असम, केरल और पुडुचेरी में रिकॉर्ड वोटिंग: 110 चुनावों का विश्लेषण, आंकड़ों ने तोड़ा विश्लेषकों का भ्रम, NDA की वापसी
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असम, केरल और पुडुचेरी में रिकॉर्ड वोटिंग: 110 चुनावों का विश्लेषण, आंकड़ों ने तोड़ा विश्लेषकों का भ्रम, NDA की वापसी

यह मतदान प्रतिशत उन लोगों के मुंह पर करारा तमाचा है जो वर्तमान सरकार में लोकतंत्र को कमजोर होने की दुहाई देते रहते हैं। लोकतंत्र की मजबूती, मतदान प्रतिशत का सरकार पर असर नहीं

Written byअभय कुमारअभय कुमार
Apr 10, 2026, 09:55 am IST
in असम, विश्लेषण, केरल, पुडुचेरी
मतदान के लिए कतार में मतदाता

मतदान के लिए कतार में मतदाता

असम, केरल और केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी के चुनाव में जनता ने बढ़-चढ़कर मतदान में हिस्सा लिया और लोकतंत्र को मजबूत किया। यह मतदान प्रतिशत उन लोगों के मुंह पर करारा तमाचा है जो वर्तमान सरकार में लोकतंत्र को कमजोर होने की दुहाई देते रहते हैं। बढ़े मतदान प्रतिशत उन विश्लेषकों के लिए परिणाम तक एक मौका देगा जो हर मौके पर भाजपा और एनडीए की हार की कामना करते हैं। अगर मतदान प्रतिशत कम होता तो यही विश्लेषक इसको भाजपा की कम होती लोकप्रियता और लोकतंत्र से जोड़ते।

असम और पुडुचेरी में अब तक का सर्वाधिक मतदान

असम में 85.38 प्रतिशत और पुडुचेरी में 89.83 प्रतिशत मतदान हुआ। असम और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव के इतिहास में यह अब तक का सर्वाधिक मतदान है। केरल में 78.03 प्रतिशत मतदान हुआ।

बढ़ता मतदान हमेशा सत्ता परिवर्तन नहीं लाता

देश की मीडिया का एक बड़ा वर्ग हमेशा से चुनाव में अधिक मतदान को सरकार के प्रति आक्रोश या निराशा का भाव के रूप में पेश करती है. बढ़ता मतदान प्रतिशत हमेशा सत्ता परिवर्तन नहीं लाता। अगर आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि मतदान के प्रतिशत में इजाफा या गिरावट का सत्ता परिवर्तन से कोई सीधा या साफ संबंध नहीं है।

1989 से 2008 के बीच 110 विधानसभा चुनाव 

1989 से 2008 के बीच विभिन्न राज्यों में कुल मिलाकर 110 विधानसभा चुनाव हुए। इनमें से 42 चुनावों में मत प्रतिशत में इजाफा हुआ और 31 चुनावों में पिछले चुनाव की तुलना में मत प्रतिशत में गिरावट आई। उन 42 चुनावों में जहां मतदान पहले से ज्यादा हुए तो उनमें 28 चुनावों में सत्ता परिवर्तन हुआ और जिस पार्टी की सरकार थी उसे चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। जबकि 14 सरकारों ने दोबारा जीतकर सत्ता में वापसी की। ज्यादा मतदान वाले चुनावों में सरकार के बदलाव का दर दो तिहाई यानी 66 फीसदी रहा था। वहीं एक तिहाई सरकार फिर से सत्ता में वापसी की थी। यह ज्यादातर सरकार भाजपा या एनडीए की थी।

