राजनीतिक इच्छाशक्ति का अप्रतिम उदाहरण है “नक्सलवाद” की विभीषिका का समाप्त कर दिया जाना। आज की स्थिति देखिए कि संगठन के पास कोई महासचिव नहीं, समूचे पोलित ब्यूरो और सेंट्रल कमेटी को लगभग समाप्त किया जा चुका है। भारत में नक्सलवाद का गढ़ कहे जाने वाले बस्तर में आखिरी महत्वपूर्ण और नामचीन माओवादी पापाराव के मुख्यधारा में आ जाने के बाद जो छिटपुट संख्या में बंदूक लेकर भटकने वाले शेष हैं, वे अस्तित्वहीन कहे जाएंगे। माओवाद अथवा नक्सलवाद शीर्ष से तल तक एक ऐसा संगठन था जिसमें नचाने वाली उंगलियां अलग और नाचने वाली कठपुतलियां अलग थीं। सोचने-समझने और साजिश रचने वाले दिमाग या तो वसवराजू (दिवंगत महासचिव) की परिणति को प्राप्त हैं या वेणुगोपाल (आत्मसमर्पित पोलित ब्यूरो सदस्य) की। बंदूक लेकर भटकने वाली शेष बची छोटी-मोटी टुकड़ियां अब बेलगाम-दिशाहीन, सोचहीन और लक्ष्यविहीन हैं। स्पष्टतः निर्धारित तारीख से पहले ही माओवाद को इतिहास में परिवर्तित कर दिया गया है। चार हजार से अधिक वर्गमील क्षेत्र (अबूझमाड़) पर आधार इलाका और काठमांडू से तिरुपति तक कमोबेश थोड़ा या अधिक प्रभाव रखने वाला माओवाद, जिसने बड़े-बड़े युद्धों से अधिक हत्याओं का तांडव किया, आज भारत के महान लोकतंत्र के सामने शर्मिंदा और बे-लिबास खड़ा है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
वामपंथ के देश भर से समाप्ति की घोषणा जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में की तब उन्होंने यह स्पष्ट किया था कि इस तारीख को एक ऐसा इतिहास रचा गया है जिसके परिघटित होने की संकल्पना केवल वर्ष भर पहले भी कोई नहीं कर सकता था। इसे जानने के लिए अतीत की ओर जाना अवश्यंभावी हो जाता है। चलते हैं वर्ष 1946-47 के उस दौर में, जब स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था। 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग तथा बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सोहराबर्दी के उकसावे पर बंगाल (विशेष रूप से कलकत्ता) और बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों में मुसलमानों ने भीषण दंगे छेड़ दिए। इस विभीषिका के बीच बंगाल में तब ‘किसान सभा’, जो कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का किसान मोर्चा थी, द्वारा तेभागा आंदोलन की शुरुआत की गई। इसे माओवाद के आरंभिक स्वरूप के रूप में समझा जाना चाहिए।
गांधी की अहिंसा के दौर में कथित किसान गुरिल्ला शैली में लड़ रहे थे। मार्च 1947 में तेभागा आंदोलन समाप्त हुआ और इसके ठीक पांच महीने बाद, अर्थात अगस्त 1947 में, भारत ने आजादी की सुबह देखी। हैदराबाद को निजाम की किसान विरोधी नीतियों की पृष्ठभूमि में अगस्त 1947 से सितंबर 1948 के बीच तेलंगाना आंदोलन का प्रभाव देखने को मिला जो कि उग्र वामपंथियों द्वारा गुरिल्ला शैली में लड़ी जा रही लड़ाई थी। 