छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खात्मे का निर्णायक मोड़ किसे कहा जाए, रणनीति, नेतृत्व या राजनीतिक इच्छाशक्ति ?
इसको केवल तीन बिंदुओं में बांधना उचित नहीं होगा। मैं ऐसे अनेक विषयों का उल्लेख करना चाहता हूं, जिनमें कई मुख्य बिंदु रहे हैं। सर्वप्रथम, यह बस्तर और छत्तीसगढ़ की जनता की भावना का विषय है। जब जनता ने यह ठान लिया कि यह लाल आतंक समाप्त होना चाहिए, तो उसी जनभावना के अनुरूप माननीय प्रधानमंत्री जी ने भी यह संकल्प व्यक्त किया कि हम नक्सलवाद समाप्त करेंगे। माननीय केंद्रीय गृह मंत्री जी ने भी स्पष्ट रूप से कहा कि नक्सलवाद समाप्त किया जाएगा और इसके लिए ठोस रणनीतियां भी बनाई गईं। मुख्यमंत्री माननीय विष्णुदेव साय जी के नेतृत्व में यह कार्य आगे बढ़ा, जिसका परिणाम आज हम सबके सामने है।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि न तो बस्तर में और न ही छत्तीसगढ़ में अधिकारी बदले, न कर्मचारी बदले, सरकार बदली और सरकार का संकल्प बदल गया। पूर्ववर्ती सरकार में यह कार्य पूरी तरह नहीं हो पा रहा था, क्योंकि उसमें आधे मन से प्रयास किए जाते थे। नई सरकार के आने के बाद इस विषय पर पूरी ताकत और प्रतिबद्धता के साथ काम प्रारंभ हुआ। इसलिए मैं कहूंगा कि सबसे पहले यह जनमानस का विषय है, उसके बाद सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति का विषय है, और साथ ही रणनीतिक निर्णय भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहे हैं।
रणनीति के स्तर पर भी कई निर्णायक मोड़ आए। विशेष रूप से ऑपरेशन्स के क्षेत्र में, जब बासोराजु, जिसे इनका जनरल सेक्रेटरी माना जाता था, के विरुद्ध कार्रवाई हुई। यह एक बड़ा संकेत था, जिसकी प्रतिक्रिया विदेशों तक में देखने को मिली, जहां श्रद्धांजलि सभाएं तक आयोजित हुईं। दूसरा महत्वपूर्ण मोड़ अक्तूबर 2025 में देखने को मिला, जब 210 लोगों ने आत्मसमर्पण किया। यह नक्सलवाद से जुड़े अब तक के सबसे बड़े पुनर्वास और आत्मसमर्पण अभियानों में से एक था, जिसमें विभिन्न धाराओं से जुड़े लोग शामिल थे। इस प्रकार, इस पूरी प्रक्रिया में दो प्रमुख आयाम स्पष्ट रूप से सामने आते हैं, एक ऑपरेशन्स का और दूसरा पुनर्वास का। इन दोनों क्षेत्रों में निर्णायक प्रगति के बाद ही आज हमें यह सुखद परिणाम देखने को मिला है।
इस पूरे संकल्प का श्रेय आप किसे देंगे?
