पश्चिम बंगाल चुनाव-2026 : घुसपैठियों के लिए भारत को दिया घाव
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पश्चिम बंगाल चुनाव-2026 : घुसपैठियों के लिए भारत को दिया घाव

जब न्यायिक अधिकारियों को ही उन्मादी भीड़ बंधक बना ले तो लोकतंत्र पर सवाल उठाना लाजमी हो जाता है। मोथाबाड़ी में जो हुआ वह एक सुनियोजित साजिश था

Written byविप्लव विकासविप्लव विकास
Apr 16, 2026, 07:12 pm IST
inविश्लेषण, पश्चिम बंगाल
उन्मादी भीड़ द्वारा की गई आगजनी

उन्मादी भीड़ द्वारा की गई आगजनी

मालदा जिले के मोथाबाड़ी विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत कालियाचक-2 ब्लॉक के सरकारी दफ्तर के बाहर एक अप्रैल की रात कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरे देश को हिला दिया। सात न्यायिक अधिकारी, जिनमें तीन महिला अधिकारी भी शामिल थीं, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का कार्य कर रहे थे। अचानक भीड़ ने कार्यालय को चारों तरफ से घेर लिया। सड़कें अवरुद्ध कर दी गईं, वाहनों में तोड़फोड़ हुई और पुलिस पर पथराव किया गया। रात करीब बारह बजे तक सारे अधिकारी अंदर बंद रहे, बाद में केंद्रीय बलों की मदद से उन्हें बाहर निकाला गया। यह भारत में संभवतः इस प्रकार की पहली घटना है जब न्यायिक अधिकारियों को 9 घंटे से अधिक समय तक बंधक बनाए रखा गया, और स्थानीय प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। केंद्रीय बलों की सक्रियता से न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षित निकाला जा सका। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे “कानून-व्यवस्था का पूर्ण पतन” करार दिया।

तृणमूल की मंत्री थी शामिल

उन्मादी भीड़ ने सड़कें जाम कीं, वाहनों में तोड़फोड़ की और पुलिस कर्मियों पर हमला किया। एक अधिकारी को करीब नौ घंटे तक एक वाहन के अंदर बंद कर रखा गया। बंधक बने अधिकारियों ने कई बार मदद मांगी, पुलिस को कई बार फोन किए गए। बावजूद इसके पुलिस बेहद देर से वहां पहुंची। बाहर की तस्वीरों और वीडियो में तृणमूल की मोथाबाड़ी विधायक और ममता बनर्जी सरकार में कैबिनेट मंत्री सबीना यासमीन प्रदर्शनकारियों के बीच बैठी और उनके लिए खाना बनाती दिखाई दीं। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।

मोथाबाड़ी क्षेत्र की पृष्ठभूमि

मोथाबाड़ी विधानसभा क्षेत्र मालदा जिले में स्थित है और बांग्लादेश सीमा से सटा हुआ है। यह इलाका मुस्लिम-बहुल है और दशकों से तृणमूल और कांग्रेस के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र रहा है। मालदा जिले में लंबे समय से घुसपैठ और मुस्लिम वोट-बैंक की राजनीति हो रही है। यह क्षेत्र बार-बार सांप्रदायिक तनाव और चुनावी हिंसा का केंद्र बनता है। मोथाबाड़ी, सुजापुर, इंग्लिश बाज़ार, मानिकचक, रतुआ और अमृती जैसी मालदा की सीटें एसआईआर प्रक्रिया से सबसे अधिक प्रभावित हैं, जो इस जिले को चुनावी दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील बनाती हैं।

प्रशासन और पुलिस की भूमिका

इस घटना के बाद से पुलिस और जिला प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कह रही हैं कि उन्हें इस घटना की जानकारी राज्य अधिकारियों ने नहीं बल्कि मीडिया रिपोर्टों से मिली। ममता बनर्जी की राजनीति को समझने वाले उनकी इस दलील से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि हर घटना के बाद वह ऐसी ही बातें करती हैं।

प. बंगाल सबसे ध्रुवीकृत राज्य

सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल को “सबसे अधिक ध्रुवीकृत राज्य” बताया है। न्यायालय ने कहा कि मालदा में न्यायिक अधिकारियों का घेराव “पूर्व-नियोजित, सुनियोजित और प्रेरित” कदम था, जिसका मकसद चुनावी प्रक्रिया को पटरी से उतारना था। यह हमला न्यायिक अधिकारियों को निराश करने और उन्हें अपने कर्तव्यों से विरत करने का “जानबूझकर और सुनियोजित” प्रयास था। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने स्पष्ट कहा है कि केंद्रीय बल पश्चिम बंगाल से नहीं हटाए जाएंगे, और यदि राज्य तंत्र विफल हुआ तो न्यायालय हस्तक्षेप करेगा।

“पश्चिम बंगाल के मालदा में न्यायिक अधिकारियों के साथ जो अभद्रता और हिंसा हुई है, वह लोकतंत्र के लिए अत्यंत चिंताजनक है। तृणमूल कांग्रेस के शासन में अब संवैधानिक संस्थाओं पर हमले करना एक सामान्य बात हो गई है। राज्य सरकार और वहां के उपद्रवी मिलकर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और न्यायपालिका को डराने का प्रयास कर रहे हैं ताकि निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया में बाधा डाली जा सके। बंगाल की जनता इस अराजकता को देख रही है और समय आने पर इसका करारा जवाब देगी। भारत सरकार इस स्थिति पर करीब से नजर बनाए हुए है।”

