ममता का वादा था कि ‘मानुष’ यानी आम आदमी उनकी नीतियों के केंद्र में होंगे। स्वाभाविक है, ऐसे में लोगों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव आना चाहिए था, लेकिन आज जब हम सरकारी सर्वेक्षणों, राष्ट्रीय आंकड़ों और प्रतिष्ठित शोध संस्थानों की रिपोर्टों को साथ रखकर देखते हैं, तो एक असहज सच्चाई उभरती है: बंगाल का आम आदमी आगे नहीं बढ़ा, बल्कि धीरे-धीरे पीछे खिसक गया है।
यह गिरावट एक झटके में नहीं आई। यह रसोई के बजट में दिखती है, बच्चों के पोषण में दिखती है, अस्पताल के बिल में दिखती है और उस बेचैनी में दिखती है, जो एक युवा को अपने ही राज्य से बाहर जाने के लिए मजबूर करती है।
रसोई का गणित बिगड़ा
किसी भी समाज की आर्थिक स्थिति का सबसे ईमानदार आईना उसकी रसोई होती है, और यही रसोई पश्चिम बंगाल की बदलती आर्थिक हकीकत को सबसे स्पष्ट रूप से सामने रखती है। अगर 2011-12 के आंकड़ों से शुरुआत करें, तो राष्ट्रीय स्तर पर ग्रामीण भारत में भोजन पर खर्च का हिस्सा लगभग 52.9 प्रतिशत था (एनएसएसओ, घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2011-12)। यह वह समय था जब भारत की बड़ी आबादी अब भी “जीविका आधारित खपत” के चरण में उलझी हुई थी।
2019 के आसपास उपलब्ध मध्यवर्ती आकलन (एनएसएस/अन्य आर्थिक विश्लेषण) भी यही संकेत देते हैं कि भोजन का हिस्सा धीरे-धीरे घट रहा था, लेकिन यह गिरावट असमान थी और कई राज्यों में अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंची। 2023-24 आते-आते राष्ट्रीय औसत घटकर 46.4 प्रतिशत रह गया, जो दिखाता है कि भारत का बड़ा हिस्सा बुनियादी जरूरतों से आगे बढ़कर अन्य क्षेत्रों पर खर्च करने लगा है। लेकिन इसी समय पश्चिम बंगाल की तस्वीर अलग दिखाई देती है। नवीनतम सर्वेक्षण बताता है कि यहां ग्रामीण परिवार अब भी लगभग 51.5 प्रतिशत खर्च केवल भोजन पर कर रहे हैं (सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय, घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24)।
यह उस वास्तविकता को दिखाता है जिसमें बंगाल का परिवार आज भी अपनी आय का बड़ा हिस्सा सिर्फ पेट भरने पर खर्च कर रहा है, जबकि देश के अन्य हिस्सों में वही आय अब भविष्य गढ़ने में लग रही है। दूसरे शब्दों में, 2011 में जो स्थिति पूरे भारत की थी, 2024 में वह स्थिति बंगाल के एक बड़े हिस्से की वास्तविकता बनी हुई है और यही वह बिंदु है जहां से “विकास” और “वास्तविक जीवन स्तर” के बीच का अंतर साफ दिखाई देने लगता है।
आय का सच
सरकारी आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में प्रति व्यक्ति आय बढ़ी है। लेकिन राष्ट्रीय औसत से अंतर कम नहीं हुआ,बढ़ गया। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के 2024 के अध्ययन का सार इस प्रवृत्ति को स्पष्ट करता है- “पश्चिम बंगाल की आय राष्ट्रीय औसत के मुकाबले लगातार पीछे खिसकती गई है।”
सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) का कंज्यूमर पिरामिड्स हाउसहोल्ड सर्वे पिछले एक दशक में भारतीय परिवारों की आय, खपत और बचत के पैटर्न को लगातार ट्रैक करता रहा है। 2011 के आसपास, जब सर्वेक्षण शुरू हुआ, तब ज्यादातर राज्यों में आय और खपत सीमित स्तर पर थी। लेकिन 2019 तक आते-आते कई राज्यों- विशेषकर दक्षिण और पश्चिम भारत- में रोजगार के अवसरों के विस्तार के साथ खपत का दायरा बढ़ा और बचत की क्षमता भी मजबूत हुई। बंगाल में यह बदलाव उसी गति से नहीं हुआ।
स्वास्थ्य में आर्थिक असमानता
एनएफएचएस-5 (2019-21) के आंकड़े पश्चिम बंगाल की एक और गंभीर तस्वीर सामने रखते हैं। लगभग 71 प्रतिशत बच्चे और 76 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से ग्रस्त हैं। यह केवल स्वास्थ्य का सवाल नहीं है। “एनीमिया की उच्च दरें दीर्घकालिक पोषण की कमी को दर्शाती हैं और यह मानव पूंजी के विकास को प्रभावित करती हैं।” यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टें भी यही कहती हैं कि कुपोषण सीधे आय, भोजन की गुणवत्ता और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच से जुड़ा होता है। यानी, जब शरीर कमजोर होता है, तो अर्थव्यवस्था भी कमजोर होती है चाहे वह घरेलू हो या फिर राज्य की।
