मल्लिकार्जुन खरगे का 'जहरीला बयान': हताशा में डूबी कांग्रेस का विभाजनकारी नैरेटिव
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मल्लिकार्जुन खरगे का ‘जहरीला बयान’: हताशा में डूबी कांग्रेस का विभाजनकारी नैरेटिव

असम के नीलामबाजार में दिए गए इस बयान में खरगे ने धार्मिक संदर्भ का उपयोग करते हुए मुसलमानों से यहां तक कह दिया कि “कुरान में लिखा है कि नमाज पढ़ते समय अगर कोई जहरीला सांप दिख जाए, तो उसे तुरंत मार देना चाहिए।” इसी तर्ज पर उन्होंने भाजपा-आरएसएस को “खत्म करने” की बात कही।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Apr 8, 2026, 10:10 am IST
in भारत
मल्लिकार्जुन खरगे

मल्लिकार्जुन खरगे

भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, किंतु जब यह प्रतिस्पर्धा तथ्यों, नीतियों और विचारों से हटकर कटु, उग्र और विभाजनकारी भाषा में बदल जाए, तब समझ लीजिए वह लोकतंत्रीय चेतना को आहत करने लगी है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्‍यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा असम की एक चुनावी सभा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को “जहरीला सांप” बताने वाला बयान इसी गिरते राजनीतिक स्तर का परिचायक है। यह टिप्पणी लोकतांत्रिक मर्यादाओं और सामाजिक सौहार्द पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

खरगे ने मुसलमानों से क्या कहा

असम के नीलामबाजार में दिए गए इस बयान में खरगे ने धार्मिक संदर्भ का उपयोग करते हुए मुसलमानों से यहां तक कह दिया कि “कुरान में लिखा है कि नमाज पढ़ते समय अगर कोई जहरीला सांप दिख जाए, तो उसे तुरंत मार देना चाहिए।” इसी तर्ज पर उन्होंने भाजपा-आरएसएस को “खत्म करने” की बात कही। बोले, “बीजेपी-आरएसएस वह जहरीला सांप है। अगर इन्हें नहीं मारा तो जान बचाना मुश्किल हो जाएगा।” यह भाषा राजनीतिक आलोचना कहीं से भी नहीं है, बल्‍कि एक खतरनाक संकेत समाज में वैमनस्य फैलाने के संबंध में है।

झूठा आरोप लगाते हैं राजनीतिक दल

यदि इस पूरे विवाद को तथ्यों और जमीनी हकीकत के संदर्भ में देखा जाए, तब सच स्‍वयं में प्रकाशमान हो उठता है, समझ आता है कि खरगे का लगाया गया आरोप कितना द्वेषपूर्ण और असत्‍य है। भाजपा और आरएसएस पर राजनीतक दल अल्पसंख्यक खासकर (मुसलमान और ईसाई) विरोधी होने का झूठा आरोप लगाते है, किंतु सरकारी योजनाओं और उनके लाभार्थियों के आंकड़े इस दावे को कमजोर करते हैं। आरएसएस के सेवा कार्य और हर विपदा के दौरान एवं सहज स्‍थ‍िति में समाज जीवन के हित जो कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, वे इस झूठ को सिरे से नकारने के लिए पर्याप्‍त हैं।

केंद्र की कल्याणकारी योजनाएं

पिछले एक दशक में केंद्र सरकार द्वारा चलाई गई प्रमुख जनकल्याणकारी योजनाओं पर नजर डालें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इनका लाभ बिना किसी भेदभाव के समाज के हर वर्ग तक पहुंचा है। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 2015 से 2024 के बीच लगभग 03 करोड़ से अधिक पक्के मकानों का निर्माण हुआ। विभिन्न राज्यों के आंकड़ों के अनुसार, इन लाभार्थियों में अल्पसंख्यक समुदाय की हिस्सेदारी कई स्थानों पर उनकी जनसंख्या के अनुपात से कहीं अधिक रही है। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कई जिलों में मुस्लिम लाभार्थियों की हिस्सेदारी 25 फीसद से 35 प्रतिशत के बीच दर्ज की गई, जबकि उनकी जनसंख्या लगभग 18–20% के आसपास है।

इसी प्रकार प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत 9.6 करोड़ से अधिक गैस कनेक्शन वितरित किए गए। पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इनमें बड़ी संख्या में मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक महिलाओं को लाभ मिला। कई सामाजिक अध्ययनों में यह पाया गया कि ग्रामीण मुस्लिम परिवारों में उज्ज्वला योजना का प्रभाव विशेष रूप से सकारात्मक रहा, जिससे धुएं से होने वाली बीमारियों में कमी आई।

स्वास्थ्य क्षेत्र में आयुष्मान भारत योजना एक ऐतिहासिक पहल रही है। इस योजना के अंतर्गत 50 करोड़ से अधिक लोगों को 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा कवरेज दिया गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक 6 करोड़ से अधिक अस्पताल उपचार इस योजना के तहत हो चुके हैं। इनमें अल्पसंख्यक समुदाय की भागीदारी उल्लेखनीय रही है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां आर्थिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समुदाय बड़ी संख्या में रहते हैं।

ये भी पढ़ें – खरगे के जहरीले बयान के खिलाफ आरएसएस ने दर्ज कराया मामला, RSS और BJP को समाप्त करने का किया था आह्वान

