‘स्व’ का बोध, सही समय पर सही निर्णय और राष्ट्र को परम वैभव की ओर ले जाने का संकल्प, ये केवल विचार नहीं, बल्कि एक व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि है। रा.स्व. संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी ने इस विषय पर अपने विचार रखे
जब कोई समाज अपने मूल से जुड़कर समग्रता के साथ आगे बढ़ता है, तभी वह सच्चे अर्थों में सर्वश्रेष्ठ बन सकता है। हमारे देश को स्वतंत्र हुए लगभग आठ दशक हो चुके हैं। स्वतंत्रता के समय भारत के सामने अनेक चुनौतियां थीं-विभाजन की पीड़ा, आर्थिक कमजोरी और अस्थिरता। उसी समय दुनिया में जापान भी एक बड़े संकट से गुजर रहा था। द्वितीय विश्व युद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर अणु बम गिरने से वहां भारी विनाश हुआ, लेकिन जापान ने शीघ्र ही अपने आपको संभाल लिया और आज वह विश्व के अग्रणी देशों में गिना जाता है।
इसी प्रकार जर्मनी का उदाहरण भी हमारे सामने है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उसे पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी में विभाजित कर दिया गया था और दोनों के बीच एक दीवार खड़ी कर दी गई थी। 1989 में उस दीवार को तोड़कर जर्मनी का पुनः एकीकरण हुआ और वह कम समय में ही एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरा। इजराइल का उदाहरण भी प्रेरणादायक है, जिसे 1949 में भूमि मिली और उसने अपनी राष्ट्रीय भावना के बल पर स्वयं को सशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। इन उदाहरणों से यह प्रश्न उठता है कि कौन-सी शक्ति है, जो इन देशों को संकट से उबारकर आगे बढ़ने की क्षमता देती है। इसका उत्तर है, अपने मूल से जुड़ाव और राष्ट्रीय एकता का भाव।
चुनौतियां और वैश्विक धारणा
स्वतंत्रता के समय भारत के बारे में दुनिया में अनेक नकारात्मक धारणाएं थीं। यह कहा गया था कि भारत एकजुट नहीं रह पाएगा और इसके टुकड़े हो जाएंगे। यहां तक कि यह भी कहा गया कि भारत अपने लिए पर्याप्त अन्न उत्पादन नहीं कर सकेगा। लेकिन भारत ने इन सभी आशंकाओं को गलत साबित किया। पिछले 80 वर्षों में भारत ने अपनी एकता को बनाए रखा और हर क्षेत्र में आगे बढ़ने का प्रयास किया।
इस लंबे कालखंड में भारत ने अनेक कठिनाइयों का सामना किया है। चार युद्ध लड़े, विभाजन की त्रासदी झेली और आज भी सीमाओं की असुरक्षा एक चुनौती बनी हुई है। यह भी उल्लेखनीय है कि देश की सीमाओं की जटिलता और असुरक्षा की स्थिति का एक कारण औपनिवेशिक विरासत रही है।
इसके बावजूद भारत ने निरंतर प्रगति की है और आज उसका एक नया स्वरूप सामने आ रहा है, जिसे देखकर विश्व आश्चर्यचकित है। यह परिवर्तन केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति और चेतना का परिणाम है।
युवा निर्धारित करें लक्ष्य
भारत की सुदीर्घ यात्रा कुछ विशेषताओं के साथ आगे बढ़ी है, जिनमें ‘भारत का विचार’ प्रमुख है। यह विचार अध्यात्म पर आधारित है और शाश्वत है। भारत का परिचय उसके सांस्कृतिक स्वरूप से होता है, जो उसके आचरण, परंपराओं और जीवन शैली में दिखाई देता है। भारत का लक्ष्य ‘विश्व मंगल’ और ‘वैश्विक कल्याण’ का है। आज के समय में युवाओं के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वे इस मूल विचार को समझें और अपने जीवन में उतारें। किसी भी राष्ट्र की शक्ति का आकलन उसकी सैन्य, आर्थिक, तकनीकी और सामाजिक शक्ति से किया जाता है। इसलिए युवाओं को इन चारों क्षेत्रों में से किसी एक क्षेत्र में योगदान देने का संकल्प लेना चाहिए। यह राष्ट्र निर्माण के लिए बेहद जरूरी है, इसलिए यह आवश्यक है कि युवा केवल नौकरी तक सीमित न रहें, बल्कि जीवन में एक बड़ा लक्ष्य निर्धारित करें। उन्हें यह तय करना होगा कि वे राष्ट्र निर्माण में किस प्रकार योगदान देंगे। ‘स्व’ का बोध इसी दिशा में पहला कदम है, जो व्यक्ति को अपने कर्तव्य और उद्देश्य के प्रति जागरूक बनाता है।
सही निर्णय लेना जरूरी
‘सही समय पर सही निर्णय लेना’ अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और स्पष्ट दृष्टि की आवश्यकता होती है। एक उदाहरण उस उद्योगपति का है, जो विदेश में सफल जीवन जीने के बावजूद अपने मूल से जुड़ने के लिए भारत लौट आए। उन्होंने अपने गांव में रहकर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य प्रारंभ किए। यह ‘स्व’ के बोध और सही निर्णय का उत्कृष्ट उदाहरण है।
इसी प्रकार बैडमिंटन खिलाड़ी पी.वी सिंधु की प्रेरक कहानी भी सामने आती है, जिसने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अनुशासन और एकाग्रता को अपनाया। अपने गुरु के कहने पर उसने लंबे समय तक मोबाइल का उपयोग छोड़ दिया, जिससे उनकी एकाग्रता बढ़ी और वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता प्राप्त कर सकीं। यह दर्शाता है कि छोटे-छोटे त्याग बड़े परिणाम ला सकते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम ‘सही समय पर सही निर्णय’ लेने का दृढ़ प्रयास करें और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहें।
भारत को सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए समग्रता के साथ सर्वश्रेष्ठता आवश्यक है। यह समावेशी हो, अपने मूल से जुड़ा हो, पर्यावरण के अनुकूल हो और सह-अस्तित्व की भावना पर आधारित हो-तभी सच्चे अर्थों में विकास संभव है। हिंदी में एक कहावत है-‘कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है’, लेकिन इसे इस रूप में समझना अधिक उचित होगा कि ‘कुछ पाने के लिए कुछ बोना पड़ता है’। जब हम अच्छे विचारों और कार्यों के बीज बोते हैं, तभी भविष्य में उनका फल प्राप्त होता है।
इसी संदर्भ में ‘अक्षरम्’ का यह आयोजन एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आता है। यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक ऐसा मंच है जो विमर्श को जन्म देता है, वैचारिक वातावरण का निर्माण करता है और नए विषयों तथा दृष्टिकोणों को समाज के सामने प्रस्तुत करता है। यह आयोजन एक बीज की तरह है, जो भविष्य में एक सशक्त वैचारिक वृक्ष के रूप में विकसित हो सकता है। इसलिए आवश्यक है कि हम ऐसे प्रयासों से जुड़ें, उनका समर्थन करें और स्वयं भी इस वैचारिक बीजारोपण का हिस्सा बनें।
