13 सितंबर 1948 को हैदराबाद में भारतीय सेना ने प्रवेश किया। निजाम की सेना अथवा रजाकार दस्ते एक सप्ताह भी नहीं टिक सके और उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके साथ ही तेलंगाना संघर्ष को कम से कम तब तक के लिए तो विराम ले लेना चाहिए था, जब तक भारत का संविधान लागू नहीं हो जाता। सोचकर देखिए कि अब इस सशस्त्र गुरिल्ला युद्ध को भारतीय सेना के विरुद्ध भी जारी रखने की आवश्यकता क्यों थी? उग्र कम्युनिस्टों द्वारा दी गई ललकार के बाद जनरल जे. एन. चौधरी के नेतृत्व में क्षेत्र में सैन्य प्रशासन स्थापित किया गया और विद्रोहियों के विरुद्ध दमनात्मक कार्रवाइयों का आरंभ हुआ। अंततः 21 अक्टूबर 1951 को कम्युनिस्टों द्वारा तेलंगाना आंदोलन के समाप्त किए जाने की घोषणा की गई।
उग्र कम्युनिस्टों की पहचान नक्सलबाड़ी की घटनाओं से स्थापित हुई। इस दौर के नक्सलवाद पर चर्चा करें, तो मुख्य रूप से चारू मजूमदार का नाम उभरकर सामने आता है। वही चारू मजूमदार, जो माओ त्से-तुंग से प्रभावित था और जिसने वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान चीन के चेयरमैन को अपना चेयरमैन मानते हुए गिरफ्तारी दी थी। कहना न होगा कि कानू सान्याल, चारू मजूमदार, जंगल संथाल, कदम मलिक, मुजीबुर्रहमान आदि वामपंथी नेताओं ने सबसे पहले जन-असंतोष को किसान आंदोलन के रूप में संगठित किया और उसे उग्रता के साथ आगे बढ़ाया। इसका आरंभ 2 मार्च 1967 को हुआ, जब एक स्थानीय जमींदार के विरुद्ध स्थानीय युवक के आक्रोश से जनित चिंगारियों को हवा दी गई। नक्सलवादी सरकार और प्रशासनिक ढांचे का विरोध करते हुए हिंसक गतिविधियों का सहारा लेने लगे और निर्मम हत्याओं का एक सिलसिला चल पड़ा। नक्सलवाद जैसे-जैसे उग्र हुआ इस पर नियंत्रण के प्रयास भी तेज हुए। जुलाई-अगस्त 1971 के मध्य ‘ऑपरेशन स्टीपलचेज’ अभियान बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में एक साथ चलाया गया, जिसमें सेना, अर्धसैनिक बल एवं पुलिस की सम्मिलित भागीदारी रही। योजनाबद्ध दमनात्मक कार्रवाई के फलस्वरूप मात्र दो महीनों के अंतराल में ही नक्सलवाद की कमर तोड़ दी गई।
नक्सलवाद का दूसरा चरण
वर्ष 1970 में श्रीकाकुलम विद्रोह के टूट जाने के बाद तरीमल नागी रेड्डी, देउलपल्ली वेंकटेश्वर राव, चंद्रपुल्ला रेड्डी, कोलावेंकिया आदि ने मिलकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से अलग होकर सीपीआई (एमएल) का गठन किया, जो भूमि संघर्ष हेतु एक सशस्त्र दल था। वर्ष 1975 में हनमकोंडा (वारंगल) के एक विद्यालय में हिंदी विषय के अध्यापक रहे कोण्डापल्ली सीतारमैया ने चीन की सांस्कृतिक क्रांति से प्रभावित होकर पीपुल्स वार ग्रुप का गठन किया। यह सीपीआई (एमएल) का ही एक अंग था। पीपुल्स वार ग्रुप ने अपने प्रारंभिक दिनों में गुंटूर और वारंगल के मेडिकल कॉलेजों, वारंगल के क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज तथा उस्मानिया विश्वविद्यालय में प्रचार कर छात्रों की भर्ती की। आंध्र प्रदेश में नक्सली नेता कोण्डापल्ली सीतारमैय्या सशस्त्र संघर्ष में संलग्न