बीमारी का खर्च: बड़ा झटका
नेशनल हेल्थ अकाउंट्स और नीति आयोग की रिपोर्टों के अनुसार, ‘आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडिचर’ (ओओपीई) यानी स्वास्थ्य पर अपनी जेब से किया जाने वाला खर्च किसी भी राज्य की सामाजिक सुरक्षा का सबसे सटीक पैमाना है। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में यह आंकड़ा एक चिंताजनक कहानी बयां करता है। यह आंकड़ा दिखाता है कि 100 रु.के कुल इलाज में से आम आदमी को अपनी जेब से कितने रुपये देने पड़ते हैं। यह प्रतिशत जितना कम हो, राज्य की स्थिति उतनी बेहतर मानी जाती है। 2011 में भारत का औसत ओओपीई 64.2% था, जो 2025 तक घटकर 42.5% पर आ गया (लगभग 22% का सुधार)। इसके विपरीत, बंगाल में यह सुधार मात्र 4.5% (71.3% से 66.8%) रहा। इसका अर्थ है कि भारत के अन्य राज्यों ने अपने नागरिकों का बोझ तेजी से कम किया, जबकि बंगाल में यह बोझ स्थिर बना हुआ है।
‘स्वास्थ्य साथी’ बनाम ‘आयुष्मान भारत’: विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम बंगाल द्वारा केंद्र की ‘आयुष्मान भारत’ योजना को लागू न करना और अपनी योजना ‘स्वास्थ्य साथी’ पर निर्भर रहना भी बड़ा कारण है जिससे लोगों पर स्वास्थ्य का ज्यादा बोझ है। नीति आयोग के शोध पत्रों के अनुसार, ‘स्वास्थ्य साथी’ का फंड आवंटन और कार्ड की स्वीकार्यता निजी अस्पतालों में सीमित है, जिससे मरीज को अंततः नकद भुगतान करना पड़ता है।
दवाओं और जांच का खर्चः नेशनल हेल्थ अकाउंट्स (2022) के अनुसार, बंगाल में ओओपीई का 55% हिस्सा केवल दवाओं पर खर्च होता है। सरकारी अस्पतालों में “मुफ्त दवा” की अनुपलब्धता और ‘सिंडिकेट’ के कारण बाहर की फार्मेसी से महंगी दवाएं खरीदना परिवारों को गरीबी की रेखा के नीचे धकेल रहा है।
जैसा कि सरकारी रिपोर्टों का निष्कर्ष है, बंगाल में स्वास्थ्य पर होने वाला उच्च निजी व्यय (66.8%) परिवारों को आर्थिक रूप से असुरक्षित बना रहा है। यहां का ‘मानुष’ गंभीर बीमारी होने पर अपनी जमा-पूंजी या जमीन बेचने को मजबूर है। यह उस ‘सभ्यतागत गिरावट’ का एक आर्थिक प्रमाण है, जहां राज्य सरकार स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरत को भी “अधिकार” मानने के बजाय बाजार के भरोसे छोड़ चुकी है।
पलायन विस्फोट
पश्चिम बंगाल से होने वाला पलायन केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं, बल्कि उस ‘माटी’ की व्यथा है जो अपने ‘मानुष’ को सम्मानजनक जीविका देने में विफल रही है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस)- 2022-23 के नतीजे बताते हैं कि बंगाल का यह संकट ‘आर्थिक ठहराव’ और ‘सिंडिकेट राज’ के कारण और गहरा गया है।
2011 से 2025 के बीच पश्चिम बंगाल से बाहर जाने वालों की संख्या में 400% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। 2011 में जहां लगभग 5.8 लाख लोग राज्य से बाहर थे, वहीं 2025 तक यह आंकड़ा 24.5 लाख को पार कर गया है। यह वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत वृद्धि दर से तीन गुना अधिक है। इसके साथ ही पीएलएफएस 2022-23 के आंकड़ों के अनुसार बंगाल से पलायन करने वाले 38% लोग ‘शिक्षित’ (स्नातक या उससे अधिक) हैं।
कम मजदूरीः आईएलओ (अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन) के ‘इंडिया वेज रिपोर्ट’ के आंकड़े बताते हैं कि क्यों एक बंगाली श्रमिक पलायन करता है। बंगाल में एक दिहाड़ी मजदूर को औसतन 310/दिन के हिसाब से मजदूरी मिलती है, जबकि केरल में यह औसत 850 रुपये/दिन है। यानी एक श्रमिक बंगाल के बाहर जाकर महीने में15 हजार रुपये अधिक कमा सकता है।

कराहता अन्नदाता
