असम : घुसपैठियों के पीछे कांग्रेस का हाथ
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असम : घुसपैठियों के पीछे कांग्रेस का हाथ!

असम में घुसपैठ का सवाल सिर्फ जनसंख्या परिवर्तन का नहीं, बल्कि इतिहास, राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी लंबी बहस का हिस्सा है। विभाजन के बाद कांग्रेस की सेकुलर राजनीति और उसके नेताओं द्वारा लिए गए निर्णयों के कारण यहां ऐसी परिस्थितियां बनीं

Written byअभय कुमारअभय कुमार
Mar 10, 2026, 08:52 am IST
in असम
असम में पकड़े गए बांग्लादेशी घुसपैठिए (फाइल चित्र)

असम में पकड़े गए बांग्लादेशी घुसपैठिए (फाइल चित्र)

घुसपैठ किसी एक प्रदेश या क्षेत्र की समस्या नहीं बल्कि पूरे भारत की आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक संतुलन और राजनीतिक स्थिरता से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। असम उन राज्यों में है जिसने इसका सबसे अधिक प्रभाव झेला है। वोट बैंक के लालच में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने इस तरफ से आंखें बंद रखीं। नतीजतन राज्य में बंग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों की संख्या बढ़ती गई।

असम में घुसपैठियों के खिलाफ सबसे पहले संगठित आवाज उठाने वाले भारत रत्न गोपीनाथ बोरदोलोई थे। वे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और असम के पहले मुख्यमंत्री थे। उल्लेखनीय है कि उन्हें भारत रत्न वर्ष 1999 में एनडीए की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान प्रदान किया गया। स्वतंत्रता सेनानी बोरदोलोई ने 1930 के दशक में ही असम की सांस्कृतिक पहचान और जनसांख्यिकीय संतुलन को लेकर चिंता जताई थी। उस समय मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग अंग्रेज सरकार के सहयोग से बाहरी मुसलमानों को असम में बसाने की नीति पर काम कर रही थी। 1938 में जब बोरदोलोई पहली बार असम के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने इस बसावट का कड़ा विरोध किया और अवैध रूप से बसाए गए लोगों को हटाने की पहल की।

बोरदोलोई को आशंका थी कि असम में मुसलमानों की आबादी बढ़ाकर मुस्लिम लीग भविष्य में इसे पूर्वी पाकिस्तान में मिलाने की रणनीति पर काम कर रही है।

कैबिनेट मिशन योजना और असम का प्रश्न

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मार्च 1946 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में कैबिनेट मिशन भेजा। इस मिशन की योजना के अनुसार भारत को तीन समूहों-ए, बी और सी-में बांटने का प्रस्ताव रखा गया। ग्रुप सी में बंगाल और असम को एक साथ रखा गया था।
यदि दोनों राज्यों की संयुक्त आबादी को देखा जाता तो यह समूह मुस्लिम बहुल बन जाता, जिससे मुस्लिम लीग का प्रभाव स्थायी रूप से स्थापित हो सकता था, जबकि उस समय असम में लगभग 70 प्रतिशत आबादी हिंदू थी। कांग्रेस ने प्रारंभ में कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार कर लिया, लेकिन बोरदोलोई ने इसका विरोध किया और पूरे असम में आंदोलन छेड़ दिया। उनकी दृढ़ता के कारण अंततः कांग्रेस को अपने रुख पर पुनर्विचार करना पड़ा। कहा जाता है कि उनके आग्रह के आगे महात्मा गांधी को भी झुकना पड़ा और अंततः योजना को अस्वीकार कर दिया गया। इस प्रकार असम को पूर्वी पाकिस्तान में शामिल होने से बचाया गया।

