशेषज्ञों ने इससे बचने के समाधान भी बताए
संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान सरकार से इन कुरीतियों को समाप्त करने के लिए तत्काल ‘कानूनी और संस्थागत कार्रवाई’ करने का आह्वान किया है। साथ ही पाकिस्तान के सभी प्रांतों और क्षेत्रों में शादी की न्यूनतम आयु बढ़ाकर 18 वर्ष किए जाने और इसे सख्ती से लागू करने की पैरवी की है। उन्होंने रिपोर्ट में कहा कि जबरन कन्वर्जन को एक अलग और गंभीर अपराध के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए।
इसके अलावा मानव तस्करी और यौन हिंसा से संबंधित कानूनों को इन मामलों में पूरी तरह लागू किया जाना चाहिए।
और अंत में पीड़ितों के लिए सुरक्षित आश्रय स्थल (शेल्टर), कानूनी सहायता, मनोवैज्ञानिक परामर्श और पुनर्वास कार्यक्रम उपलब्ध कराए जाने का सुझाव दिया है।

















