असम कह रहा है - मैं अपनी सुगंध नहीं बेचूंगा
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असम कह रहा है – मैं अपनी सुगंध नहीं बेचूंगा

असम का चुनावी रण: अहोम संस्कृति और विकास के 'सूर्योदय' के बीच खिलता कमल

Written byप्रदीप पंडितप्रदीप पंडित
Apr 6, 2026, 09:01 pm IST
in भारत, विश्लेषण, असम

ब्रह्मपुत्र की अंगुलियों पर पड़ती धूप में तपता असम एक लंबे अंतराल से अपेक्षित हरापन बुन रहा है। इसलिए उसकी अपेक्षाओं को केवल चुनावी शोर में खोजना व्यर्थ है, क्योंकि असमिया संस्कृति का विकास वहां के बाशिंदों की चेतना का इतिहास भी है। पिछले 15 सालों में यहां कई नाटकीय राजनीतिक बदलाव हुए हैं। इस बार भी भाजपा की हिमंत विश्व सरमा की सरकार के सामने कांग्रेस सत्ता में आने की बेकलियों से ताल ठोक रही है। मगर इनमें जो भी असम संस्कृति को अपनी भाव-संकुल चादर से ओढ़ेगा, अहोम संस्कृति को अपनाएगा, असम की सरकार सिर्फ उसकी होगी। यह है 13वीं शताब्दी के चोलुंग सुखपा द्वारा स्थापित एक समृद्ध साम्राज्य, जहां रेशम बुनाई के साथ योद्धा भावना हर देहरी का प्रतीक थी। अहोम संस्कार असमिया संस्कार की तरह पूजे जाते हैं।

असमिया संस्कृति का स्पंदन

बात यह है कि इसकी चिंता कभी कांग्रेस से लेकर अन्यान्य दलों ने नहीं की कि असमियों का स्पंदनीय जुड़ाव कहां है। लेकिन भाजपा ने लचित बरफूकन के 400वें जन्मदिन को बड़े पैमाने पर मनाया। लचित को अहोम जनरल माना जाता है। उनकी 85 फीट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया गया। बात महज प्रतिमा के अनावरण की नहीं, यहां की संस्कृति को अपना समझने की है। इसलिए नामघरों, पारंपरिक प्रार्थना-घरों के सौंदर्यीकरण और संरक्षण पर भी ध्यान दिया गया और असम दर्शन योजना के तहत वित्तीय सहायता भी दी गई। इसी तरह असमिया भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिलाने और बोडो संस्कृति को प्रोत्साहित करने के लिए बागुरुम्बा जैसे कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया गया। इतना ही नहीं, बोरगीत और अंकिया नाच को भी प्रोत्साहित करने के प्रयास किए गए।

असम की धड़कन को अपना समझती है भाजपा

यही वह भरोसा है जिसके कारण भाजपा ने 37 विधायकों को पुनः मैदान में उतारा है और 21 लोगों को इस बार चुनाव लड़ने का अवसर नहीं दिया। इस समय 126 सदस्यों की विधानसभा में भाजपा के 69 विधायक हैं। इस बार भाजपा ने किसी मुस्लिम प्रत्याशी को मैदान में नहीं उतारा। 2021 में एक प्रत्याशी लड़ा और जीता, लेकिन उसे भी इस बार नहीं उतारा गया। कांग्रेस इस बार 98 सीट पर लड़ रही है और उसके पास फिलहाल महज 20 सीटें हैं। कांग्रेस ने 15 विधायकों को इस बार टिकट नहीं दिया। सिर्फ 9 लोग हैं जो पहले लड़े थे और विधायक बने थे। साफ है कि वे 15 विधायक इस बार कांग्रेस का जमीनी स्तर पर विरोध कर रहे हैं। इससे पहले अर्थात जब कांग्रेस की हुकूमत थी, तब ऐसे लोगों को असंतुष्ट नेता कहा जाता था। इस बार उसने 52 कहने को नए चेहरों को उम्मीदवार बनाया, मगर इनमें भी करीब 37 उम्मीदवार पहले 30,000 से ज्यादा मतों से हार चुके हैं।