सोची-समझी साजिश

यह महज एक स्थानीय घटना नहीं बल्कि सोची-समझी साजिश है। दरअसल चुनाव आयोग ने एसआईआर के दौरान राज्यभर में 1.36 करोड़ मतदाताओं को “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” श्रेणी में रखा है, यानी इन नामों को न हटाया गया, न बरकरार रखा गया, बल्कि इन्हें “अंडर एडज्यूडिकेशन” (न्यायिक/प्रशासनिक निर्णय लंबित) श्रेणी में रखा गया है। अकेले मोथाबाड़ी विधानसभा क्षेत्र में करीब 30,000 मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। बता दें कि एसआईआर प्रक्रिया के प्रारम्भ होते ही जनता में इसके विरोध की भावना और भ्रम की स्थिति तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों ने उत्पन्न कर दी थी। खासकर ऐसे घुसपैठिए, जो भारतीय नागरिक नहीं हैं, परंतु स्थानीय तंत्र के माध्यम से भारतीय पहचान पत्र और मतदाता पत्र बनवा चुके हैं, उनके लिए तो स्थिति और भी खराब हो गई।

ऐसे में एसआईआर में गड़बड़ी का आरोप लगाकर स्थानीय मतदाता के अधिकार के बहाने सोच-समझकर अस्थिरता उत्पन्न करने का षड्यंत्र रचा गया। चुनाव आयोग ने पड़ोसी राज्यों ओडिशा और झारखंड के अधिकारियों को तैनात करके इस समस्या और अधिकारियों की संख्या के अभाव का समाधान खोजा। परंतु पश्चिम बंगाल में तृणमूल वैसी ही राजनीति कर रही है जैसी वहां वामपंथी सरकार के समय होती थी। जो प्रक्रिया लोकतंत्र को शुद्ध करने के लिए शुरू की गई, उसे स्थानीय दलों द्वारा लोकतांत्रिक भरोसे को खत्म करने का कारण बनाया गया। मोथाबाड़ी में हुई घटना बंगाल के लोकतंत्र की एक कठोर परीक्षा है। सात न्यायिक अधिकारियों का घेराव सिर्फ उस रात की हिंसा का मामला नहीं, यह उस गहरे षड्यंत्र का नमूना है।

तुष्टिकरण की राजनीति

ममता बनर्जी की सरकार कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक निष्पक्षता से अधिक वोट-बैंक आधारित राजनीति को तरजीह देती है। मोथाबाड़ी जैसी घटनाएं इसी कारण घटित होती हैं, जहां संवैधानिक प्रक्रिया के बीच न्यायिक अधिकारियों को ही भीड़ के सामने असुरक्षित छोड़ दिया गया। यह मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक भी है। यदि पुलिस और स्थानीय प्रशासन समय पर कार्रवाई करने में विफल रहते हैं, तो यह संकेत देता है कि या तो उन पर दबाव है या फिर वे स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम नहीं हैं। मोथाबाड़ी कांड में देरी से हस्तक्षेप और केंद्रीय बलों पर निर्भरता इस कमजोरी को उजागर करती है। लोकतंत्र की मजबूती निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया, सुरक्षित प्रशासनिक ढांचे और कानून के समान अनुपालन पर टिकी होती है। यदि सरकारें इन मूल सिद्धांतों से समझौता करती हैं, तो उसका सीधा असर जनता के विश्वास पर पड़ता है। बंगाल के लिए यह एक चेतावनी है, राजनीतिक लाभ के लिए सामाजिक संतुलन और कानून-व्यवस्था से समझौता दीर्घकाल में राज्य को अस्थिर ही करेगा।

प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व करती हुईं तृणमूल कांग्रेस नेता सबीना यासमीन (बीच में)

ममता बनर्जी ने यह भी आरोप लगाया कि एआईएमआईएम और आईएसएफ जैसे दलों ने भीड़ को भड़काया, लेकिन सवाल यह है कि यदि ऐसा था तो राज्य की पुलिस और खुफिया तंत्र पूरी तरह निष्क्रिय क्यों रहे? मुख्यमंत्री का बार-बार हर गंभीर घटना को “साजिश” बताना एक खतरनाक प्रवृत्ति को जन्म देता है, जहां असल दोषियों पर कार्रवाई के बजाय राजनीतिक बचाव प्राथमिकता बन जाता है। ऐसे बयान अप्रत्यक्ष रूप से भीड़तंत्र को वैधता देते हैं। यही कारण है कि मालदा जैसे संवेदनशील इलाकों में प्रशासन अक्सर मूकदर्शक बना दिखाई देता है और केंद्रीय बलों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के चलते राज्य में ऐसा माहौल बना दिया है कि संवैधानिक संस्थाएं तक सुरक्षित नहीं हैं। यदि यही रवैया जारी रहा, तो बंगाल में लोकतंत्र केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा और कानून-व्यवस्था भीड़ के हाथों बंधक बनती चली जाएगी।

Topics: मतदाता अधिकारसर्वोच्च न्यायालयघटना और सुरक्षाममता बनर्जीमोथाबाड़ी कांडसांप्रदायिक तनावकानून-व्यवस्था का पतनमुख्य न्यायाधीशभीड़तंत्रमालदाखुफिया तंत्रकेंद्रीय बलविवादास्पद एवं सामाजिक:घुसपैठिएपाञ्चजन्य विशेषSIRचुनावी हिंसापश्चिम बंगाल चुनाव 2026
विप्लव विकास
विप्लव विकास
विप्लव विकास लेखक और स्तंभकार हैं। समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और भारतीय विमर्श के मुद्दों पर स्पष्ट व तर्कसंगत लेखन के लिए जाने जाते हैं। अपने लेखों के माध्यम से जटिल विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत कर पाठकों के बीच सार्थक संवाद को बढ़ावा देते हैं। [Read more]
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