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पश्चिम बंगाल : घोटालों का साथ, संविधान पर आंच

पश्चिम बंगाल में बार-बार राज्य प्रशासन और केंद्रीय जांच एजेंसियों के बीच अभूतपूर्व टकराव उभर आता है। यह भारत के ‘सहकारी संघवाद’ के लिए चुनौती है

Written byPanchjanyaPanchjanya
Apr 10, 2026, 08:16 am IST
inविश्लेषण, पश्चिम बंगाल
राजीव कुमार से पूछताछ करने गई सीबीआई टीम को कोलकात्ता पुलिस ने​ हिरासत में ले लिया।

राजीव कुमार से पूछताछ करने गई सीबीआई टीम को कोलकात्ता पुलिस ने​ हिरासत में ले लिया।

पश्चिम बंगाल की राजनीति पिछले एक दशक में केवल चुनावी प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा नहीं रही; यह संघीय ढांचे, जांच एजेंसियों की स्वायत्तता और संविधान की मूल भावना की परीक्षा का मैदान बन गई है। ममता बनर्जी सरकार और केंद्रीय एजेंसियों- विशेषकर सीबीआई और ईडी- के बीच लगातार टकराव ने यह प्रश्न खड़ा किया है कि क्या एक निर्वाचित राज्य सरकार राजनीतिक असहमति के नाम पर केंद्रीय जांच को बाधित कर सकती है? यदि हां, तो उसकी संवैधानिक सीमा क्या है?

इस प्रश्न का उत्तर इसलिए आवश्यक है क्योंकि लोकतंत्र कैसा होगा, यह काफी हद तक राज्य की मंशा पर निर्भर करता है। अगर ऐसा नहीं होता तो संविधान को अपनाने से ऐन पहले इसके निर्माता बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर को यह नहीं कहना पड़ता कि संविधान व्यवहार में कैसा रहेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इसे लागू करने वालों की मंशा क्या है। बाबा साहेब ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में कहा था, “मैं महसूस करता हूं कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए, खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान खराब साबित होगा”।

सीबीआई को दी सहमति वापस ली

दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 1946 (डीएसपीई एक्ट) के तहत सीबीआई को राज्यों में जांच के लिए राज्य सरकार की “सहमति” की आवश्यकता होती है। अमूमन राज्य “सामान्य सहमति” दे देते हैं, जिससे सीबीआई को हर मामले में अलग से अनुमति लेनी नहीं पड़ती। लेकिन नवंबर 2018 में पश्चिम बंगाल सरकार ने सीबीआई को दी सामान्य सहमति वापस ले ली।

राज्य सरकार का आरोप था कि सीबीआई का उपयोग राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को परेशान करने के लिए किया जा रहा है।
कानूनी स्थितिः संविधान की सातवीं अनुसूची में “पुलिस” राज्य सूची का विषय है। इसलिए राज्य का यह कदम तकनीकी रूप से वैध था। बंगाल सरकार का राजनीतिक संदेश स्पष्ट था-राज्य सरकार को केंद्रीय जांच एजेंसियों पर विश्वास नहीं। यह संघीय असहमति का वैध रूप हो सकता है, लेकिन जब यह जांच को व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी करने का औजार बन जाए, तो यह संघीय सहयोग की भावना के विरुद्ध जाता है।

शारदा चिटफंड घोटाला

हजारों करोड़ रुपये का शारदा चिटफंड घोटाला 2013 में सामने आया, जिसमें लाखों गरीब जमाकर्ताओं के पैसे डूब गए। 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंपी। फरवरी 2019 में टकराव तब चरम पर पहुंच गया जब सीबीआई की टीम कोलकाता के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के आवास पर पूछताछ के लिए पहुंची क्योंकि उनपर सबूत मिटाने और जांच में बाधा डालने का आरोप था। कोलकाता पुलिस ने सीबीआई के अधिकारियों को ही हिरासत में ले लिया। इसे “संवैधानिक तख्तापलट” बताते हुए ममता बनर्जी कोलकाता के ‘मेट्रो चैनल’ पर धरने पर बैठ गईं।