निस्संदेह, इसका सबसे बड़ा श्रेय बस्तर और छत्तीसगढ़ की जनता को जाता है। इसके बाद माननीय प्रधानमंत्री जी की प्रेरणा, माननीय केंद्रीय गृह मंत्री जी का मार्गदर्शन और उनकी बनाई रणनीतियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। साथ ही, माननीय विष्णुदेव साय जी ने सभी को कार्य करने की स्वतंत्रता दी, जिससे यह अभियान प्रभावी रूप से आगे बढ़ सका। इसके साथ ही, सशस्त्र बलों के जवानों का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपनी वीरता और पराक्रम से ऐसी परिस्थितियां निर्मित कीं, जिनके कारण न केवल हमारे अभियान सफल हुए, बल्कि पुनर्वास की प्रक्रिया भी संभव हो सकी और लोग मुख्यधारा में वापस लौटे।
जनवरी, 2024 की उस बैठक में बारे में बताएं, जिसमें नक्सलवाद के खात्मे की समय-सीमा तय की गई थी।
नई सरकार दिसंबर, 2023 में बनी। इसके बाद जनवरी, 2024 में पहली महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि उसके आसपास के सभी नक्सल-प्रभावित राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इसमें भाजपा और अन्य संगठनों से जुड़े लोग, तथा नक्सल विरोधी अभियानों में कार्यरत विभिन्न आयामों के अधिकारी उपस्थित थे। इस बैठक में विभिन्न वर्टिकल्स को एकीकृत (इंटीग्रेट) करने पर जोर दिया गया,जैसे छत्तीसगढ़ की आर्म्ड फोर्सेज, सीआरपीएफ और अन्य केंद्रीय बलों के बीच समन्वय स्थापित करना। माननीय केंद्रीय गृह मंत्री जी ने इस बात पर विशेष बल दिया कि नक्सलवाद के समूल उन्मूलन की प्रक्रिया क्या हो सकती है, इसका गहन अध्ययन किया जाए।
इसके बाद 2024 में ही दूसरी बैठक आयोजित हुई। उसी बैठक में माननीय केंद्रीय गृह मंत्री जी ने यह घोषणा की कि 31 मार्च, 2026 तक नक्सलवाद के सशस्त्र कैडर (आर्म्ड कैडर) को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा। उस घोषणा का मूल भाव यही था कि नक्सलियों के हथियारबंद ढांचे को पूरी तरह खत्म किया जाए।
एक तरफ सुरक्षा बल अपने अभियान चला रहे थे, तो दूसरी तरफ आप स्वयं नक्सलियों से बात करते थे, उन्हें आश्वस्त करते थे, उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने के लिए वापस आने का आग्रह भी करते थे। इन सभी पहलुओं में से आप किसे निर्णायक घटक मानते हैं?
आप इन अनेक महत्वपूर्ण बिंदुओं में से किसी एक महत्वपूर्ण बिंदु को जानना चाहते हैं, लेकिन किसी एक को निर्णायक बताना वास्तव में कठिन है। इसमें किसी भी एक विषय को कम या दूसरे को अधिक नहीं आंका जा सकता। आपने जिन-जिन आयामों में काम होते देखा है, मैं उन सभी के बारे में विस्तार से बताना चाहूंगा।
यह जो बहुआयामी दृष्टिकोण रहा, उसमें सबसे पहला आधार जनमानस का था। जनता की भावना के आधार पर माननीय प्रधानमंत्री जी ने संकल्प लिया, माननीय केंद्रीय गृह मंत्री जी ने रणनीति बनाई और मुख्यमंत्री जी का मार्गदर्शन मिला। यह एक राजनीतिक आयाम था, जो दृढ़ इच्छाशक्ति को प्रदर्शित करता है।
दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष बस्तर की जनजातियों का रहा। बस्तर में रहने वाली विभिन्न जनजातियां, मारिया, मुरिया, दोरला, गोंड, हल्बा, इन सभी के प्रमुखों के साथ सैकड़ों बैठकें हुईं। इन जनजातीय नेतृत्व ने स्वयं आगे बढ़कर समाज के मार्ग से भटके हुए युवाओं को वापस मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया। ऐसे अनेक प्रकरण हैं, जिनमें वे युवाओं को लेकर आए और उनका पुनर्वास भी कराया गया।
