तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (द्रमुक) नीत धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन की हार की पटकथा पुडुचेर्री में हुए विधानसभा चुनाव में ही तैयार कर दिया गया था. कांग्रेस पार्टी और द्रमुक का तमिलनाडु के ही तर्ज़ पर पुडुचेर्री में भी गठबंधन था. मगर इस गठबंधन का जो हश्र वर्तमान में तमिलनाडु में हो रहा हैं वही हश्र केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में भी हुआ था. पुडुचेर्री विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी बड़ी पार्टी के तौर पर इस गठबंधन की मुख्य दल था और पुडुचेर्री के कांग्रेस पार्टी के सांसद वे वैथिलिंगम मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे.
गठबंधन में सीट बंटवारे की कमी बनी हार की वजह
जनता द्वारा निर्वाचित 30 सदस्यीय पुडुचेर्री विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने 21 उम्मीदवार उतारे थे वही द्रमुक ने भी 13 सीटों पर उम्मीदवार उतारा था. इस गठबंधन का तीसरा दल विदुथलाई चिरुथैगल काची भी चार सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, इस गठबंधन से 30 सीटों पर कुल 38 उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे. पुडुचेर्री में गठबंधन के इतने बुरे हश्र के लिए कांग्रेस पार्टी जिम्मेद्वार थी क्योंकि सबसे बड़ा दल होने के नाते इस पार्टी का यह फ़र्ज़ था की वो सीटों का समुचित बटवारा अपने सहयागियों के बीच करे.
भाजपा से सीखने की जरूरत पर जोर
कांग्रेस पार्टी को भाजपा से सीखना चाहिए की कैसे अपने सहयोगियों के बीच सीट का बंटवारा अपनी सीट को काटकर भी करे. बिहार में 2019 के लोकसभा के चुनाव में भाजपा अपने जीते हुए पांच सीटों पर अपने सहयोगी जनता दल यूनाइटेड को बिना किसी लोभ के दे दिया. झारखंड में भाजपा ने 2024 में अपने सहयोगी ऑल झारखण्ड स्टूडेंट्स यूनियन को गिरिडीह की सीट दे दिया. गिरिडीह की सीट भाजपा की राज्य में सबसे मजबूत सीट थी और 1996 के बाद केवल एक बार 2004 में पार्टी इस सीट को हारी थी. 2004 में झारखण्ड में भाजपा कोडरमा सीट को छोड़कर सभी सीटों पर हार गई थी.
गठबंधन में सामंजस्य की कमी साफ दिखी
मगर कांग्रेस पार्टी ने कोई भी प्रयास नहीं किया जिससे की पुडुचेर्री में धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन में सीट का समुचित गठबंधन हो सके. यही काम तमिलनाडु में द्रमुक ने अच्छे से किया हैं. चुनाव प्रचार में भी कांग्रेस पार्टी और द्रमुक में पुडुचेर्री में विखराव साफ़ दिखा और दोनों दलों में प्रचार में कोई भी सामंजस्य नहीं देखा गया.
द्रमुक प्रमुख स्टालिन और कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी एक ही दिन चुनाव प्रचार के लिए पुडुचेर्री में थे मगर दोनों ने मंच साझा नहीं किया और ना ही अपने सम्बोधन में एक दूसरे का नाम लिया.
राहुल गांधी के कदम से गठबंधन में और दरार
राहुल गाँधी ने द्रमुक और वीसीके दलों पर पुडुचेर्री में नमक छिड़क दिया जब राहुल गाँधी ने इन दलों के खिलाफ चुनाव लड़ रहे बागी पार्टी उम्मीदवारों के साथ 6 अप्रैल, 2026 को हवाईअडडे पर ना सिर्फ मुलाकात किया बल्किउनके साथ फोटो भी खिंचवाया था. इस फोटो के मार्फत राहुल गाँधी ने अपने समर्थको को यह सन्देश देने का प्रयास किया था की उन उम्मीदवारों द्वारा लड़े जाने वाले सीटों पर धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन के अन्य पार्टी के उम्मीदवारों के बदले इनको मतदान करे.
यह किसी भी गठबंधन सहयोगी के लिए नागवार गुजरने वाली स्थिति होती हैं. राहुल गांधी के ऐसे आचरण के कारण तमिलनाडु में धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन नाममात्र का बनकर रह गया हैं और तमिलनाडु में द्रमुक समर्थक कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवारों को मतदान करने से बचेंगे वही कांग्रेस पार्टी के समर्थक द्रमुक उम्मीदवारों को.
पुडुचेर्री की राजनीति का तमिलनाडु पर प्रभाव
पुडुचेर्री यधपि छोटा प्रदेश हैं मगर पुडुचेर्री की राजनीति का पड़ोसी राज्य तमिलनाडु में बहुत असर पड़ता हैं। 1972 में द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम से अलग होकर एम् जी रामचंद्रन द्वारा अखिल भारतीय द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम बनाने के बाद इस पार्टी की पहली सरकार तमिलनाडु में नहीं बल्कि पुडुचेर्री में बनी थी।
1974 में पुडुचेर्री में अखिल भारतीय द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम द्वारा विधानसभा जीतकर एस रामासामी के नेतृत्व में सरकार बनाई गई थी।
पुडुचेर्री में अखिल भारतीय द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के सरकार बनाने का सीधा असर 1977 में तमिलनाडु में देखने को मिला जब इस पार्टी ने अखिल भारतीय द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने करुणानिधि के नेतृत्ववाली द्रविड़ मुनेत्र कड़गम को बुरी तरह चुनाव हराकर तमिलनाडु में पहली बार सरकार बनाई थी। 1974 में पुडुचेर्री के जनमत का सीधा असर तमिलनाडु में 1977 में देखने को मिला था।
















