असम चुनाव : कांग्रेस की AI के जरिए फर्जी आरोपों की राजनीति, हिमंत विश्व सरमा की लोकप्रियता के आगे विपक्ष का 'केल्डीयोस्कोप' फेल
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असम चुनाव: कांग्रेस की AI के जरिए फर्जी आरोपों की राजनीति, हिमंत की लोकप्रियता के आगे विपक्ष का ‘केल्डीयोस्कोप’ फेल

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने असम के वनवासी-जनजातीय समाज के मुद्दे पर स्वायतत्ता की बात उठाई। कोई राहुल से पूछे कि यह बात संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची में दर्ज है, दूसरी इस पर नगालैंड, बस्तर और झारखण्ड के पत्थरगढ़ी आंदोलन में और क्या बात थी।

Written byप्रदीप पंडितप्रदीप पंडित
Apr 7, 2026, 08:02 pm IST
in असम

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने असम के वनवासी-जनजातीय समाज के मुद्दे पर स्वायतत्ता की बात उठाई। कोई राहुल से पूछे कि यह बात संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची में दर्ज है, दूसरी इस पर नगालैंड, बस्तर और झारखण्ड के पत्थरगढ़ी आंदोलन में और क्या बात थी। एक समृद्ध वाचिक परंपरा को लगातार नष्ट करते हुए आपकी बात सिर्फ ‘शायद’ तक आ रही है कि शायद इससे कुछ हो जाए। उन्होंने कहीं पढ़ लिया कि यदि वोटों में विचलन होता है तो करीब 20 सीटें प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने आरोप उछाल दिया कि मुख्यमंत्री हिमंत विश्व सरमा की पत्नी रिनीकी भूईयां शर्मा के पास विदेशों में अघोषित अपार संपत्ति है। यह भी आरोप लगाया कि उनके पास तीन पासपोर्ट भी हैं। इस पर धैर्यपूर्वक मगर धारदार तरीके से मुख्यमंत्री ने कहा वे इस पर मानहानि का दावा करेंगे और उन्होंने कर भी दिया।

हिमंत के काम करने का तरीका अलग

उन्होंने पहले भी कहा था कि कोई भी संपत्ति बेटे और बेटी के लिए नहीं है, यह सब जो भी, जितना भी है, असम की जनता का है। असल में हिमंत के काम करने का तरीका जनता को रास आता है। उनके एक सचिव ने बताया कि मुख्यमंत्री केंद्र की परियोजनाओं को कितनी तेजी से क्रियान्वित करवाते हैं, जैसे वे राज्य सरकार की योजनाएं हों। वे इसके अमलीकरण में केंद्र के संबंधित मंत्री से संपर्क भी करते हैं। ये सारी बातें भी जनता के बीच हैं। इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के उन्हें कांग्रेस में पला-बढ़ा बताने से कोई अंतर नहीं पड़ता। भाजपा के प्रवक्ता रंजीव शर्मा ने कहा है कि करीब अस्सी फीसदी जिला अध्यक्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से हैं। मुख्यमंत्री जब भी इनसे संवाद करते हैं, तो उनकी भाषा अनुभवी स्वयंसेवक की तरह लगती है।

स्वपनिल बरूआ एक समय हिमंत के सचिव थे, हालांकि तब उनके पास स्वास्थ्य विभाग था, उन्होंने बताया कि वे किसी को बुलाते तो बैठाते, फिर योजनाओं पर, बजट पर चर्चा करते। अभिप्राय ये कि वे किसी पर निर्भर नहीं रहते। इसलिए महज आदिवासी शब्द उछालकर आप उनकी सहानुभूति नहीं हासिल कर सकते। उन लोगों का नजरिया पेड़ की तरह होता है, जो नीचे से बढ़ता है। क्या यह सच नहीं कि वनवासियों के नाम पर पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजनाओं में बने कारखानों पर कांग्रेसी हुक्मरानों ने पर्याप्त पीठ थपथपाई थी। हुआ क्या? वनवासियों का अस्तित्व ही वहां से मिटा दिया गया। इसलिए मैं कह रहा हूं ‘शायद’ !