असम को मुस्लिम बहुल राज्य बनाने के सूत्रपात करने वाले और इस काम को आगे बढ़ाने वाले सर सैयद मोहम्मद सादुल्लाह थे, उन्हें उत्तर पूर्व का जिन्ना कहा जाता था। 1940 के दशक में असम में मुस्लिम लीग की प्रांतीय सरकार थी और इसके मुखिया सैयद मोहम्मद सादुल्लाह थे। सादुल्लाह ने बड़ी तादाद में बाहरी मुसलमानों को असम में बसाया था। अनाज उत्पादन बढ़ाने के नाम पर बाहरी मुसलमान किसानों यहां बड़े पैमाने पर बसाया गया था। दरअसल यह अन्न उत्पादन बढ़ाने की योजना नहीं बल्कि मुसलमानों की आबादी बढ़ाने की योजना थी, इसका जिक्र 1 अक्टूबर 1943 से 21 फरवरी 1947 तक भारत के 23वें वायसराय और गवर्नर-जनरल रहे वॉइस लॉर्ड वेवेल ने भी किया था। पाकिस्तान बनने के बाद भी सादुल्लाह असम में ही रहे और स्वतंत्र भारत की संविधान सभा के सदस्य बने। 29 अगस्त 1947 को नेहरू सरकार ने उन्हें संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी में भी शामिल किया, जिसके अध्यक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर थे।

आजादी के बाद भी असम में जनसांख्यिकी परिवर्तन करने का खेल यथावत जारी रहा। साथ ही गोपीनाथ बोरदोलोई का संघर्ष भी इसके खिलाफ जारी रहा। पूर्वी पाकिस्तान यानी वर्तमान बांग्लादेश से बड़ी संख्या में मुसलमान असम आ रहे थे। 5 मई 1948 को मुख्यमंत्री बोरदोलोई ने तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को पत्र लिखकर पूर्वी पाकिस्तान से हो रही मुस्लिम शरणार्थियों की बढ़ती आमद पर चिंता जताई। उन्होंने लिखा, “यदि असम को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखना है तो अवैध प्रवेश रोकने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे। हमें यह ध्यान में रखना होगा कि विभाजन के पहले पाकिस्तान की असम में रुचि थी। हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यदि असम को भारत का अंग बनाए रखना है तो घुसपैठ को रोकने के लिए हमें बल प्रयोग की अनुमति
दी जाए।”

नेहरू का दृष्टिकोण

1950 आते-आते असम में मुस्लिम घुसपैठियों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ने लगी जिस कारण सरदार पटेल बहुत चिंतित थे। उन्होंने अपनी मृत्यु से कुछ दिन पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू को एक पत्र भी लिखा था। नेहरू ने इस समस्या को टालने के लिए एक अलग ही मोड़ दे दिया। नेहरू ने एक अक्टूबर 1950 को सरदार पटेल के पत्र का जवाब दिया। उन्होंने लिखा, “प्रिय बल्लभ भाई, आपने पूर्वी पाकिस्तान से असम आने वाले मुस्लिम घुसपैठियों के बारे में मुझे पत्र लिखा था कि हमें इनके प्रवेश पर रोक लगाने की कोशिश करनी चाहिए। ऐसे व्यक्तियों की संख्या बहुत ज्यादा दिखाई नहीं देती है।

सामान्य तौर पर यह रोजगार ढूंढने वाले लोगों की भी आवाजाही है।” इस पत्र से स्पष्ट होता है कि नेहरू गुपचुप तरीके से मुस्लिम जनसंख्या बढ़ाकर अपने वोटबैंक को मजबूत करना चाहते थे। 1950 में गोपीनाथ बोरदोलोई का निधन हो गया और इसके कुछ दिन बाद सरदार पटेल भी नहीं रहे। ये दोनों नेता और कुछ समय तक जीवित होते तो इस समस्या का उसी समय समाधान हो जाता। असम में घुसपैठ को रोकने वाला कोई नहीं था।