थे। वे लंबे समय से मुलुगु के जंगलों में अपने पैर जमाने का प्रयास कर रहे थे, किंतु सफल नहीं हो पा रहे थे। ऐसे में उन्हें गोदावरी नदी के दूसरी ओर, बस्तर के जंगलों में अपने लड़ाकों के लिए सुरक्षित ठिकाना बनाने का विचार सूझा। सन अस्सी के दशक के दौरान पांच से सात सदस्यों वाले सात अलग-अलग दल, कोण्डापल्ली सीतारमैया ने अपनी योजना के अनुसार भेजे थे। इनमें से चार दल दक्षिणी तेलंगाना के आदिलाबाद, खम्माम, करीमनगर और वारंगल की ओर गए, एक दल महाराष्ट्र के गढ़चिरोली की ओर तथा दो अन्य दल बस्तर की ओर भेजे गए। पीपुल्स वार ग्रुप का बस्तर में प्रवेश किसी भी प्रकार से इस अंचल की समस्याओं अथवा स्थानीय असंतोष को ध्यान में रखकर नहीं किया गया था। यह कदम विशुद्ध रूप से आश्रय तलाशने और एक सशस्त्र बल तैयार करने की दृष्टि से उठाया गया था।
माओवादियों को यह भान था कि यदि सरकारी अधिकारियों, फॉरेस्ट गार्डों, ठेकेदारों, पुलिसकर्मियों, अध्यापकों तथा मुखिया–सरपंच जैसे गांवों में प्रभावशाली माने जाने वाले लोगों पर दबाव बनाया जाएगा, तो उसका असर ग्रामीणों पर अवश्य पड़ेगा। इन सभी को ‘शोषक’ घोषित कर दिया गया। जन-पंचायतें लगाकर उन्हें मारना-पीटना, अपमानित करना, उनके मुंह पर थूकना और उन पर पेशाब करना जैसे कृत्यों के माध्यम से यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया कि वे सरकारी लोग हैं और उनकी कोई हैसियत नहीं है। ग्रामीणों को इससे प्रारंभिक तौर पर शोषण-मुक्ति का एक आभास हुआ और उनमें से अनेक माओवादियों के पक्षधर बन गए। इस दौर में आंध्र प्रदेश में भीषण दमनात्मक कार्रवाइयां चल रही थीं, इसलिए बस्तर के जंगल माओवादियों के लिए अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित ठिकाना बनते चले गए।
कोण्डापल्ली सीतारमैय्या से मतभेद होने के पश्चात वर्ष 1992 में मुलप्पा लक्ष्मण राव उर्फ गणपति पीपुल्स वार ग्रुप का महासचिव बना। 2 मार्च 1993 को कोण्डापल्ली सीतारमैय्या कृष्णा जिले में आंध्र पुलिस की गिरफ्त में आ गए। गणपति का दौर छत्तीसगढ़ परिक्षेत्र में माओवादियों की समग्र पैठ के लिए जाना जाएगा। इन्हीं वर्षों में माओवादी हथियार लूटने की रणनीति पर गंभीरता से कार्य कर रहे थे। इन्हीं समयों में बस्तर का लगभग चार हजार वर्गमील क्षेत्र माओवादियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बन गया था। माओवादियों ने अपने आधार क्षेत्र अर्थात अबूझमाड़ को चारों ओर से सुरक्षित करने के लिए उस दिशा में जाने वाली सभी सक्रिय सड़कों को नष्ट कर दिया। बड़ी-बड़ी डाइक बनाकर अथवा नियमित अंतराल पर समानांतर गड्ढे खोदकर, जो कच्चे रास्ते थे उन पर चलना दुष्कर कर दिया। विस्फोटकों के माध्यम से पक्की सड़कों के भी नामोनिशान मिटा दिए थे। अनेक स्थानों पर तो स्वयं ग्रामीणों ने दबाव में आकर अपने ही क्षेत्र के आवागमन मार्गों को नष्ट किया। इस प्रकार एक व्यापक किलेबंदी की गई और अबूझमाड़ को माओवादियों ने अपने लिए पूर्णतः सुरक्षित क्षेत्र बना लिया। यही नहीं, एरिया डोमिनेशन की रणनीति के तहत वे जहां-जहां आगे बढ़ते गए, वहां-वहां क्षेत्र की सड़कों को भी मिटाते चले गए।