वनवासियों का मिट्टी से नाता पीढ़ियों के पसीने का है

इसी के इर्द-गिर्द कांग्रेस सितौलिया खेल रही है और इंतजार कर रही है कि इस समुदाय का वोट उसकी हथेली पर गिरे। उसे समझना ही होगा कि वनवासियों का मिट्टी से नाता भूरे कागज का नहीं, पीढ़ियों के पसीने का है। इस पसीने से कांग्रेस कभी जुड़ी नहीं। बरपेटा, धुबड़ी, तिनसुकिया और बराक घाटी को कांग्रेस समर्थक अपने खाते में जोड़ रहे हैं। उनका तर्क यह है कि सिलचर आदि की भाषा असमिया नहीं बांग्ला है। कोकराझार में बोडो हैं। बावजूद इसके हिमंत विश्व सरमा युवकों से संवाद करते, नृत्य करते दिखाई देते हैं। उनकी उपिस्थति युवकों में एक प्रकार का ढांढस है। युवक कह उठते हैं कि 100 सीटें जीतेंगे। विश्वास की यह घोषणा किसी नेता की नहीं, जनता की है। पूर्व मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने कहा कि खरगे और राहुल बड़ी ओछी राजनीति करते हैं, परिणाम आने दीजिए उनकी हर बात गलत साबित होगी। भाजपा की किसी नीति में असमंजस नहीं है। राष्ट्रीय अखंडता के मसले पर हम स्पष्ट हैं कि जो भी यहां का है, फिर वह हिन्दू हो, मुस्लिम, बौद्ध, ईसाई या जैन। सभी को सुरक्षित रखना। शताब्दियों से जो यहां रह रहे हैं, उनकी साज संभाल करना। हम मूल्य आधारित राजनीति करते हैं। यही वजह है कि हम लोग आरोपों के पत्थर नहीं उछालते।

कांग्रेस ने शायद की अंतिम आशा में लगाए आरोप

उन्होंने कहा कि कांग्रेस अपनी आसन्न पराजय से ठीक उसी तरह राजी हो गई, जैसे डूबता हुआ आदमी अंत में लहरों को मुट्ठी में भींचने की कोशिश करता हुआ प्रवाह की भेंट चढ़ जाता है। ‘शायद’ की अंतिम आशा में ही उन्होंने हिमंत विश्व सरमा और उनकी पत्नी पर पथरावी हमले किए। पवन खेड़ा और गोगोई ने पत्थर उछाला कि रिनीकी के पास संयुक्त अरब अमीरात, एंटीगुआ, बारमुडा और मिस्र के पासपोर्ट हैं। इसके दस्तावेज भी उन्होंने जारी किए। केंद्र सरकार ने सजगता बरतते हुए इन देशों से स्पष्टीकरण मांगा तो पता चला कि इसमें कुछ भी अधिकृत नहीं है। इस बीच रिनीकी ने असम पुलिस की अपराध शाखा में शिकायत दर्ज कराई कि ये सब एआई का करिश्मा है। हिमंत विश्व सरमा ने कहा कि संयुक्त अरब अमीरात को लेकर कांग्रेस ने जो दस्तावेज जारी किए हैं, उसके आईडी नंबर की जांच करने पर पता चल रहा है कि वे मिस्र के नागरिक के हैं। उसके ही गुम हुए दस्तावेजों को पकिस्तानी फेसबुक ने जारी किया। इतना ही नहीं मिस्र के दस्तावेजों पर पीटी गई छाती का भी कोई अर्थ नहीं निकला। वे दस्तावेज भी किसी और महिला के हैं। यानी फर्जी हैं। सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने भी अपने धारदार प्रतितर्कों से इसे फर्जी बताया।