तीसरा महत्वपूर्ण आयाम पंचायती राज के प्रतिनिधियों का रहा। उन्होंने भी सक्रिय भूमिका निभाई, लोगों को समझाया, उन्हें वापस मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया और उनके पुनर्वास में सहयोग दिया। एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि जो भी नक्सली वापस आना चाहता था, उसे सुरक्षित तरीके से वापस लाने में बस्तर के पत्रकारों ने भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई। मैं विशेष रूप से बस्तर का उल्लेख इसलिए कर रहा हूं क्योंकि पूरे भारत में नक्सलियों के जो सशस्त्र कैडर हैं, उनमें से लगभग 90–95 प्रतिशत बस्तर क्षेत्र से ही जुड़े होते हैं। ऐसे में बस्तर के युवाओं को, जो वापस आना चाहते थे, मार्गदर्शन देना और उन्हें सुरक्षित तरीके से वापस लाना, इसमें पत्रकारों ने भी महत्वपूर्ण कार्य किया।
मेरी स्वयं 6–7 बड़े समूहों से लगातार बातचीत होती रही। बस्तर के नक्सल इतिहास के सबसे बड़े पुनर्वास अभियानों में से एक में, 310 लोगों के समूह के साथ संवाद हुआ, जिसमें बातचीत के माध्यम से 210 लोगों ने आत्मसमर्पण किया और मुख्यधारा में वापस लौटे।
इसके अलावा, कई अन्य घटनाएं भी हुईं, जिनमें या तो सीधी बातचीत हुई, या उन्होंने वीडियो संदेश की मांग की तो मैंने नाम उल्लेखित करते हुए वीडियो संदेश भेजे। कहीं उन्होंने रेडियो संदेश की बात कही, तो उसे भी रेडियो के माध्यम से उन्हें भेजा गया। यह भी एक महत्वपूर्ण आयाम रहा। इसके साथ-साथ सरकार की योजनाएं भी अत्यंत प्रभावी रहीं। पुनर्वास नीति बहुत सुदृढ़ रही। बस्तर के युवाओं को खेलों से जोड़ने के लिए ‘बस्तर ओलंपिक’ का आयोजन हुआ, वहीं उनकी सांस्कृतिक रुचियों को ध्यान में रखते हुए ‘बस्तर पंडुम’ जैसे आयोजन किए गए। इसके अलावा, केंद्र की कई एजेंसियों, जैसे एनटीआरओ, डीआरडीओ, आईटीबीपी के तकनीकी विभाग ने भी इस अभियान में महत्वपूर्ण सहयोग दिया। इन सभी आयामों और इस बहुआयामी दृष्टिकोण के माध्यम से ही आज हमें यह सुखद परिणाम देखने को मिला है।
क्या पहले राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव था ? क्या पहले सुरक्षा बलों के ऑपरेशन्स पर राजनीतिक दबाव रहता था? और आपकी सरकार आने के बाद नक्सलियों पर निर्णायक दबाव कैसे बना, इसे थोड़ा विस्तार से बताएं?
ऐसा नहीं है कि पहले किसी ने काम नहीं किया। सभी ने अपने-अपने स्तर पर प्रयास किए हैं। परंतु दृढ़ इच्छाशक्ति और अंतिम संकल्प लेना, यह अत्यंत साहस का कार्य होता है। जब कोई संकल्प लिया जाता है, तो पूरी दुनिया उस पर नजर रखती है। जैसे महाभारत में अर्जुन ने संकल्प लिया था, वैसे ही यहां भी स्थिति रही।
माननीय केंद्रीय गृह मंत्री जी ने यह संकल्प लिया, और उसे धरातल पर उतारने के लिए बड़े सामर्थ्य की आवश्यकता होती है। जब 31 मार्च, 2026 की समय-सीमा तय की गई, उसी दिन से इस दिशा में योजनाबद्ध प्रयास प्रारंभ हो गए। कुछ लोगों को लगा होगा कि यह कैसे संभव होगा, लेकिन इसके पीछे स्पष्ट गणितीय और रणनीतिक योजना थी। नक्सलवाद की विचारधारा को समाप्त करना एक अलग विषय है, लेकिन उनके सशस्त्र कैडर को समाप्त करना एक प्रकार से गणितीय प्रक्रिया की तरह था। इसके लिए विस्तृत मैपिंग की गई। लगभग 6000 लोगों के कैडर की पहचान की गई, जिनमें से लगभग 3000 लोगों ने पुनर्वास किया, कुछ लोग पलायन कर गए और 536 लोगों को गिरफ्तार किया गया। सरकार की इच्छाशक्ति सबसे महत्वपूर्ण कारक होती है। जब आप एक निश्चित समय-सीमा तय कर देते हैं, तो पूरा तंत्र उसी दिशा में केंद्रित हो जाता है।