जैसे-जैसे बस्तर के भीतरी क्षेत्रों पर माओवादियों की पकड़ मजबूत होती गई, प्रशासन की चिंता भी बढ़ती गई। वर्ष 1989 में “आपकी सरकार, आपके द्वारा” कार्यक्रम के माध्यम से भी नक्सलियों के विरुद्ध वातावरण तैयार करने और सरकार के प्रति लोगों का विश्वास अर्जित करने के प्रयास किए गए। इसी दृष्टि से तत्कालीन मध्य प्रदेश पुलिस ने (जब छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश का ही हिस्सा था) नब्बे के दशक में नक्सल-विरोधी जन-जागरण अभियान का आरंभ किया। इस अभियान का उद्देश्य लोगों को नक्सली हिंसा के खतरों से अवगत कराना और उसके विरुद्ध एकजुट होने के महत्व को रेखांकित करना था। वर्ष 1990–91 में माओवादियों के विरुद्ध जन-जागरण अभियान को सघन किया गया, जिसमें आम आदिवासियों की भी भागीदारी रही। नक्सलियों ने अभियान से जुड़े ग्रामीणों की एक के बाद एक हत्याएं कर इस प्रयास को दबाव में डाल दिया; धीरे-धीरे सरकार तथा पुलिस भी पीछे हटती चली गई।
हिंसा के चरम का दौर
इस बीच लगभग संपूर्ण बस्तर क्षेत्र में हत्याएं रोजमर्रा की बात हो गई थी। माओवादी हमलों में पांच, सात या दस मौतों को सामान्य घटना कहा जाने लगा। इन हमलों की आलोचना प्रायः तब होती, जब लाशों की गिनती असामान्य रूप से बढ़ जाया करती। वर्ष 2005 में दंतेवाड़ा जिले के एर्राबोर क्षेत्र में हुए माओवादी हमले में पुलिस के तीस जवान शहीद हो गए। इसी तरह की एक और घटना जुलाई 2006 में घटित हुई, जब दंतेवाड़ा जिले में स्थित एर्राबोर के सलवा जुडूम शिविर पर माओवादी हमला हुआ। इस हमले में सैंतीस आदिवासी मारे गए और सैकड़ों गंभीर रूप से घायल हुए। माओवादियों ने लगभग पांच सौ झोपड़ियों को भी आग के हवाले कर दिया। वर्ष 2007 में नक्सलियों ने बीजापुर जिले के रानीबोदली पुलिस पोस्ट पर हमला किया, जिसमें पचपन सुरक्षाकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया गया।
दिसंबर 2007 में दंतेवाड़ा जेल तोड़कर 299 कैदी भाग गए, जिनमें 105 माओवादी गतिविधियों के आरोपी थे। सबसे बड़ा हमला 6 अप्रैल 2010 की सुबह छह बजे हुआ। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और राज्य पुलिस के संयुक्त दल में शामिल लगभग सौ सुरक्षाकर्मी तारमेटला और चिंतलनार गांवों के बीच घने जंगलों से होकर गुजर रहे थे तभी उनके वाहन को धमाके से उड़ा देने के बाद माओवादियों ने जवानों पर गोलियों की बौछार कर दी। इस हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 76 जवान बलिदान हो गए। तारीख 25 मई 2013, छत्तीसगढ़ के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गई। जगदलपुर से 47 किलोमीटर दूर दरभा के झीरमघाट में माओवादियों ने विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान सुकमा से जगदलपुर लौट रहे कांग्रेस पार्टी के पूरे काफिले पर