भारतीय संगीत जगत में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो समय की सीमाओं से परे चले जाते हैं। आशा भोसले ऐसा ही एक नाम है, एक आवाज, एक ऊर्जा, एक जुनून, जो पीढ़ियों तक दिलों में गूंजता रहेगा।
उनके जाने का समाचार केवल एक कलाकार के जाने का नहीं, बल्कि एक युग के समाप्त होने जैसा है। पर सच यह है कि आशा जी जैसी शख्सियत कभी जाती नहीं, वो अपने गीतों में हमेशा जीवित रहती हैं।
मैं अपने आप को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे उनके साथ काम करने, उन्हें करीब से जानने और उनके व्यक्तित्व को महसूस करने का अवसर मिला। यह सिर्फ पेशेवर रिश्ता नहीं था, बल्कि एक आत्मीय जुड़ाव था, जो आज भी मेरे दिल में उतनी ही गर्माहट के साथ जीवित है।

संघ ने दी श्रद्धाजंलि
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सुप्रसिद्ध गायिका आशा भोसले को भावभीनी श्रद्धाजंलि दी। सरसंघचालक श्री मोहन राव भागवत और सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने उनके निधन पर कहा, “भारत की सुप्रसिद्ध गायिका आशा भोसले के निधन से देश के संगीत क्षेत्र को अपार क्षति हुई है। दशकों तक उन्होंने अपनी साधना से फिल्मों के माध्यम से अजरामर गीतों द्वारा लोकरंजन के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उनकी स्मृति में भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है। भारत की सांस्कृतिक विरासत तथा देशभक्तों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता हमेशा स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त होती रही। उनके इस अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें सम्मानपूर्वक स्मरण किया जाएगा। ॐ शांति।”
जमीन से जुड़ी हुईं कलाकार
मेरे पिता अंजान साहब को आशा जी बहुत मानती थीं। वे अक्सर मुझसे कहा करती थीं। “समीर बेटा, अपने पापा से सीखो, ऐसे पापा बहुत मुश्किल से मिलते हैं।” उनके इस वाक्य में केवल सम्मान नहीं, बल्कि एक गहरा स्नेह छुपा होता था। मेरे पिता के साथ उनका रिश्ता बेहद सहज और आत्मीय था। रिकॉर्डिंग के बाद हम अक्सर एक ही कार में घर लौटते थे। उस समय पापा और आशा ताई फिल्मों या गानों की चर्चा कम करते, बल्कि घर-परिवार, जीवन और साधारण बातों पर बातचीत होती। यही उनकी खूबी थी, इतनी बड़ी कलाकार होकर भी पूरी तरह जमीन से जुड़ी हुई। मैं सिर्फ मूकदर्शक होता था उनकी बातें सुनता था, सीखता था।
सीखने की ललक
आशा जी का काम करने का तरीका अद्भुत था। गाना मिलने के बाद वह उसे सिर्फ गाती नहीं थीं उसे जीती थीं। वह बैठकर गीत को पढ़तीं, समझतीं, हर शब्द के भाव को आत्मसात करतीं। कई बार ऐसा होता कि वह कहतीं “मैं इसे कल रिकॉर्ड करूंगी,” और अगले दिन पूरी तैयारी के साथ आतीं। तभी उनके हर गाने को सुनिए-देखिए ऐसा लगेगा, जिस पर फिल्माया जा रहा है उसी ने गाया है।
उनकी यही मेहनत और लगन उन्हें सबसे अलग बनाती थी। उनके लिए हर गाना पहला गाना होता था उतनी ही ऊर्जा, उतना ही समर्पण। यही कारण है कि उन्होंने हर शैली में अपनी छाप छोड़ी चाहे वह गजल हो, पॉप हो, फिल्मी गीत हो या क्लासिकल।
जादुई आवाज
जब भी मैं उमराव जान फिल्म के गीत सुनता हूं, तो आज भी भौंचक्का रह जाता हूं। उन गजलों में जो नजाकत, जो दर्द और जो अदायगी है, वह केवल आशा जी ही ला सकती थीं। हर सुर में एक कहानी थी, हर अल्फाज में एक एहसास। ‘वह सिर्फ गाती नहीं थीं वह श्रोताओं को उस दुनिया में ले जाती थीं, जहां संगीत ही सब कुछ होता है।
उम्र सिर्फ एक संख्या थी
90 वर्ष की उम्र में भी उनकी ऊर्जा किसी युवा कलाकार से कम नहीं थी। वह लगातार स्टेज शो करती रहीं, नए प्रयोग करती रहीं। उन्हें देखकर यही लगता था कि जैसे उम्र का उनके ऊपर कोई असर ही नहीं। मुझे हमेशा लगता है कि हमें उनसे और अमिताभ बच्चन जी से सीखना चाहिए जहां उम्र के मायने खत्म हो जाते हैं और केवल काम ही जीवन का उद्देश्य बन जाता है।
“जब तक है, बैठना नहीं है- काम, काम और काम।”
शायद यही निरंतर कर्म ही उन्हें ऊर्जा देता था।
मेरे साथ उनके गीत
मेरे लिखे करीब 15–20 गानों को उन्होंने अपनी आवाज दी। यह मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं है। मेरे लिखे गाने मेरी दूसरी फिल्म “अब आयेगा मजा” में उन्होंने गाया और उस अनुभव को मैं कभी भूल नहीं सकता। रिकॉर्डिंग के समय उनका ध्यान, उनका अनुशासन और उनकी विनम्रता सब कुछ प्रेरणा देने वाला था। एक इतने बड़े कलाकार का इतना सरल होना, यही उनकी महानता थी।
