बांग्लादेश में फिर से एक बार हिंदुओं के घर और व्यापारों को निशाना बनाया गया है। मगर इस बार कारण क्या था, यह जानकर हर कोई दंग रह जाएगा। हिंदुओं के घरों और दुकानों को इसलिए निशाना नहीं बनाया गया कि हिंदुओं ने कुछ गलत किया या कुछ उनसे गलती हुई? न ही उनका पर्व था, न ही उन्होनें सार्वजनिक पर्व या हर्ष का प्रदर्शन किया, मगर फिर भी उन्हें हिंसा का शिकार होना पड़ा? आखिर क्यों?
क्यों भड़की हिंसा?
बांग्लादेश में रंगपुर में भीड़ ने अचानक से ही हिन्दू परिवारों और व्यापारों पर एक मुस्लिम भीड़ ने हमला कर दिया और यह हमला इतना भयानक था कि लोगों ने हिंदुओं के घरों को लूट लिया। उनके घरों और दुकानों में तोड़फोड़ की और उन्हें आतंक से भर दिया। परंतु कारण किसी को पता नहीं था, या कहें पता तो था, मगर उन्हें गुस्सा हिंदुओं पर ही निकालना था। दरअसल, ढाका से 300 किलोमीटर दूरी पर स्थित रंगपुर में एक मुस्लिम लड़के की हत्या एक नशीली दवाइयों के चलते विवाद के कारण हुई। जहां पर उसकी हत्या हुई, वह हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र था। हालांकि उसे मारने में हिंदुओं का कोई भी योगदान नहीं था। रकीब हसन नामक एक युवक को मोहम्मद मोमिन ने एक पुराने विवाद के चलते मौत के घाट उतार दिया। यह घटना दासपारा बाजार के पास हुई थी, जो एक हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र है। और यहाँ पर लगभग 100 हिन्दू परिवार रहते हैं और उनकी दुकानें हैं।
हिन्दू घृणा खुलकर सामने आई
अब उस मुस्लिम लड़के की हत्या के बहाने लोगों ने हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत निकाली। यह जानते हुए भी कि इसमें किसी भी तरह से हिंदुओं का हाथ हत्या में नहीं है, अचानक से ही 40-60 लोगों की भीड़ आई और उन्होनें हिन्दू परिवारों और व्यापारों पर हमला करना शुरूकर दिया। देखते ही देखते बर्बादी का मंजर सामने आने लगा। लगभग 20 दुकाने और गेट तोड़ डाले गए और कई घरों की खिड़कियां भी टूट गईं।
ये सब तोड़फोड़ होती रही, लोगों पर हमले होते रहे, मगर इसका कारण किसी को पता नहीं था। रकीब हसन की हत्या मोहम्मद मोमिन ने की थी और वह भी इस कारण की थी कि उन दोनों का पुराना विवाद था, मगर फिर भी इस हत्या में कथित गुस्साई भीड़ का शिकार बने बेबस हिन्दू।
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मंदिर की दानपेटी लूटने की कोशिश
यह भीड़ की कैसी मानसिकता है, जिसने हिंदुओं को निशाना बना दिया? मीडिया के अनुसार हमलावरों ने हिन्दू नागरिकों को अपशब्द भी कहे और उसके साथ ही मंदिर की दानपेटी को भी छीनने का प्रयास किया। यह कैसा दुर्भाग्य है बांग्लादेशी हिंदुओं का कि उन्हें बेवजह ही निशाना बनाया जाता है। उन्हें उनकी धार्मिक पहचान और अस्तित्व के चलते निशाना बनाया जाता है। मीडिया के अनुसार पुलिस का कहना है कि किसी तीसरे पक्ष ने जांच से ध्यान भटकाने के लिए हिंदुओं के साथ हिंसा की घटनाओं को अंजाम देना शुरू किया। पीड़ितों के परिवारों ने भी इस बात से इनकार किया कि इस घटना में हिंदुओं का हाथ हो सकता है।
ये घटना बांग्लादेश में बढ़ रही मजहबी कट्टरता को दिखाती है, यह दिखाती है कि हिंदुओं पर हमला करने के लिए किसी भी प्रकार के वैध कारणों की जरूरत नहीं है। हिंदुओं को मारने के लिए किसी भी उचित कारण की आवश्यकता नहीं है, बस हिंदुओं को आराम से मारा जा सकता है, कारण कुछ भी न हो।
पुलिस के अनुसार कातिलों की पहचान कर ली गई है। मगर इन हमलावरों की पहचान का क्या? क्या भीड़ को भी कभी सजा मिलेगी? और वह भी ऐसी भीड़ को जो यूंही हिंदुओं को मारने के लिए जुट गई थी।
एक मजहबी नेता की भी हत्या
ऐसा नहीं है कि यही एक घटना हुई, जिसने बांग्लादेश में बढ़ रही हिजाबी महत्ता को दिखाया। बल्कि एक और घटना ने यह दिखाया कि कैसे बांग्लादेश में जिहादी हिंसा में वृद्धि हो रही है। ढाका से लगभग 200 किलोमीटर पश्चिम की तरफ भी एक भीड़ इसी प्रकार से अनियंत्रित हुई, और उसने इस्लाम का अपमान करने के आरोप में एक मजहबी नेता की हत्या कर दी। कुश्तीया जिले में शमीम रेज़ा जहांगीर पर लोगों ने आरोप लगाया कि उसने इस्लाम के साथ बेअदबी की है और देखते ही देखते उसके दरबार पर हमला किया और उसे मार डाला।
पुलिस और प्रत्यक्षदर्शियों का कहना था कि लोग उसके पुराने वीडियो से भड़क गए और जिसमें जहांगीर को इस्लाम के बारे में आपत्तिजनक बातें करते हुए देखा जा रहा था। हालांकि यह कई वर्ष पहले रिकार्ड की गई थी, मगर अभी सामने आई, जिसके चलते लोगों में गुस्सा भड़क गया। और उसकी भीड़ ने हत्या कर दी।
ये दोनों ही घटनाएं यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि कैसे वहाँ पर जिहादी मानसिकता का विकास हो रहा है और लोगों के भीतर असहिष्णुता की भावना का विस्तार हो रहा है। लगातार ही अल्पसंख्यकों के प्रति हिंसा बढ़ रही है। और हिंदुओं को बिना किसी कारण हिंसा का सामना करना पद रहा है।

