हमला किया। बारूदी सुरंग विस्फोट के बाद की गई अंधाधुंध फायरिंग में पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, राजनांदगांव के पूर्व विधायक उदय मुदलियार और स्थानीय नेता गोपी माधवानी समेत 29 लोगों की मृत्यु हो गई। इसके अतिरिक्त प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और उनके पुत्र दिनेश पटेल की भी नक्सलियों ने हत्या कर दी। माओवादियों ने महेंद्र कर्मा को न केवल अत्यंत बेरहमी से मारा, बल्कि उनके शव के साथ नाच-कूद कर उन्मादी ढंग से अपना तथाकथित विजय-उत्सव भी मनाया। यह माओवादियों के क्रूरतम और पैशाचिक चेहरे का सबसे भयावह उदाहरण था। यह अंत नहीं था; माओवादी इसके बाद भी लगातार अनेक अन्य घटनाओं को अंजाम देते रहे।

अंत की ओर निर्णायक कदम
समय के साथ सुरक्षा बलों ने संगठित और रणनीतिक बढ़त बनानी शुरू की। चरणबद्ध तरीके से नए सुरक्षा कैंप स्थापित होते गए, नक्सल आधार क्षेत्रों को घेरते हुए एरिया डोमिनेशन किया गया और धीरे-धीरे माओवादी प्रभाव क्षेत्र सिमटता चला गया। छत्तीसगढ़ में वर्ष 2024 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के गठन के साथ ही माओवादियों के विरुद्ध निर्णायक और स्पष्ट लड़ाई आरंभ कर दी गई। केंद्र और राज्य-दोनों स्तरों पर जब साझी राजनीतिक इच्छाशक्ति एक साथ सक्रिय हुई, तो इसका प्रभाव जमीन पर भी दिखाई देने लगा। अप्रैल 2024 में गृहमंत्री अमित शाह एक तारीख सामने रखते हैं “31 मार्च 2026”; और लगातार विभिन्न मंचों से उद्घोषित करते हैं कि दी गई तारीख तक नक्सलवाद देश से पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। इस समय नक्सलवाद एक संगठित तंत्र के रूप में विद्यमान था, जिसका महासचिव वसवराजू अबूझमाड़ के जंगलों से देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती बना हुआ था।
वर्ष 2024–25 के दौरान अनेक बड़ी घटनाएं और मुठभेड़ें हुईं, किंतु अब परिणामों की दिशा स्पष्ट रूप से बदलने लगी थी। जहां एक ओर शहीद जवानों की संख्या नगण्य रह गई, वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में माओवादी मारे जाने लगे। माओवादियों को लंबे समय तक यह भ्रम बना रहा कि अबूझमाड़ की लड़ाई सबसे अंत में होगी। किंतु सुरक्षाबलों ने देशभर में चल रहे नक्सल उन्मूलन अभियानों के समानांतर, इस दुर्गम वन-परिक्षेत्र में भी अपने अभियानों को क्रमशः सघन करना प्रारंभ कर दिया। बदली हुई रणनीति के तहत ऐसा प्रतीत होता है कि जिस क्षेत्र को अंतिम युद्धक्षेत्र माना जा रहा था, वहीं से निर्णायक पहल कर दी गई। अत्यंत आक्रामक रणनीति और आपसी समन्वय के साथ सीआरपीएफ, एसटीएफ, बीएसएफ, बस्तर बटालियन, बस्तर फाइटर्स और डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड जैसे विविध सुरक्षा बलों ने माओवाद की रीढ़ पर सीधा प्रहार करने के उद्देश्य से अबूझमाड़ के भीतर गहरी पैठ बना ली।

ताबूत में अंतिम कील