इस घटनाक्रम पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी प्रतिक्रिया की। अदालत ने यह स्पष्ट करते हुए कि राजीव कुमार को सीबीआई जांच में सहयोग करना होगा, कहा- “यह एक असाधारण स्थिति है जहां राज्य की पुलिस और केंद्रीय एजेंसी एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ी हैं। किसी भी अधिकारी को जांच से ऊपर रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।” इसके साथ ही सीबीआई को भी निर्देश दिया कि किसी भी दंडात्मक कार्रवाई के पहले उसे अदालत की अनुमति लेनी होगी। फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है।

संविधान का अनुच्छेद 256 कहता है कि राज्य सरकारें संसद द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन सुनिश्चित करेंगी। जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद राज्य पुलिस केंद्रीय एजेंसी की कार्रवाई में बाधा डाले, तो यह संघीय मर्यादा का उल्लंघन है।
इस प्रकरण पर संविधान विशेषज्ञ पी.डी.टी. आचार्य कहते हैं- “यह मामला संघवाद की मर्यादा का उल्लंघन था। पुलिस को केंद्रीय एजेंसी का सहयोग करना चाहिए था, न कि उन्हें गिरफ्तार करना चाहिए था।”

विधानसभा प्रस्ताव

2021 में नारदा स्टिंग केस में तृणमूल कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारी हुई। राज्य सरकार के मंत्रियों और विधायकों को ईडी/सीबीआई ने तलब किया। इसपर ममता सरकार ने 2022 में विधानसभा में केंद्रीय एजेंसियों के “दुरुपयोग” के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया।
लेकिन इस मामले में वैधानिक स्थिति यह है कि विधानसभा प्रस्ताव एक राजनीतिक अभिव्यक्ति है; यह एजेंसियों की वैधानिक शक्तियों को समाप्त नहीं कर सकता। सीबीआई और ईडी संसद के अधिनियमों के तहत कार्य करते हैं।

यहां राज्य सरकार ने राजनीतिक मंच का उपयोग कर एजेंसियों की वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाया। लोकतंत्र में आलोचना स्वीकार्य है, परंतु जब संस्थागत अविश्वास को वैधानिक बाधा में बदला जाता है, तो यह संविधान की “विधि के शासन” की आत्मा को चुनौती देता है।

 

शिक्षक भर्ती घोटाला

2014 और 2016 की शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर धांधली के आरोप लगे। आरोप था कि अयोग्य उम्मीदवारों से पैसे लेकर उन्हें सरकारी स्कूल में नौकरी दी गई। हाईकोर्ट ने पाया कि प्रथमदृष्टया गंभीर अनियमितताएं हैं और राज्य एजेंसियां निष्पक्ष जांच करने में सक्षम नहीं, इसलिए मामले की जांच ईडी को सौंपी।

जुलाई 2022 में ईडी ने तत्कालीन शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी की करीबी सहयोगी अर्पिता मुखर्जी के घरों पर छापेमारी की, जहां से 50 करोड़ नकद और भारी मात्रा में सोना बरामद हुआ। ममता सरकार ने इसे ‘राजनीतिक षड्यंत्र’ बताया, लेकिन सबूतों के दबाव में पार्थ चटर्जी को मंत्री पद और पार्टी से बर्खास्त करना पड़ा।

यहां टकराव सीधा नहीं था, परंतु न्यायालय की निगरानी में जांच ने राज्य सरकार की भूमिका को कटघरे में जरूर खड़ा किया।
ताजा स्थितिः मार्च 2026 में ट्रायल कोर्ट ने पार्थ चटर्जी की जमानत याचिका फिर से खारिज कर दी है क्योंकि ईडी ने बेनामी खातों के नए सबूत पेश किए हैं। सुनवाई के दौरान कलकत्ता हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी कीः “भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि पूरा शिक्षा विभाग ही दूषित हो गया है। अगर जरूरत पड़ी, तो पूरी पैनल लिस्ट रद्द कर दी जाएगी।”

