'हिन्दुत्व का विचार भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के कल्याण का मार्ग दिखा सकता है'
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होम भारत ओडिशा

‘हिन्दुत्व का विचार भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के कल्याण का मार्ग दिखा सकता है’

भारत के सनातन जीवन मूल्यों पर आधारित हिन्दुत्व का विचार न केवल भारत, बल्कि पूरे विश्व के लिए कल्याण का मार्ग दिखा सकता है।

Written byडॉ. समन्वय नंदडॉ. समन्वय नंद — edited by Lalit Fulara
Apr 13, 2026, 07:18 pm IST
inओडिशा

भुवनेश्वर। भारत के सनातन जीवन मूल्यों पर आधारित हिन्दुत्व का विचार न केवल भारत, बल्कि पूरे विश्व के लिए कल्याण का मार्ग दिखा सकता है। यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और केंद्रीय कार्यकारिणी सदस्य सुरेश सोनी ने कही। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भुवनेश्वर महानगर द्वारा आयोजित विशिष्ट नागरिक संगोष्ठी में अपने विचार प्रस्तुत किए।
श्री सोनी ने कहा कि किसी भी बीज को देखकर यह पता नहीं चलता कि उसका फल कैसा होगा। पहले बीज को मिट्टी में बोया जाता है, फिर उसमें अंकुरण होता है, पौधा विकसित होता है, फूल खिलता है, और अंततः फल सामने आता है। कालांतर में जब फल आता है, तभी यह स्पष्ट होता है कि वह कैसा है।

विश्व सभ्यता के इतिहास में विभिन्न समयों पर अनेक विचारधाराओं के बीज बोए गए। कालांतर में उन बीजों से फल आए, जिनमें ईसाईयत, इस्लाम और कम्युनिज़्म शामिल हैं। इन विचारधाराओं का फल मानव समाज को रक्त और आंसू देता आया है।
भारत में भी हजारों वर्षों से सनातन विचार का बीज बोया गया है। इस विचार ने कभी किसी का बुरा नहीं किया और न ही किसी का विनाश किया। यह विचार जहां भी गया, वहां यदि किसी प्रकार की अपूर्णता देखी, तो उसे पूर्ण करने का प्रयास किया। दक्षिण पूर्व एशिया में इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं।


उन्होंने कहा कि भारत का एक गौरवशाली अतीत रहा है। इस सनातन विचार के चलते इस प्राचीन राष्ट्र भारत को विश्व गुरु और “सोने की चिड़िया” जैसे विशेषण प्राप्त हुए। लेकिन हजारों वर्षों के बाहरी आक्रमण के कारण दुर्भाग्यवश कुछ विकृतियां आ गईं। उन्होंने विदेशी इस्लामी आक्रमणों का उल्लेख करते हुए कहा कि सबसे पहले सिंध पर बाहरी आक्रमण हुआ। अन्य देशों में जहां इस्लामी आक्रमणों के कुछ वर्षों बाद पूरा देश इस्लाम में परिवर्तित हो गया, वहीं सिंध में आगे बढ़ने में आक्रांताओं को तीन सौ साल लग गए। उन्होंने भारतीय समाज में आए विकृतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि सिंध ही इन आक्रांताओं का सामना कर रहा था। पड़ोसी पंजाब और राजस्थान को यह नहीं लगा कि उन पर भी हमला होने वाला है। जब तक उन पर विपत्ति नहीं आई, तब तक समाज ने यह मान लिया कि हम सुरक्षित हैं।

ब्रिटिश काल में भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए अनेक लोगों ने विभिन्न धाराओं में कार्य किया। कुछ लोगों का मानना था कि अस्त्र-शस्त्र के जरिए क्रांति कर अंग्रेजों को देश से हटाया जा सकता है। कुछ को लगता था कि क्रांति में शामिल होना सभी के लिए संभव नहीं है, इसलिए सूत काटना, चरखा चलाना आदि सांकेतिक कार्यों से लोगों को एकत्रित कर अंग्रेजों के खिलाफ मुहिम चलाई जा सकती है। इस तरह का कार्य आम लोगों के लिए आसान होता है। भारत में एक ऐसा वर्ग भी था, जिसे लगा कि अंग्रेजों के खिलाफ सेना का गठन कर उनके साथ मुकाबला किया जा सकता है। रास बिहारी बोस और नेताजी सुभाष बोस ने यह कार्य किया। कुछ लोगों का मानना था कि समाज में आई कुरीतियों को पहले दूर करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए, और ऐसा कार्य प्रारंभ हुआ।

स्वामी विवेकानंद ने पूरे भारत का भ्रमण करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि देश में सामाजिक एकता का निर्माण अत्यंत आवश्यक है। इसलिए व्यक्ति निर्माण का कार्य होना चाहिए। साथ ही, उन्होंने 1897 में कहा था कि अगले 50 वर्षों तक सभी देवी-देवताओं को छोड़कर केवल एक देवी की आराधना करनी चाहिए, और वह हैं भारत माता। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार ने भारत के गुलाम होने के मूल कारणों पर चिंतन किया। वह कोलकाता में मेडिकल पढ़ाई के दौरान क्रांतिकारियों के साथ कार्य कर चुके थे, और बाद में कांग्रेस में भी सक्रिय रहे। उन्होंने देश में चल रहे विभिन्न प्रकार के समाज सुधार की गतिविधियों को निकट से देखा। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि भारत का हिंदुत्व का विचार अत्यंत श्रेष्ठ है। लेकिन लंबे समय तक गुलाम रहने के कारण भारत में उच्च तत्वज्ञान और आचरण के बीच एक गैप आ गया है। डा. हेडगेवार ने स्वामी विवेकानंद के निष्कर्षों को स्वरूप देने का कार्य किया। उन्होंने विचार किया कि जब तक इस देश के मूल समाज को अपने तत्वज्ञान के आधार पर संगठित नहीं किया जाता, तब तक भारत का पुनरुत्थान संभव नहीं है। इसके बाद से उन्होंने इस देश के सनातन विचार के आधार पर समाज को संगठित करना प्रारंभ किया। उन्होंने 1925 में समाज को संगठित करने के लिए शाखा पद्धति विकसित की। अब इस कार्य को सौ साल पूरे हो चुके हैं।

