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एक राष्ट्र, एक शैक्षिक न्याय: धार्मिक शिक्षा में समान अधिकारों की अनिवार्यता

शिक्षा जैसे मूलभूत और संवेदनशील क्षेत्र में आज भी एक ऐसा असंतुलन विद्यमान है, जिसे न तो अनदेखा किया जा सकता है और न ही अनंत काल तक टाला जा सकता है।

Written byडॉ. दिनेश शर्माडॉ. दिनेश शर्मा
Apr 16, 2026, 11:20 pm IST
inभारत, मत अभिमत
दिनेश शर्मा, राज्यसभा सदस्य

दिनेश शर्मा, राज्यसभा सदस्य

मैं, जब राज्यसभा में इस विषय को उठाने के लिए खड़ा हुआ, तब मेरे मन में एक सीधा और स्पष्ट प्रश्न था-क्या भारत में समानता केवल संविधान के पन्नों तक सीमित है, या वह हमारे तंत्र और व्यवहार में भी प्रतिबिंबित होती है? यह प्रश्न इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि शिक्षा जैसे मूलभूत और संवेदनशील क्षेत्र में आज भी एक ऐसा असंतुलन विद्यमान है, जिसे न तो अनदेखा किया जा सकता है और न ही अनंत काल तक टाला जा सकता है। यह केवल नीति का प्रश्न नहीं, बल्कि भारत के बौद्धिक, सांस्कृतिक और संवैधानिक भविष्य का प्रश्न है।

हमारा संविधान, विशेष रूप से अनुच्छेद 29 और 30, देश के अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति के संरक्षण तथा अपने शैक्षिक संस्थान स्थापित एवं संचालित करने का अधिकार प्रदान करता है। इन प्रावधानों का उद्देश्य भारत की विविधता को सुरक्षित रखना और प्रत्येक समुदाय को अपनी पहचान के साथ आगे बढ़ने का अवसर देना रहा है। यह व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण और सराहनीय है। किंतु दशकों के अनुभव और बदलते सामाजिक परिदृश्य ने यह संकेत दिया है कि इन प्रावधानों की व्याख्या और क्रियान्वयन में एक ऐसा व्यावहारिक असंतुलन उभर आया है, जिसे अब गंभीरता से देखने की आवश्यकता है।

समानता के सिद्धांत का गहरा अंतर्विरोध

आज स्थिति यह है कि अल्पसंख्यक संस्थानों को सरकारी सहायता प्राप्त होने के बावजूद अपने धार्मिक ग्रंथों (कुरान या बाइबिल) की शिक्षा देने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है। वहीं दूसरी ओर, हिंदू समाज द्वारा संचालित शैक्षिक संस्थानों को यदि वेद, उपनिषद या भगवद्गीता जैसे ग्रंथों का अध्ययन कराना हो, तो उन्हें ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर दिया जाता है। यह विरोधाभास केवल नीतिगत विसंगति नहीं, बल्कि समानता के सिद्धांत के साथ एक गहरा अंतर्विरोध भी है।

मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि यह मुद्दा किसी भी प्रकार से किसी समुदाय के अधिकारों को कम करने का नहीं है। यह किसी भी प्रकार की प्रतिस्पर्धा या टकराव का विषय नहीं है। यह केवल इस बात का आग्रह है कि जो अधिकार एक वर्ग को प्राप्त हैं, वही अधिकार अन्य सभी नागरिकों को भी समान रूप से प्राप्त हों। यही हमारे संविधान की मूल भावना है-समानता, न कि विशेषाधिकार।

अल्पसंख्यक संस्थानों को कई छूट

शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के संदर्भ में भी यही असमानता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। जहां अल्पसंख्यक संस्थानों को इस अधिनियम के कई प्रावधानों से छूट प्राप्त है, वहीं अन्य संस्थानों, विशेष रूप से हिंदू-संचालित निजी शिक्षण संस्थानों को इसके सभी नियमों का पालन करना पड़ता है। इससे इन संस्थानों पर प्रशासनिक और आर्थिक दबाव बढ़ता है, जो उनकी स्वायत्तता, गुणवत्ता और दीर्घकालिक विकास को प्रभावित करता है।

यह केवल सैद्धांतिक विमर्श नहीं है, बल्कि इसका व्यावहारिक आधार भी है। रामकृष्ण मिशन द्वारा अपने शैक्षिक संस्थानों के लिए अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त करने का प्रयास, आर्य समाज द्वारा संचालित डीएवी संस्थानों की पहल, तथा कर्नाटक के लिंगायत समुदाय के प्रयास- ये सभी इस तथ्य के प्रमाण हैं कि वर्तमान व्यवस्था में कहीं न कहीं एक संरचनात्मक असंतुलन मौजूद है। यदि विभिन्न संस्थाएँ स्वयं को ‘अल्पसंख्यक’ सिद्ध करने का प्रयास करें, तो यह संकेत देता है कि प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है।