1989 से 2008 के बीच जिन 31 विधानसभा चुनाव

इसी तरह 1989 से 2008 के बीच जिन 31 विधानसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत में गिरावट आई, उनमें 18 में सत्ता परिवर्तन हो गया लेकिन 13 राज्यों में सत्ताधारी पार्टी दोबारा चुन कर आई। इसी तरह उन चुनावों में जहां मतदान प्रतिशत में कोई खास परिवर्तन देखने को नहीं मिला, वहां भी सत्ता वाली पार्टी का हार-जीत के साथ कोई सीधा सम्बन्ध देखने को नहीं मिलता। ऐसे कई प्रदेश हैं जहां चुनावों में लोगों की हिस्सेदारी बढ़ी और मतदान प्रतिशत में इजाफा हुआ। परंतु एक बार नहीं वरन दो या तीन बार वही पार्टी चुनाव जीतकर राज्य में शासन किया। गुजरात इसका उदाहरण है। दिल्ली में भी बढ़े मतदान के बावजूद शीला दीक्षित नीत कांग्रेस पार्टी की सरकार बार-बार बनती रही। दिल्ली में 2003 में लगभग साढ़े चार प्रतिशत मतदान बढ़ा था मगर शेला दीक्षित की सरकार बरकरार रही थी। 2008 में दिल्ली में चार प्रतिशत से अधिक मतदान में बढ़ोतरी हुई थी मगर फिर भी शीला दीक्षित की सरकार बरकरार रही थी। दिल्ली में 2025 विधानसभा चुनाव में लगभग ढाई प्रतिशत मतदान में कमी आयी थी, फिर भी आम आदमी पार्टी की सरकार चुनाव हार गई और भाजपा 1993 के बाद पहली बार इस प्रदेश में सरकार बनाने में कामयाब हुई।

1989-2009 के बीच सात लोकसभा चुनावों का विश्लेषण

अगर 1989-2009 के बीच के सभी सात लोकसभा चुनावों का भी विश्लेषण करें तो मतदान प्रतिशत और सत्ताधारी पार्टी या गठबंधन का चुनावों में हुए हार-जीत से सीधा सम्बन्ध नहीं दिखाई देता है। उत्तर प्रदेश में 2007 में जब मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई, लेकिन उस चुनाव में 2002 की तुलना में लगभग 8 फीसदी कम मतदान था। 2007 में चुनाव के समय मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे और कम मतदान प्रतिशत के कारण उनकी सरकार बनानी चाहिए थी मगर 2007 में पहली बार मायावती पूर्ण बहुमत के साथ 206 सीट जीतकर सरकार बनाने में कामयाब हुई थी। गुजरात में 2012 में 71 प्रतिशत मतदान हुआ जो 2007 के अपेक्षा 12 प्रतिशत अधिक था। मगर फिर भी भाजपा की सरकार महज 2 सीटों की कमी के साथ बरकरार रही। 2017 में गुजरात में मतदान प्रतिशत में गिरावट आई, मगर भाजपा की सरकार बरकरार रही। वहीं 2022 में 2017 के तुलना में मतदान में कमी आयी और भाजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए गुजरात में कांग्रेस पार्टी का 1985 में सर्वाधिक सीट जितने का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया।

इन आंकड़ों पर भी गौर करें

2004 के लोकसभा के चुनाव में मतदान प्रतिशत 1999 के अपेक्षा कम हुआ था फिर भी अटल जी की सरकार चुनाव हार गई थी। 2009 के लोकसभा के चुनाव में मतदान बढ़ने के बावजूद कांग्रेस पार्टी की सीट बढ़ गई थी, जहां 2004 में कांग्रेस पार्टी को 145 सीट मिली थी वही 2009 में बड़े मतदान के बावजूद पार्टी की सीट बढ़कर 206 हो गई। 2019 के लोकसभा के चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़ा और भाजपा की सीटे भी बढ़ गईं। जहां 2014 में भाजपा ने 281 सीट जीती थी वहीं 2019 में भाजपा 303 सीट जीतने में कामयाब हुई थी। 2024 में मतदान प्रतिशत में कमी के बावजूद भाजपा नीत एनडीए की सरकार पूर्ण बहुमत के साथ बरकरार रही। उत्तराखंड में 2017 में मतदान कम होने के बावजूद कांग्रेस पार्टी चुनाव हार गई और भाजपा जीती। 2022 में मतदान कम होने पर भी भाजपा की सरकार बरकरार रही।

काम के दम पर वापसी करती है भाजपा

एनडीए शासित राज्यों में मतदान प्रतिशत का कम से कम असर पड़ता है और भाजपा और उसके सहयोगी दल बार-बार अपने काम के दम पर सरकार में वापसी कर रही हैं। बिहार, गुजरात, मध्यप्रदेश सहित कई उदाहरण हैं जहां मतदान प्रतिशत का कोई भी असर सरकार पर नहीं पड़ता है।

 

Topics: असम चुनावचुनाव विश्लेषणविधानसभा चुनाव 2026केरल चुनावपुड्डुचेरी चुनावरिकॉर्ड वोटिंग
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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