पश्चिम बंगाल की खेती को अगर केवल उत्पादन या मौसम के आंकड़ों से समझने की कोशिश की जाए, तो तस्वीर अधूरी ही रहेगी। असली कहानी वहां शुरू होती है जहां आंकड़े ख़त्म हो जाते हैं- जहां किसान कर्ज में डूबा है, फसल का दाम नहीं मिल रहा, और उसकी पीड़ा सरकारी रिकॉर्ड में पूरी तरह दर्ज भी नहीं हो रही।
पश्चिम बंगाल के बारे में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की रिपोर्ट कहती है- “कृषि परिवारों का एक बड़ा हिस्सा संस्थागत ऋण के बजाय अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर रहता है।” नाबार्ड की ‘स्टेट फोकस पेपर 2024-25’ के अनुसार, बंगाल में केवल 42-45% किसानों के पास सक्रिय केसीसी (किसान क्रेडिट कार्ड) है, जबकि राष्ट्रीय औसत 70% के करीब है।
क्षेत्रीय अध्ययनों और जमीनी सर्वेक्षणों से पता चलता है कि व्यवहार में केवल 15–20 प्रतिशत छोटे किसान ही नियमित बैंक ऋण तक पहुंच पाते हैं। बाकी साहूकारों, व्यापारियों और स्थानीय वित्त नेटवर्क पर निर्भर रहते हैं जहां ब्याज दरें 24 से 36 प्रतिशत तक होती हैं। यह एक जाल है। किसान जिस व्यापारी से कर्ज लेता है, वही उसकी फसल का खरीदार भी बन जाता है।
यहीं से बाजार की दूसरी परत खुलती है- “सिंडिकेट व्यवस्था”। पश्चिम बंगाल की कृषि अर्थव्यवस्था में ‘सिंडिकेट राज’ ऐसी समानांतर व्यवस्था बन गई है, जो सरकारी नीतियों और वास्तविक किसान के बीच एक “दीवार” की तरह खड़ी है। यह केवल एक राजनीतिक शब्द नहीं है, बल्कि एक संगठित आर्थिक ढांचा है जो बीज खरीदने से लेकर फसल बेचने तक के हर चरण पर नियंत्रण रखता है।
सरकार धान की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर करने के लिए ‘अन्नदात्री’ पोर्टल और कूपन व्यवस्था का उपयोग करती है। लेकिन जमीनी स्तर पर यह सिंडिकेट के नियंत्रण में है। छोटे और सीमांत किसानों (विशेषकर बटाईदारों) को अक्सर पोर्टल पर कूपन नहीं मिल पाता। स्थानीय सिंडिकेट इन कूपनों को ‘फर्जी’ या ‘पार्टी वफादारों’ के नाम पर बुक कर लेता है। जब किसान को सरकारी मंडी में जगह नहीं मिलती, तो सिंडिकेट के बिचौलिये खेत पर आते हैं। वे किसान से 2,183 (एमएसपी) के बजाय 1,600 से 1,700 में धान खरीदते हैं। वही बिचौलिया बाद में किसान के कूपन का उपयोग करके उसी धान को सरकारी मंडी में एमएसपी पर बेचकर प्रति क्विंटल 500 रुपये तक का मुनाफा कमा लेता है।
किसान मर रहे, पर आंकड़ों में नहीं
एक और चिंताजनक पहलू वह है, जो आधिकारिक आंकड़ों में दिखाई ही नहीं देता। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्टों में पश्चिम बंगाल को अक्सर एक ऐसे राज्य के रूप में दिखाया गया है जहां किसान आत्महत्या के मामले “शून्य” हैं। लेकिन आरटीआई के माध्यम से सामने आए तथ्यों ने इस दावे को चुनौती दी है। जिला स्तर के आंकड़ों, विशेषकर पश्चिम मेदिनीपुर जैसे क्षेत्रों, में ऐसे कई मामले सामने आए जहां किसानों और कृषि श्रमिकों की आत्महत्याएं दर्ज थीं, लेकिन उन्हें एनसीआरबी के “किसान आत्महत्या” वर्ग में शामिल नहीं किया गया।
सरकारी आंकड़ों में ‘किसान’ केवल उसे माना जाता है जिसके नाम पर जमीन का पट्टा हो। जबकि पश्चिम बंगाल की स्थिति यह है कि बड़ी संख्या में खेती बटाईदार करते हैं। और जब कोई बटाईदार आत्महत्या करता है, तो उसे ‘किसान आत्महत्या’ के खाने में न डालकर ‘अन्य’ या ‘दिहाड़ी मजदूर’ की श्रेणी में डाल दिया जाता है।
स्रोतः कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (2024). घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण (2023-24, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (2011-12), भारतीय रिज़र्व बैंक (2024), प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (2024), सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी (2011–2024),राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5. (2019-21), नेशनल हेल्थ अकाउंट्स (2022), पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (2022-23).
