दिल्ली या बड़े-बड़े शहरों में बैठे शहरी नक्सली जनजातीय समाज का नाम लेकर नक्सलवाद को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन दिलाने का प्रयास करते थे। ऐसा वातावरण बनाया जाता था कि यह समाज ही नक्सलियों को पोषित करता है। आज जब छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद का समूल नाश हो चुका है, तो इस धारणा की सत्यता पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
नक्सलवादियों ने बस्तर में वनवासियों की नृशंस सामूहिक हत्याएं की हैं। यह कोई कहने-सुनने की बात नहीं है, बल्कि इसके स्पष्ट प्रमाण मौजूद हैं, चिंगावरम, गोडागांव, दर्भागुड़ा, मनिकोंटा, एर्राबोर, झीरम में ऐसी एक नहीं, अनेक घटनाएं हुई हैं। हमने स्वयं देखा है कि सुकमा और बीजापुर के क्षेत्रों में, विशेष रूप से गंगालूर, भैरमगढ़, पामेड़ जैसे इलाकों में, एक-एक घर से एक युवा को जबरन शामिल करने का नियम बना दिया गया था, जिसके कारण युवाओं को जाना पड़ता था।
अनेक क्षेत्रों में उनसे मुर्गी, चावल, पैसे की वसूली की जाती थी। यदि किसी के पास मोटसाइकिल होती थी तो अलग राशि, यदि ट्रैक्टर या कार हो तो अलग राशि ली जाती थी। कुल मिलाकर यह एक जबरन वसूली का तंत्र था। यह पूरी तरह स्पष्ट है कि ये दिशाहीन लोग थे, जिन्हें स्वयं भी नहीं पता था कि वे क्या कर रहे हैं। वे बंदूक की नली से सरकार बनाने की कल्पना कर रहे थे, जो कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में संभव ही नहीं है। भारत का लोकतंत्र कभी कमजोर नहीं हो सकता, क्योंकि इसकी जड़ें वैशाली गणराज्य और लिच्छवी गणराज्य से लेकर आज तक अत्यंत मजबूत रही हैं। बीच-बीच में मुगल आए, अंग्रेज आए, लेकिन अंततः भारत का लोकतंत्र ही विजयी होकर उभरा।
नक्सलियों के फंडिंग नेटवर्क और वसूली तंत्र को तोड़ने में सरकार और प्रशासन कितना सफल रहा है?
नक्सलियों के पोलित ब्यूरो स्तर के एक सदस्य ने जब आत्मसमर्पण किया, तो मैंने स्वयं उससे बातचीत की। उसने बताया कि इस बार छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा तेंदू पत्ते की सरकारी खरीद शुरू करने के कारण उन्हें इस पूरे व्यवसाय से एक रुपया भी प्राप्त नहीं हुआ। जबकि पहले वे इसी माध्यम से 25 से 50 करोड़ रुपए तक की वसूली कर लेते थे। इसके अतिरिक्त, एनआईए के सर्च और एसआईए के गठन के माध्यम से कई ऐसे प्रकरण सामने आए, जिनके आधार पर उनके वित्तीय नेटवर्क की बड़ी कड़ियां टूट गईं। जो लोग उन्हें पैसे देते थे, उन्हें चिन्हित किया गया, रोका गया और स्पष्ट रूप से समझाया गया कि यदि किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता नक्सलियों तक पहुंचती है, तो संबंधित व्यक्ति भी कानून की कठोर धाराओं के अंतर्गत दोषी माना जाएगा। इस प्रकार, उनके पैसे का स्रोत न केवल बाधित हुआ, बल्कि लगभग पूरी तरह समाप्त हो गया।
आत्मसमर्पण के बाद पुनर्वास एक बड़ी चुनौती है। जो लोग शस्त्र छोड़कर वापस आए हैं, उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने की क्या योजना है? सरकार उनके रोजगार, आजीविका और अन्य आवश्यकताओं के लिए क्या कर रही है?