किशोर कुमार के साथ यादें
वह अक्सर किशोर कुमार के बारे में हंसते हुए किस्से सुनाती थीं। कहती थीं कि किशोर दा इतने मजाकिया थे कि रिकॉर्डिंग से पहले हमें खूब हंसाते थे, और फिर अचानक एक गंभीर गीत गाकर चले जाते थे और हम फंस जाते थे अपने गाने की रिकॉर्डिंग में हमें किशोर कुमार के मजाक से निकलने में समय लगता था। उनकी बातों में एक मासूमियत होती थी, जैसे वह उन पलों को फिर से जी रही हों।
गुस्सा भी और प्यार भी
आशा जी का स्वभाव बहुत दिलचस्प था। उन्हें गुस्सा आता था पर सिर्फ एक मिनट के लिए। उसके बाद वह फिर से वही सरल, स्नेही इंसान बन जाती थीं। गाने के अलावा उन्हें खाना बनाना और खिलाना बहुत पसंद था। जब भी हम उनके घर जाते, वह खुद खाना बनाकर खिलातीं। वह केवल एक महान गायिका ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन आतिथ्य प्रिय और स्नेहिल इंसान थीं।
आशा ताई को 5 जून, 2025 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर स्थित मुख्यालय में एक कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से वह शामिल नहीं हो सकी थीं। उन्होंने सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत को एक पत्र लिखा था। उस पत्र में उन्होंने संघ और स्वयंसेवकों के कार्यों की प्रशंसा की है-
‘संघ कार्य देश की आशा और सहारा’
आदरणीय सरसंघचालक जी,
“आपके द्वारा कार्यकर्ता विकास वर्ग , द्वितीय के समापन समारोह में आमंत्रण दिए जाने के लिए मैं अत्यंत आभारी हूं। आपने मेरे घर आकर व्यक्तिगत रूप से और बाद में औपचारिक रूप से मुझे आमंत्रित किया, इसके लिए आभार। मेरी यह प्रबल इच्छा थी कि मैं संघ मुख्यालय आकर उन कार्यकर्ताओं को देखूं जो राष्ट्रसेवा के लिए स्वयं को समर्पित करने का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश, अमेरिका से लौटने के बाद अस्वस्थता के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा है। डॉक्टरों ने मुझे पूर्ण विश्राम की सलाह दी है। इसलिए, सारी तैयारियां करने के बाद भी मुझे यह यात्रा भारी मन से रद्द करनी पड़ रही है।” उन्होंने आगे लिखा था, “मैंने संघ के कार्यों को लेकर अपनी शुभेच्छा और भावना पहले ही प्रकट की है। संघ स्वयंसेवक और उनका कार्य हमारे देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए एक बड़ी आशा और सहारा हैं। मैं संघ के कार्यों के लिए हार्दिक शुभकामनाएं देती हूं और यथासंभव सहयोग का आश्वासन भी देती हूं। मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं शीघ्र स्वस्थ होकर आपसे व्यक्तिगत रूप से भेंट कर सकूं। आशा है कि यह शीघ्र ही संभव होगा।” इस पत्र के उत्तर में सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने आशा ताई भोसले को शीघ्र स्वस्थ होने की शुभकामनाएं दीं और शीघ्र मुलाकात का आश्वासन दिया था।
परिवार जैसा रिश्ता
मेरे जीवन के हर महत्वपूर्ण मौके पर वह साथ रहीं। मेरी दोनों बेटियों की शादी में वह आईं, आशीर्वाद दिया और पूरे परिवार के साथ समय बिताया। उनका यह अपनापन हमेशा मेरे दिल में रहेगा। आशा जी के लिए हर नया गाना एक नई शुरुआत होती थी। वह कहती थीं- “जैसे ही गाना मिलता है, लगता है मैं फिर से ऊर्जावान हो गई हूं।”
यह सिर्फ एक पंक्ति नहीं, बल्कि उनका जीवन दर्शन था। उन्होंने हर दिन को, हर पल को पूरी तरह जिया। वो कहती थीं मेरे लिए हरेक गाना समर्पण है, फिल्म एक सागर है और मेरे गाए गाने उस सागर की बूंदें। इतनी सरल थीं, हमारी आशा ताई। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो महसूस करता हूं कि हमने केवल एक महान कलाकार के साथ काम नहीं किया, हमने एक युग को जिया है। ईश्वर का धन्यवाद करता हूं कि मुझे उस दौर में रहने का अवसर मिला, जहां मैं आशा जी से मिला, उनके साथ काम किया और उनसे सीखा। उनकी आवाज, उनकी मुस्कान, उनकी ऊर्जा सब कुछ हमेशा हमारे साथ रहेगा। मेरा तो कहना है वो कहते हैं न जब कोई परेशानी हो दुःख हो तो भगवद्गीता का कोई भी पेज पढ़ लीजिए, समाधान मिल जायेगा। उसी तरह ऐसा होने पर आशा जी के कोई भी गाना सुन लीजिए ऊर्जा मिल जायेगी।
एक ही आशा थी, है और हमेशा रहेगी आशा भोसले।
उनके गीतों में, उनकी यादों में, और हमारे दिलों में।