इसे इस तरह से देखें कि 2016 के विधानसभा चुनाव ने भारतीय जनता पार्टी और एनडीए का परचम दिखा था। यह चुनाव भाजपा की प्रतिबद्धकारी योजना, संकल्प और असम में कांग्रेस के फैलाए झिझकते अंधेरे को दूर भगाने का चुनाव था। सर्वानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री बने और पार्टी को 29.51 प्रतिशत वोटों के साथ 60 सीटें मिली थीं। कांग्रेस की केवल 26 सीटें थीं, मगर उसका वोट शेयर थोड़ा ज्यादा था। एजीपी और बीपीएफ की वजह से असम यह समझने को राजी हो गया कि भाजपा असम की धड़कन को अपना समझती है।

असम से जुड़ नहीं पाई कांग्रेस

इस बारे में कांग्रेस और उसके सहयोगी दुष्प्रचार करते रहे हैं। 2021 के चुनाव में भाजपा नीत एनडीए ने 75 सीटों के साथ सरकार बनाई और कांग्रेस के उस भ्रम को भी तोड़ दिया कि उसके पास वोट शेयर ज्यादा है। कांग्रेस 29 सीटें जीत कर 29 फीसदी मत हासिल कर पाई, जबकि भाजपा ने 60 सीटों में अपनी उपिस्थति दर्ज कराते हुए करीब 34 फीसदी मत हासिल किए थे। असम गण परिषद को 8 प्रतिशत मतदाताओं का साथ मिला था। इसलिए कांग्रेस का वोट शेयर हमेशा भाजपा से ज्यादा रहा है, एकदम गलत है। फिर भी इस भरोसे पर कि अल्पसंख्यक उसके साथ हैं, उसने 18 मुस्लिम प्रत्याशियों को उतारा है। हालांकि पिछली बार उसने 19 मुस्लिम चेहरे उतारे थे। मगर कांग्रेस यह कभी समझी नहीं कि असम ने अपनी जरूरतें अपनी भाषा में लिखी हैं-सुरक्षा, हंसी और भूख लेकिन कांग्रेस उससे जुड़ नहीं पाई। मगर भाजपा ने सबसे जरूरी संवाद को अवसर बनाया और अन्य दल किसी की पुरानी पंक्तियों की तरह पार्टी चला रहे थे, जिसमें कहा गया है-

“राजा ने बोला रात है, रानी ने बोला रात है, मंत्री ने बोला रात है — यह सुबह-सुबह की बात है।”

राहुल गांधी ने जनजातीय स्वायत्तता के लिए अनुच्छेद 244A लागू करने और छह समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने की बात की है। इसके साथ उनकी रणनीति यह है कि विकास की जगह सामाजिक न्याय और पहचान की जगह अधिकारों की मांग उठने लगे, लेकिन वे भूल जाते हैं कि असम अनुभूति के स्तर पर आने पर किसी विषय को उठाता है।

मुगलों के समय भी ताकतवर राज्य था असम

मुगलों के समय में भी असम पूरी तरह उनके कब्जे में नहीं आया था। असम को एक ताकतवर राज्य के रूप में विदेशियों ने भी माना। इसलिए असमिया हिंदू, बंगाली मुस्लिम, चाय जनजाति और बोडो-ये ही वोट बैंक राजनीति के आधार हैं। बराक घाटी के सिलचर में ध्यान से देखें तो लगता है कि बिना वोट पैटर्न को समझे विपक्ष को मजबूत मान लेना हास्यास्पद है। इसलिए वहां की सामाजिक संरचना की पड़ताल भी जरूरी है। वनवासी और जनजाति आज लगभग 15 प्रतिशत है, मुस्लिम करीब 8 प्रतिशत, चाय जनजाति 28 प्रतिशत और असमिया हिन्दू करीब 40 प्रतिशत है।

भाजपा और विकास का सूर्योदय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह संकल्प दोहराया है, वे विकास और हिमंत विश्व सरमा की अगुवाई, जिनके बारे में गुवाहाटी में प्रचलित है कि वे शाम को एक बार अपने कार्यालय में बैठ जाते तो तभी उठते हैं जब मेज की सारी फाइलों का निस्तारण न हो जाए। गृहमंत्री अमित शाह ने सुरक्षा और एनआरसी को असमिया संस्कृति से जोड़ा ही नहीं बल्कि इसे प्रदेश की अनुभूतियों का हिस्सा बना लिया। इससे सीधा आभास होता है कि सुदृढ मुद्दों का हाथ अनगढ दलों से छूट रहा है। इसी तरह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी ने हिन्दुत्व और कानून व्यवस्था की प्रस्थापना दी और हेमंत विश्वशर्मा ने आक्रामक रणनीति को स्थानीयता से जोड़ दिया।