संदेशखाली राशन घोटाला

राशन वितरण प्रणाली में करोड़ों के गबन की जांच कर रही ईडी की टीम पर 5 जनवरी 2024 को संदेशखाली में हमला हुआ। हमले का मास्टरमाइंड तृणमूल नेता शाहजहां शेख था। राज्य पुलिस 50 दिनों तक शाहजहां शेख को गिरफ्तार नहीं कर पाती है जबकि संदेशखाली की महिलाओं ने उसके खिलाफ यौन उत्पीड़न और जमीन हड़पने के गंभीर आरोप लगाए। राज्य सरकार ने उल्टा केंद्र पर आरोप लगाया कि वह संदेशखाली को बदनाम कर रहा है।

इस मामले में राज्य पुलिस की भूमिका पर तीखे सवाल उठाते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंप दी। हाईकोर्ट ने कहा- “राज्य पुलिस की कार्यप्रणाली पर हमें रत्ती भर भी भरोसा नहीं। अभियुक्त को राज्य प्रशासन का संरक्षण प्राप्त है।”

आरजी कर भ्रष्टाचार मामला

कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में एक ट्रेनी डॉक्टर की बलात्कार के बाद हत्या ने पूरे देश को हिला दिया। लेकिन जांच के दौरान अस्पताल के तत्कालीन प्रिंसिपल संदीप घोष के कार्यकाल में करोड़ों के भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ।

ममता सरकार ने संदीप घोष का बचाव करते हुए उनका तबादला दूसरे कॉलेज में कर दिया। इसके खिलाफ डॉक्टरों ने आंदोलन किया और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सीबीआई और ईडी ने घोष के घर और अस्पताल में कई बार छापेमारी की, जिसे राज्य सरकार ने “चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने का प्रयास” बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने इसपर कड़ी टिप्पणी की: “हम हैरान हैं कि जघन्य अपराध के तुरंत बाद प्रिंसिपल को पुरस्कृत (नया पद देकर) किया गया। क्या राज्य प्रशासन सच को छिपाना चाहता है?” अभी संदीप घोष जेल में है। इसी साल मार्च में सीबीआई ने उनके खिलाफ सबूतों के साथ छेड़छाड़ की नई धाराएं जोड़ी हैं।

टकराव की राह

  • शारदा और रोजवैली घोटाला (2014): हजारों करोड़ का चिटफंड घोटाला। सुप्रीम कोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंपी। कई मंत्री और ममता के करीबी गिरफ्तार जिनमें प्रमुख हैं- कैबिनेट मंत्री मदन मित्रा, तृणमूल सांसद सुदीप बंदोपाध्याय और सांसद-अभिनेता तपस पाल। आरोप है कि इस घोटाले का पैसा तृणमूल के चुनावी फंड में गया।
  •  सीबीआई की ‘सामान्य सहमति’ वापस (2018): ममता सरकार ने सीबीआई को राज्य में बिना अनुमति घुसने से रोक दिया। संघीय ढांचे में राज्य की शक्तियों का उपयोग कर जांच को बाधित करने का पहला बड़ा प्रयास।
  • ‘राजीव कुमार’ प्रकरण (2019): सीबीआई टीम जब तत्कालीन पुलिस कमिश्नर के घर पहुंची, तो पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। मुख्यमंत्री स्वयं धरने पर बैठ गईं, जिससे ‘पुलिस बनाम सीबीआई’ का संवैधानिक संकट खड़ा हुआ।
  •  शिक्षक भर्ती घोटाला (2022): ईडी ने मंत्री पार्थ चटर्जी की करीबी के घर से 50 करोड़ नकद बरामद किया। इससे सरकार की छवि धूमिल हुई।
  •  संदेशखाली कांड (2024): राशन घोटाले की जांच करने गए अधिकारियों पर तृणमूल नेता शाहजहां की अगुआई में भीड़ का जानलेवा हमला।
  •  आरजी कर मेडिकल कॉलेज (2024): ट्रेनी डॉक्टर के साथ हुए जघन्य अपराध के बाद प्रिंसिपल संदीप घोष के वित्तीय भ्रष्टाचार की परतें खुलीं। सीबीआई ने गिरफ्तार किया।