यहां दो स्तरों पर कार्य हो रहा है, एक, जो पुनर्वास कर रहे हैं, और दूसरा, बस्तर का सामान्य जनमानस। जो लोग आत्मसमर्पण कर चुके हैं, उनके लिए आर्थिक सहायता की प्रक्रिया शुरू की गई है। उन्हें पुनर्वास नीति के अंतर्गत लाभ दिया जा रहा है। उनके कौशल विकास पर काम किया जा रहा है, उनके आवश्यक दस्तावेज तैयार कराए जा रहे हैं, उनके खेतों में सिंचाई की व्यवस्था सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है। उनके सामाजिक, आर्थिक और मानसिक पुनर्वास तीनों पहलुओं पर समान रूप से ध्यान दिया जा रहा है।
दूसरी ओर, बस्तर के सामान्य जनमानस के लिए भी व्यापक योजना है। इसमें समाज के सहयोग की अपेक्षा है। यह केवल सरकार का कार्य नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग को इसमें भागीदारी निभानी होगी। विशेष रूप से महिला स्व-सहायता समूहों के माध्यम से लघु वनोपज आधारित अर्थव्यवस्था को सशक्त करने पर जोर दिया जा रहा है। आने वाले समय में जो सुरक्षा कैंप हैं, उन्हें लघु वनोपज के संग्रहण, प्रसंस्करण और विपणन के केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना है। साथ ही, वहां थाने, स्कूल और अस्पताल भी स्थापित किए जाएंगे। इस प्रकार, लघु वनोपज के माध्यम से लोगों की आय में वृद्धि होगी। बस्तर की विशेषता यह है कि वहां निवास क्षेत्र, कृषि भूमि और जंगल, तीनों उपलब्ध हैं, जिससे वहां के लोगों को सामान्य मैदानी क्षेत्रों की तुलना में अधिक अवसर प्राप्त होते हैं।
एक और चुनौती आपके सामने आईईडी (IED) युक्त गांवों की है। इसे आप कैसे दूर करेंगे? आपने कहा भी है कि एक अभियान चलाकर गांवों को पूरी तरह आईईडी मुक्त बनाया जाएगा, इसे आप कितनी बड़ी चुनौती मानते हैं ?
यह अभियान लगातार जारी है। प्रत्येक गांव में इस बात की संभावना रहती है कि नक्सलियों द्वारा आईईडी लगाए गए हों, और इनका पता लगाना आसान नहीं होता। इससे मनुष्य और पशु दोनों प्रभावित होते हैं। इसलिए, जहां-जहां आईईडी होने की संभावना है, वहां उन्हें खोजकर निष्क्रिय किया जा रहा है। इसके बाद ही गांव को आईईडी मुक्त घोषित किया जाता है। वर्तमान में हमारे सभी कैंपों में इसके लिए विशेष इकाइयां तैनात हैं, जो प्रतिदिन निकलकर आईईडी हटाने का कार्य करती हैं। रोजाना बड़ी संख्या में आईईडी बरामद किए जा रहे हैं और उन्हें निष्क्रिय भी किया जा रहा है।
पहले जब देश का कोई व्यक्ति छत्तीसगढ़, विशेषकर बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा जैसे क्षेत्रों की ओर देखता था, तो एक भय की भावना होती थी। आज पूरे देश को आप क्या संदेश देना चाहेंगे? इन सुंदर और प्राकृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्रों के लिए लोगों को क्या कहना चाहेंगे?
बस्तर बहुत सुंदर है, अत्यंत समृद्ध है और इसकी समृद्धि में और वृद्धि की अपार संभावनाएं हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज भी बस्तर के साथ खड़ा हो। शासन-प्रशासन अपना कार्य कर ही रहा है, लेकिन समाज की भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जो भी व्यक्ति इस दिशा में योगदान दे सकता है, उसे आगे आना चाहिए-विशेष रूप से लघु वनोपज आधारित अर्थव्यवस्था और स्थानीय विकास के क्षेत्र में। आने वाले समय में बस्तर निश्चित रूप से विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ेगा। बस्तर के युवा विश्व पटल पर अपनी पहचान बनाएंगे।

