आजादी के बाद असम कांग्रेस में मोइनुल हक चौधरी का उदय हुआ। वे स्वतंत्रता से पूर्व मुस्लिम लीग से जुड़े रहे थे, कुछ समय के लिए मोहम्मद अली जिन्ना के प्राइवेट सेक्रेटरी भी रहे। बाद में वह कांग्रेस में शामिल हुए। पांच बार विधायक बने और 1967 में असम सरकार में मंत्री रहे। 1971 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें केंद्र सरकार में औद्योगिक विकास मंत्री बनाया।

मोइनुल हक चौधरी की असम की सोच का जिक्र असम के पूर्व राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल एस. के. सिन्हा की एक रिपोर्ट मिलता है, जो उन्होंने 8 नवंबर 1998 को भारत सरकार को सौंपी थी। इस रिपोर्ट में उन्होंने विस्तार से असम में होने वाली घुसपैठ पर प्रकाश डाला है। इस रिपोर्ट में लेफ्टिनेंट जनरल सिन्हा ने मोइनुल हक चौधरी के बारे में लिखा है कि जब देश के बंटवारे की मांग हो रही थी तो यह माना जा रहा था कि पूर्वी पाकिस्तान में बंगाल के साथ-साथ असम को भी मिला लिया जाएगा। मोहम्मद अली जिन्ना के निजी सचिव मोइनुल हक चौधरी, जो आजादी के बाद असम में मंत्री बने और बाद में केंद्र सरकार में भी मंत्री पद पर रहे, उन्होंने जिन्ना से कहा था कि हम असम को चांदी की थाली में रखकर आपको सौंप देंगे। मुस्लिम लीग से आजादी के बाद कांग्रेस में आए मोइनुल हक चौधरी जैसे नेताओं के सिर पर कांग्रेस के पुराने और वरिष्ठ नेता फकरुद्दीन अली अहमद का हाथ था।

सिर्फ लेफ्टिनेंट जनरल एस के सिन्हा ही नहीं बल्कि नेहरू परिवार के सदस्य और 1968 से 1973 तक असम के राज्यपाल रहे ब्रजकुमार नेहरू अपनी किताब, ‘nice guys finish second’ में लिखते हैं, “जब-जब उन्होंने असम में घुसपैठ की समस्या को उठाया तो उसे फकरुद्दीन अली अहमद जैसे नेताओं ने मुसलमानों पर अत्याचार बताकर इंदिरा सरकार से खारिज करवा दिया।” किताब की पृष्ठ संख्या 43 पर वह लिखते हैं,“मेरे कार्यकाल के दौरान घुसपैठियों को निकालने के प्रयास शुरू हुए थे लेकिन फकरुद्दीन अली अहमद, मोइनुल हक चौधरी और डी के बरुआ ने दिल्ली में जाकर यह शोर मचाया कि असम में मुसलमानों पर अत्याचार किए जा रहे हैं। केंद्र सरकार ने इस शोर का समर्थन किया क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान से आए मुसलमान कांग्रेस के लिए वोट बैंक थे।

आज भी असम और सीमांचल क्षेत्र में घुसपैठ का मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में है। असम का इतिहास बताता है कि यह केवल जनसांख्यिकीय परिवर्तन का प्रश्न नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान, राजनीतिक संतुलन और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय रहा है। इतिहास के इन प्रसंगों को समझना इसलिए आवश्यक है, ताकि वर्तमान नीतियों और निर्णयों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सके।

Topics: मुस्लिम लीगप्रमुख व्यक्तित्वआंतरिक सुरक्षागोपीनाथ बोरदोलोईवोट बैंक की राजनीतिसर सैयद मोहम्मद सादुल्लाहपूर्वी पाकिस्तानमोइनुल हक चौधरीपाञ्चजन्य विशेषफकरुद्दीन अली अहमदभारत का संविधानलेफ्टिनेंट जनरल एस.के. सिन्हा रिपोर्टअवैध प्रवासनकैबिनेट मिशन योजनाअभय कुमारजनसांख्यिकीय संतुलनविभाजन की राजनीति
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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