कोयला और मवेशी तस्करी मामला

बंगाल-झारखंड सीमा पर अवैध कोयला खनन और भारत-बांग्लादेश सीमा पर मवेशियों की तस्करी में मुख्यमंत्री के भतीजे अभिषेक बनर्जी का नाम उछला। अभिषेक बनर्जी और उनकी पत्नी को बार-बार दिल्ली समन किए जाने पर ममता बनर्जी ने इसे “राजनीतिक प्रतिशोध” का नाम दिया। अभिषेक बनर्जी को गिरफ्तारी से अंतरिम राहत मिली है, लेकिन जांच अभी जारी है।

संविधान ने संघीय ढांचे को सहयोगात्मक बनाया है, टकरावपूर्ण नहीं। यदि हर जांच को “राजनीतिक साजिश” कहकर खारिज किया जाएगा और हर जांच अधिकारी को शत्रु की तरह देखा जाएगा, तो कानून का शासन एक खोखला नारा बन जाएगा। पश्चिम बंगाल का अनुभव बताता है कि जब संघीय असहमति संवाद की जगह टकराव का रूप ले लेती है, तो संविधान की आत्मा आहत होती है।

जान देकर चुकाई भरोसे की कीमत

शारदा चिटफंड घोटाला केवल पैसों का हेरफेर नहीं था, बल्कि यह लाखों परिवारों की तबाही की कहानी थी। सरकारी रिकॉर्ड और पुलिस डायरी में ऐसे रोंगटे खड़े कर देने वाले उदाहरण भरे हुए हैं। ऐसी ही एक दर्दनाक कहानी है स्वपन कुमार बिस्वास की।

36 साल के स्वप्न कुमार बिस्वास पुरुलिया के बलरामपुर के रहने वाले थे। उन्होंने शारदा समूह के वादों पर भरोसा किया और न केवल अपनी पूरी जमा-पूंजी (लगभग 4 लाख रुपये) इसमें निवेश की, बल्कि गांव के गरीब लोगों से भी पैसे कंपनी में जमा कराए। अप्रैल 2013 में जब शारदा समूह के मालिक सुदीप्त सेन के फरार होने की खबर आई, तो स्वप्न के पैरों तले जमीन खिसक गई।

उन पर दोहरी मार पड़ी। एक तो उनकी अपनी जीवन भर की कमाई डूब चुकी थी। दूसरी, उनके भरोसे पैसे लगाने वाले गांव के लोग उनके घर के चक्कर काटने लगे।

अत्यधिक तनाव और “धोखेबाज” कहलाने के डर से स्वप्न टूट गए। 27 अप्रैल 2013 को उन्होंने छत से लटककर आत्महत्या कर ली। उनके परिजनों के अनुसार वह बार-बार एक ही बात कहते थे- “मैं उन्हें क्या जवाब दूंगा जिनके पैसे मैंने डुबो दिए?

Topics: पाञ्चजन्य विशेषmain. FEATUREDविधि का शासनवैधानिक मर्यादासामान्य सहमतिडीएसपीई एक्टप्रमुख घोटालेसंदेशखाली राशन घोटालापश्चिम बंगालनारदा स्टिंग केसशिक्षक भर्ती घोटालाशारदा चिटफंड घोटाला
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