21 मई 2025 की तिथि माओवाद के ताबूत की अंतिम कील सिद्ध हुई। संगठन का महासचिव वसवा राजू, जिसका वास्तविक नाम नंबाला केशव राव था, अबूझमाड़ के जंगलों में हुई एक भीषण मुठभेड़ में अपने इकतीस साथियों सहित मारा गया। किसी आतंकी संगठन के महासचिव का मारा जाना वस्तुतः उस संगठन की रीढ़ टूट जाने के समान होता है। वसवा राजू को इस बात के लिए भी उत्तरदायी माना जाता है कि उसने कुख्यात आतंकी संगठन ‘लिब्रेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम’ (एलटीटीई) के साथ सक्रिय सहभागिता की। इसी दौरान उसने इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED) के उपयोग का प्रशिक्षण प्राप्त किया। दो आतंकी संगठनों के इस समागम ने नक्सलवाद को और अधिक क्रूर, अमानवीय तथा विभत्स रूप प्रदान किया। इसके बाद सबसे महत्वपूर्ण था माड़वी हिडमा का मारा जाना, जो उस तथाकथित “पोस्टर बॉय” का अंत था, जिसकी आड़ में माओवादी संगठन अपने लड़खड़ाते अस्तित्व को किसी भी तरह थामे रखने का प्रयास कर रहा था।
संगठन के महासचिव का मारा जाना निस्संदेह एक बड़ी घटना है, किंतु माओवादियों को अब तक का सबसे गंभीर और निर्णायक नुकसान कर्रेगुट्टा की पहाड़ी पर हुए संघर्ष में उठाना पड़ा था। लगातार इक्कीस दिनों तक चले इस बड़े एंटी-नक्सल ऑपरेशन के अंतर्गत छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र के सुरक्षा बलों ने संयुक्त रूप से भागीदारी निभाई। इस जॉइंट ऑपरेशन में कुल इकतीस माओवादी मारे गए। कर्रेगुट्टा की पहाड़ी पर हुआ यह संघर्ष केवल माओवादियों को हुई कैडर हानि के कारण ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसलिए अधिक निर्णायक है क्योंकि यहां लाल आतंकवाद ने अपनी संगठित युद्ध क्षमता ही खो दी। इसके बाद तो आत्मसमर्पण का एक सिलसिला ही चल निकला। देवजी के समर्पण के साथ ही यह संभावना भी समाप्त हो गई थी कि संगठन को आगे बढ़ाने के लिए कोई नेता शेष भी बचा है।
छत्तीसगढ़ में माओवाद के विरुद्ध लड़ाई के लिए एक बड़ा दृष्टिकोण चाहिए था, चूंकि न केवल संगठन के अधिकांश कैडर बस्तर से थे बल्कि अबूझमाड़ को कथित आधार इलाका बनाने में भी माओवादी इसी राज्य में सक्षम हुए थे। राज्य के गृहमंत्री विजय शर्मा जी को इस बात का जितना अधिक श्रेय दिया जाए, उतना कम है कि उन्होंने केंद्र के दृष्टिकोण को अपना मिशन बनाकर प्रतिबद्धता से प्रतिपालित किया। उन्होंने उग्र वामपंथ से बातचीत के दरवाजे कभी बंद किए ही नहीं, लेकिन स्थिति को कड़ाई से नियंत्रित भी किया। वे समर्पण करने वाले माओवादियों से सीधे फोन कर उनमें भरोसा भी जगाते रहे, साथ ही जवानों का मनोबल भी ऊंचा रखने में उन्होंने कोई कमी नहीं रखी। आज जब हम माओवाद को समाप्त कह रहे हैं तो राज्य के गृहमंत्री श्री विजय शर्मा के योगदान को इसमें बड़े अक्षरों से लिखकर रेखांकित करना होगा। उन्हें मैं संवेदनशील इस मायने में भी कहूंगा कि माओवादियों के आत्मसमर्पण को उन्होंने हमेशा “पुनर्वास” कहकर संबोधित किया और इसे अपनी नीति की तरह प्रस्तुत किया है।