आर्थिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में प्रधानमंत्री मुद्रा योजना का प्रभाव भी उल्लेखनीय है। इस योजना के तहत अब तक 40 करोड़ से अधिक ऋण स्वीकृत किए गए हैं, जिनमें से लगभग 60 फीसद लाभार्थी महिलाएं हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, मुस्लिम समुदाय के छोटे व्यापारियों और कारीगरों ने इस योजना का व्यापक लाभ उठाया है। कई राज्यों में मुद्रा लोन प्राप्त करने वालों में मुस्लिम उद्यमियों की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत तक पहुंची है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी केंद्र सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के लिए चलाई जा रही छात्रवृत्ति योजनाएं उल्लेखनीय हैं। प्री-मैट्रिक, पोस्ट-मैट्रिक और मेरिट-कम-मीन्स स्कॉलरशिप के तहत हर वर्ष लाखों छात्रों को सहायता दी जाती है। 2014 से 2023 के बीच 05 करोड़ से अधिक छात्रवृत्तियां वितरित की गईं, जिनमें बड़ी संख्या मुस्लिम छात्रों की रही है। इसके बाद के सालों में भी यही स्‍थ‍िति देखने को मिलती है, वस्‍तुत: यह दर्शाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार की प्राथमिकता “समावेशी विकास” है, न कि “चयनात्मक लाभ” किसी को प्रदान करना है।

अब एक सरल उदाहरण से भी इसे समझ लेते हैं, मान लीजिए किसी राज्य में मुस्लिम आबादी 20 पतिशत है, किंतु जब सरकारी योजनाओं के लिए आवेदन आते हैं, तो उनमें से 30–40 प्रतिशत लाभार्थी मुस्लिम समुदाय से होते हैं। इसका कारण यह है कि ये योजनाएं धर्म के आधार पर नहीं, आर्थिक और सामाजिक जरूरत के आधार पर लागू की जाती हैं। यानी जो गरीब है, वंचित है, वही प्राथमिकता में आता है चाहे वह किसी भी धर्म-समुदाय का ही क्‍यों न हो। राज्य स्तर पर भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। असम में हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में चल रही योजनाओं में सभी समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। वहीं उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के दौरान कानून-व्यवस्था और योजनाओं के वितरण में पारदर्शिता आई है, जिससे सभी वर्गों को समान रूप से लाभ मिला है। मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान, उत्‍तराखण्‍ड, दिल्‍ली, गुजरात, उड़ीसा, छत्‍तीसगढ़, महाराष्‍ट्र आज आप किसी भी भाजपा शासित राज्‍य के आंकड़ों को उठाकर देख कसते हैं। जनसंख्‍या के अनुपात में सबसे अधिक सरकारी योजनाओं का लाभ उल्‍पसंख्‍यक विशेषकर मुसलमानों के द्वारा ही उठाया जा रहा है।

कांग्रेस का राजनीतिक नैरेटिव

इसके विपरीत, कांग्रेस का राजनीतिक नैरेटिव लंबे समय से “भय” और “भ्रम” पर आधारित रहा है। अल्पसंख्यकों में उसके द्वारा खासतौर पर मुसलमानों और ईसाईयों के बीच यह संदेश देने की कोशिश की जाती रही है कि भाजपा और संघ उनके विरोधी हैं। किंतु जब वास्तविकता में योजनाओं का लाभ सीधे लोगों तक पहुंचता है, तो यह नैरेटिव कमजोर पड़ता है।

राजनीतिक विमर्श में भाषा की मर्यादा

राजनीतिक विमर्श में भाषा की मर्यादा अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। “जहरीला सांप” और “मार देना चाहिए” जैसे शब्द सीधे तौर पर उकसावे की श्रेणी में आते हैं। यह लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करते हैं और समाज में विभाजन को बढ़ावा देते हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में इस प्रकार की भाषा बोलना पूरी तरह से अनुचित और खतरनाक है। यह सभी समझ लें कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा पर यदि निष्पक्ष दृष्टि से विचार किया जाए, तो उसका मूल उद्देश्य राष्ट्र को संगठित करना और उसे सशक्त बनाना है। संघ की प्रार्थना में प्रतिदिन “भारत को परम वैभव तक पहुंचाने” की कामना की जाती है। यही दृष्टिकोण भारतीय जनता पार्टी की नीतियों में भी परिलक्षित होता है, जहां “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” उसकी नीति का आधार है।

समाज में जहर कौन फैला रहा है?

ऐसे में अब प्रश्न यही उठता है कि आखिर समाज में “जहर” कौन फैला रहा है? कौन समाज को बांटने वाली भाषा का उपयोग कर रहा है? या वह जो विकास और समावेशन की बात कर रहा है? वस्‍तुत: कहना होगा कि आज मल्लिकार्जुन खरगे का बयान कांग्रेस की वर्तमान स्थिति को भी दर्शाता है, जहां ठोस मुद्दों की बजाय विभाजनकारी भाषा का सहारा लिया जा रहा है। कांग्रेस को यह समझ लेना होगा कि भारत की जनता अब पहले से अधिक जागरूक है। वह भाषण से कहीं अधिक काम देखती है। आरोपों से अधिक वह परिणामों का मूल्यांकन करती है।

 

Topics: मल्लिकार्जुन खरगेअसम चुनाव 2026जहरीला सांप बयानआरएसएस और भाजपाकांग्रेस का नैरेटिव
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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