कांग्रेस पार्टी केरल में हमेशा से धर्म और जाति को बढ़ावा देकर राजनीति करती रही हैं। अब पूरे देश में भाजपा के उभार के बाद जाति और धर्म के पिछले पायदान पर जाने के बाद अब कांग्रेस पार्टी का पुराना दांव काम नहीं आ रहा है और अब कांग्रेस पूरे देश में हासिये पर खड़ी है। केरल में कांग्रेस क्रिश्चियन और मुस्लिम समुदाय को अपना वोटबैंक बनाकर अपना राजनीतिक हित साधती रही है। केरल में क्रिश्चियन समुदाय 18 प्रतिशत से अधिक है।
ईसाइय़ों के सामने आया कांग्रेस का चाल और चरित्र
मगर अब केरल सहित पूरे देश में क्रिश्चियन समुदाय के समक्ष कांग्रेस पार्टी का असल चाल और चरित्र सामने आ रहा है और पार्टी अपना जनाधार खोती जा रही है। केरल में कांग्रेस पार्टी का सिकुड़ता जनाधार पार्टी के लिए काफी चिंता का सबब है। वहीं यह भाजपा के लिए नए अवसर दे रहा है। पूर्वोत्तर के कई राज्यों मेघालय, नागालैंड मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम और पश्चिमी राज्य गोवा में क्रिश्चियन समुदाय की बाहुल्यता है।
कांग्रेस पार्टी का इन राज्यों में लम्बे समय काल के लिए सरकारें थी। इन राज्यों में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनने का सबसे बड़ा कारण क्रिश्चियन समुदाय का कांग्रेस पार्टी का पूर्ण समर्थन हुआ करता था। मगर इन राज्यों में कांग्रेस पार्टी की स्थिति काफी कमजोर हो गई है। अब कांग्रेस पार्टी इन राज्यों में मुख्य विपक्षी दल भी नहीं बन पा रही है। इन राज्यों में कांग्रेस पार्टी दिनों दिन कमजोर ही होती जा रही है।
क्रिश्चियन बाहुल्य राज्यों में कांग्रेस पार्टी का गिरता चुनावी प्रदर्शन
मेघालय में कोनराड संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी ने कांग्रेस पार्टी को पूरी तरह से धराशायी कर दिया है। मेघालय में 2018 के विधानसभा चुनाव में 21 सीटें जीतने वाली कांग्रेस पार्टी 2023 में महज 5 सीट ही जीत सकी थी। मेघालय में कांग्रेस के चार विधायक एनपीपी में शामिल हो गए और एक विधायक के सांसद बनने के बाद हुए उपचुनाव में कांग्रेस पार्टी हार गई और राज्य में कांग्रेस पार्टी शून्य पर सिमट गई। वहीं गोवा में कांग्रेस के आठ विधायक भाजपा में शामिल हो चुके हैं।
हाल के दिनों में कांग्रेस पार्टी का क्रिश्चियन समुदाय के वोट बैंक में सभी राज्यों में काफी सेंधमारी हुई हैं। केरल में कांग्रेस पार्टी और यूडीएफ का मुख्य वोटबैंक क्रिश्चियन और मुस्लिम समुदाय हुआ करती थी। मुस्लिम मतदाता इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के कारण यूडीएफ को मतदान करते हैं। मगर अन्य राज्यों में जिस प्रकार से क्रिश्चियन समुदाय कांग्रेस पार्टी से अपने को किनारा कर रही है, उससे केरल में भी कांग्रेस पार्टी के लिए अच्छे हालात नहीं दिख रहे है। अगर क्रिश्चियन समुदाय कांग्रेस पार्टी को मत देने में दिलचस्पी नहीं दिखाएगा तो अन्य मतदाता भी कांग्रेस पार्टी से दूरी बना सकते हैं। पूरे देश में यह देखा जाता है कि अगर किसी पार्टी का मुख्य वोट बैंक उससे दूरी बनाता है तो अन्य मतदाता भी उससे दूरी बनाने लगते हैं।
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केरल में कांग्रेस का पतन
केरल में कांग्रेस पार्टी के लिए क्रिश्चियन समुदाय की ओर से और भी मुश्किल पैदा करने वाला परिवर्तन देखा जा रहा है। केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल ने भाजपा को वक़्फ़ के मुद्दे पर खुलेआम समर्थन करके कांग्रेस पार्टी के लिए परेशानी की लकीरे बड़ी कर दिया है। वक़्फ़ विधेयक के कानून बनने के कारण केरल में क्रिस्चियन समुदाय को काफी शकुन मिला है। केरल के एर्नाकुलम जिले के मुनंबम में 2019 में केरल वक्फ बोर्ड द्वारा 404 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन को वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया गया था। मुनंबम में विवादित जमीन पर लगभग 500 परिवार रहते थे, जिनमें ज्यादातर ईसाई हैं। केरल के स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा नीत एनडीए द्वारा मुनंबम में जबरदस्त जीत हासिल की गई हैं। मुनंबम का यह चुनावी नतीजा सिर्फ इस जिला नहीं बल्कि पूरे राज्य के लिए एक नजीर हैं और पूरे राज्य में भाजपा को इसका लाभ मिलता दिख रहा है।
भाजपा नीत एनडीए की चार क्रिस्चियन बाहुल्य राज्यों अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड और गोवा में अपने बूते या सहयोगियों के साथ सरकारे है। केरल के आगामी विधानसभा के चुनाव में भाजपा को इन राज्यों की सरकारों से नैतिक समर्थन मिलने के कारण जहाँ भाजपा की स्थिति मजबूत होगी। वहीं कांग्रेस पार्टी कमजोर होगी।

