न्यायसंगत नहीं है यह परंपरा

भारतीय शिक्षा परंपरा का इतिहास इस बात का साक्षी है कि यहां शिक्षा केवल जानकारी देने का माध्यम नहीं रही, बल्कि यह जीवन मूल्यों, नैतिकता और संस्कारों के निर्माण का आधार रही है। गुरुकुल परंपरा से लेकर आधुनिक शिक्षा तक, ज्ञान और आचार का समन्वय हमारी पहचान रहा है। ऐसे में यदि एक वर्ग को अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को शिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ाने का अधिकार है, तो अन्य वर्गों को उससे वंचित रखना न तो न्यायसंगत है और न ही तार्किक।

समानता का सिद्धांत न पड़े कमजोर

यह भी उतना ही आवश्यक है कि हम अल्पसंख्यक अधिकारों की संवैधानिक सुरक्षा को अक्षुण्ण बनाए रखें। भारत की विविधता उसकी शक्ति है, और इसे संरक्षित करना हमारा दायित्व है। परंतु इस संरक्षण के साथ-साथ यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि समानता का सिद्धांत किसी भी स्तर पर कमजोर न पड़े। समानता का अर्थ है-सभी के लिए समान अवसर, समान अधिकार और समान सम्मान। इसी दृष्टिकोण से मैंने राज्यसभा में यह सुझाव रखा कि अनुच्छेद 29 और 30 में आवश्यक संशोधन कर ‘अल्पसंख्यक’ शब्द के स्थान पर ‘सभी नागरिकों’ को शामिल किया जाए। इससे न केवल एकरूपता आएगी, बल्कि यह भी सुनिश्चित होगा कि धार्मिक शिक्षा और संस्थागत स्वायत्तता का अधिकार किसी एक वर्ग तक सीमित न रहकर सभी के लिए उपलब्ध हो।

तब तक समरसता का लक्ष्य रहेगा अधूरा

‘एक राष्ट्र, एक कानून’ का विचार आज केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक आवश्यक नीति-दिशा के रूप में उभर रहा है। जब तक हमारे कानूनों और नीतियों में समानता नहीं होगी, तब तक सामाजिक समरसता का लक्ष्य अधूरा रहेगा। शिक्षा के क्षेत्र में यह समानता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही वह आधार है, जिस पर भविष्य की पीढ़ियाँ अपने विचार और मूल्य निर्मित करती हैं।

वक्तव्य को 17 सांसदों का समर्थन मिला

राज्यसभा में मेरे इस वक्तव्य को 17 अन्य माननीय सांसदों का समर्थन प्राप्त होना इस बात का संकेत है कि यह विषय केवल व्यक्तिगत चिंता नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन चुका है। यह समय है कि हम इस मुद्दे पर भावनाओं से ऊपर उठकर संवैधानिक और नीतिगत दृष्टिकोण से विचार करें।

भारत के भविष्य को तय करने वाली बहस

अंततः, मैं पूरे विश्वास और दृढ़ता के साथ यह कहना चाहता हूं कि यदि हम वास्तव में अपने संविधान की आत्मा के प्रति निष्ठावान हैं, तो हमें समानता को केवल सिद्धांत के रूप में नहीं, बल्कि व्यवहारिक व्यवस्था के रूप में स्थापित करना होगा। यह बहस किसी एक वर्ग के अधिकारों की नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की दिशा तय करने वाली बहस है। आज लिया गया निर्णय आने वाली पीढ़ियों के लिए न्याय, संतुलन और समरसता की नई आधारशिला रखेगा। अब समय आ गया है कि हम समानता के इस अधूरे वचन को पूर्ण करें- और शिक्षा के क्षेत्र से ही एक न्यायपूर्ण, संतुलित और आत्मविश्वासी भारत की शुरुआत करें।

 

Topics: दिनेश शर्माभारत का संविधानअल्पसंख्यक संस्थानएक राष्ट्र एक शैक्षिक न्यायसमानता का सिद्धांतसमान अधिकारराज्यसभा सदस्य
डॉ. दिनेश शर्मा
डॉ. दिनेश शर्मा
(डॉ दिनेश शर्मा शिक्षाविद् हैं, वह उ० प्र० के पूर्व उप-मुख्यमंत्री रह चुके हैं, वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं) [Read more]
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