सिर्फ संबोधन नहीं, उसे निभाते भी हैं हिमंत

वस्तुत: मुख्यमंत्री हिमंत विश्व सरमा असम की महिलाओं, पुरुषों और उनके बच्चों (लोरा-सुवाली) तक से रिश्तई संबोधन में संवाद करते हैं, यहीं उनकी लोकप्रियता का आधार है। वे सिर्फ संबोधन देते नहीं उसे निभाते भी हैं। इसे उनके महिलाओं, बच्चों को दिए गए उपहारों से समझा जा सकता है। मतदान की घड़ी आते-आते राहुल के दिखनौटों ने केल्डीयोस्कोप चलाना शुरू कर दिया। यह कांच का वृत्ताकार होता है, इसमें चूडि़यों के टुकड़े भरे जाते हैं। इन्हें घुमाने पर यह विभिन्न कोणों पर ठहरकर एक रंगीन आकृति बना देते हैं। इसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता। अब चूंकि करीब ढाई करोड़ मतदाता मत देने को आतुर हैं, तो कांग्रेस अतीत के अपने बुर्ज पर खड़ी होकर पराजय को सामने देख रही है।

असम का परिकलन कहता है कि चाय बागान से जुड़े पचास लाख मजदूरों का रुख निर्णायक माना जाता है और वे धर्मा (वेतन) पर अपनी निष्ठा रखते हैं। राज्य में पहचान, नागरिकता और सामाजिक सुरक्षा के मुद्दे भी केंद्र में है। डिब्रूगढ, तिनसुकिया, जोरहट और शिवसागर में असमिया पहचान, शांति और विकास की राजनीति पर लोगों का अटूट विश्वास है। यहीं के चंद्रकुमार दास का कहना है कि पहले उग्रवाद का डर था, अब सकून है। इसी शांति के पक्ष में फिर वोटिंग होगी। तिनसुकिया की सीतूमणि का कहना है कि 1250 रुपया महीना और अरुणोदय योजना से 9000 रुपए मिलने से बहुत-बहुत फर्क पड़ा है। “जाति, माटी, भेंती” (पहचान,जमीन और मातृभूमि) ने वैसे ही विपक्ष को आरंभ से ही बैकफुट पर रखा है। हिमंत अपनी कल्याणकारी योजनाओं जैसे महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता, छात्रों के लिए छात्रवृत्ति, उद्यमियों के लिए सहायता, चाय बगान मजदूरों के लिए विशेष पैकेज को राजनीति से नहीं जोड़ते। वे इसे संवेदनशीलता से जोड़ते हैं।

हिमंत छठी बार जलूकबाड़ी विधानसभा से चुनाव लड़ रहे हैं, परिसीमन के बाद इसका स्वरूप शहरी-उपनगरीय हो गया है। नए वोटरों के जुड़ने को भी उनके हक में माना जा रहा है। ऐसे में सोशल एक्टिविस्ट के दावों और कांग्रेस की रुदाली में कोई फर्क नहीं दिखता।

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प्रदीप पंडित
प्रदीप पंडित
हिन्दी और अंग्रेजी पत्रकारिता में 37 वर्ष का अनुभव। जनसत्ता, संडे मेल, दैनिक भास्कर, स्वदेश ग्वालियर और दिल्ली से प्रका​शित राष्ट्रीय पत्रिका शुक्रवार के संपादक। अनेक रेडियो नाटक, दर्जनों टेली फिल्म, उपन्यास, प्रतिप्रश्न, हिन्दी अकादमी दिल्ली से 1988-89 में साहि​​​त्यिक कृति पुरस्कार से सम्मानित। भारतीय ज्ञानपीठ की अनेक पुस्तकें संपादित। टैगोर और स्टीफन स्पेंडर के अनुवाद और अनेक पुस्तकें। [Read more]
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