उन्होंने कहा कि आगे के दिनों में संघ के स्वयंसेवकों ने समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय संकल्पना के अनुरूप कार्य करने के लिए अनेक संगठन खड़े किए। उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विद्या भारती, मजदूरों के क्षेत्र में बीएमएस, देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वदेशी जागरण मंच, सेवा के क्षेत्र में सेवा भारती और भारत विकास परिषद, तथा जनजातीय इलाकों में वनवासी कल्याण आश्रम जैसे अनेक संगठन कार्य कर रहे हैं। श्री सोनी ने कहा कि इन संगठनों ने भारतीय संकल्पना को पुनः स्थापित करने के लिए लगातार कार्य किया है। उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि जब श्रम के क्षेत्र में बीएमएस नहीं थी और वामपंथियों का बोलबाला था, तब उनका नारा था, “हमारी मांगें पूरी करो, चाहो जो मजबूरी हो।” बीएमएस ने कहा कि मालिक और श्रमिक एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं; दोनों परिवार के ही सदस्य हैं। इसलिए बीएमएस ने नारा दिया, “देशहित में करेंगे काम, लेकिन लेंगे पूरा दाम।”

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समाज में एक संगठन नहीं बनना है, बल्कि समाज का संगठन करना है। अंततः संघ को समाज में विलीन हो जाना है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग भारत में भाषा को लेकर विवाद उत्पन्न करने का प्रयास कर रहे हैं। भाषा केवल अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। भारत में अनेक भाषाएँ हैं, लेकिन यदि हम सूक्ष्मता से विश्लेषण करेंगे, तो पाएँगे कि भाषाओं में कही गई बातें एक ही हैं। ओडिशा के कवि जयदेव, गुजरात के नरसिंह मेहता, असम के शंकर देव, महाराष्ट्र के तुकाराम, और कबीर सभी ने जो बातें कही हैं, उनका सार एक ही है। श्री सोनी ने कहा कि ईश्वर के स्वरूप को लेकर विवाद में पूरे विश्व में खून-खराबा हो रहा है। आज विश्व के समक्ष जो समस्या खड़ी है, उसका समाधान केवल हिंदुत्व के पास है। इसका कारण यह है कि भारतीय दर्शन मानता है कि चाहे जड़ हो या चेतन, सभी में एक ही परमात्मा का तत्व व्याप्त है। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन यह मानता है कि पथ अनेक हो सकते हैं, लेकिन गंतव्य सभी का एक है। कोई भी किसी भी मार्ग पर चले, अंततः भगवान के पास ही पहुंचेगा। अपनी-अपनी रुचि के अनुसार ईश्वर की उपासना कर हम गंतव्य तक पहुँच सकते हैं।
श्री सोनी ने बताया कि संघ अपने सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर पंच परिवर्तन की दिशा में कार्य कर रहा है। पहला परिवर्तन है पर्यावरण संरक्षण, जिसमें वृक्षारोपण, जल संरक्षण, और प्लास्टिक के उपयोग को कम करना शामिल है।

दूसरा है पारिवारिक जागरूकता, जिसके अंतर्गत परिवार के सदस्यों के साथ साप्ताहिक भोजन साझा करना, सामूहिक प्रार्थनाएं करना, वार्षिक पारिवारिक भ्रमण करना, और जीवनशैली एवं भाषा में भारतीय मूल्यों को अपनाना शामिल है। तीसरा परिवर्तन है सामाजिक समरसता, जिसमें जातिवाद का उन्मूलन और सार्वजनिक स्थलों जैसे मंदिर, श्मशान, और जलस्रोतों पर सभी के लिए समान पहुंच सुनिश्चित करना शामिल है। चौथा है आत्म-जागरूकता, जिसमें स्वदेशी को बढ़ावा देना, मातृभाषा का सम्मान करना, और “वैश्विक सोचें, स्थानीय रूप से कार्य करें” के सिद्धांत का पालन करना शामिल है। पांचवां परिवर्तन है नागरिक कर्तव्यबोध, जिसमें संविधान और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना, नियमों का पालन करना, और जिम्मेदार नागरिक के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करना शामिल है। इन पांच बातों के माध्यम से एक मजबूत, अनुशासित, और प्रगतिशील समाज का निर्माण संभव होगा। कार्यक्रम में ओडिशा (पूर्व) प्रांत के संघचालक समीर महांति और भुवनेश्वर महानगर संघचालक श्रीनिवास मानसिंह मंच पर उपस्थित थे। इस कार्यक्रम में पांच सौ से अधिक प्रबुद्धजनों ने भाग लिया।

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