कांग्रेस की तु्ष्टिकरण की राजनीति भी नहीं चलेगी

कांग्रेस परंपरागत राख से पार्टी के बासन चमका रही है, उसके पास भ्रष्टाचार और जमीन हड़पने के आरोप हैं। चुनाव से पहले भी वे मुख्यमंत्री पर इस तरह के आरोप लगा चुके हैं, जिसका धारदार उत्तर हिमंत दे चुके हैं। उनके और नेता केंद्र पर आरोप लगा रहे हैं जिसका असर रेनकोट से निथरते पानी से ज्यादा नहीं हुआ। इन रणनीतियों के बाद प्रदेश में करीब 10–15 सीटों पर उम्मीदवार का व्यक्तित्व और मतदाताओं से जुड़ाव ही परिणाम तय करेगा। वैसे जमीनी प्राथमिकता के मुद्दों में रोजगार युवा वोट को प्रभावित कर रहा है। उन्हें मुख्यमंत्री ने अपनी घोषणा से ज्यादा नौकरियां दे दी हैं। हर साल की एक समस्या बाढ़ है, इससे असम का बड़ा हिस्सा परेशान होता है। इस चुनाव में एक बड़े मिथक को भी फैलाने की कोशिश है कि यह चुनाव हिंदू और मुसलमानों के बीच हो रहा है, जबकि पूरे प्रदेश में ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिखता। असमी हिन्दुओं ने 2021 में 67% वोट भाजपा को दिया, जबकि कांग्रेस को 17% मत मिले थे। हालांकि उसे बंगाली हिन्दुओं और मुसलमानों का साथ मिला था। अब देखना होगा कि क्या गतिशीलता और उच्च सहभागिता के बिना आधुनिकीकृत व्यकित्व संभव है। लर्नर जैसे समाजशास्त्री की इस परिभाषा पर हिमंत विश्व सरमा खरे उतर रहे हैं। उनका मानना है कि असम प्रारंभ से भाजपा के साथ है। इसे लेकर कहीं कोई चुनौती नहीं है।

इसी तरह एजीपी प्रमुख अतुल बोरा का कहना है कि एनडीए तीसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही है। उन्होंने इस बात से भी इनकार किया कि एजीपी ने अपनी धर्मनिरपेक्ष नीति को बदल दिया है। उन्होंने कहा कि एजीपी ने कभी धार्मिक बहुसंख्यक या अल्पसंख्यकों की राजनीति नहीं की। पहले चाय बागान के कामगार कांग्रेस के साथ थे, लेकिन अब वे प्रदेश में हो रहे विकास को देख रहे हैं इतना ही नहीं अल्पसंख्यक भी एनडीए की विकास योजनाओं को गौर से देख ही नहीं रहे,बल्कि प्रसन्न भी हैं।

Topics: हिमंत विश्व सरमाबीजेपी बनाम कांग्रेसअहोम साम्राज्यअसम चुनाव 2026असमिया संस्कृतिलचित बरफूकन
प्रदीप पंडित
प्रदीप पंडित
हिन्दी और अंग्रेजी पत्रकारिता में 37 वर्ष का अनुभव। जनसत्ता, संडे मेल, दैनिक भास्कर, स्वदेश ग्वालियर और दिल्ली से प्रका​शित राष्ट्रीय पत्रिका शुक्रवार के संपादक। अनेक रेडियो नाटक, दर्जनों टेली फिल्म, उपन्यास, प्रतिप्रश्न, हिन्दी अकादमी दिल्ली से 1988-89 में साहि​​​त्यिक कृति पुरस्कार से सम्मानित। भारतीय ज्ञानपीठ की अनेक पुस्तकें संपादित। टैगोर और स्टीफन स्पेंडर के अनुवाद और अनेक पुस्तकें। [Read more]
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