नक्सल मुक्त भारत: तात्कालिक सुरक्षा चिंताएं
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नक्सल मुक्त भारत: तात्कालिक सुरक्षा चिंताएं

30 मार्च 2026 को लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने भारत से नक्सलवाद के अंत की घोषणा की। 31 मार्च 2026 तक पूरा लक्ष्य हासिल। सरदार पटेल के बाद अमित शाह की यह दूसरी बड़ी उपलब्धि। जानिए पूरी डिटेल, सुरक्षा चुनौतियां और आगे का रोडमैप।

Written byलेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)लेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत) — edited by कुलदीप सिंह
Apr 2, 2026, 01:53 pm IST
in विश्लेषण

भारत के गृह मंत्री श्री अमित शाह ने 30 मार्च 2026 को लोकसभा में भारत से नक्सलवाद के अंत की घोषणा की। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है कि उन्होंने 31 मार्च 2026 तक भारत से नक्सलवाद या वामपंथी उग्रवाद (Left Wing Extremism, एलडब्ल्यूई) को खत्म करने के वादे को पूरा किया। उन्होंने 24 अगस्त 2024 को सार्वजनिक रूप से यह प्रतिबद्धता व्यक्त की थी और ऐसी समय सीमा को हासिल करना कभी आसान नहीं होता। इस प्रकार, भारत में सबसे चुनौतीपूर्ण आंतरिक सुरक्षा खतरे को सफलतापूर्वक समाप्त करने का श्रेय श्री अमित शाह को मिलना चाहिए।

1947 में विभाजन के समय 565 से अधिक रियासतों को भारतीय प्रभुत्व में एकीकृत करने की सरदार वल्लभ भाई पटेल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि के बाद, भारत से वामपंथी उग्रवाद को खत्म करने की सफलता  गृह मंत्री के रूप में श्री अमित शाह को अगली श्रेणी में खड़ा करता है। अगस्त 2019 में जम्मू और कश्मीर से आर्टिकल 370 के निरसन का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।

अमित शाह को नक्सल खात्मे के लिए मिली थी खुली छूट

गृह मंत्री के रूप में अमित शाह को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा नक्सलवाद को समाप्त करने की रणनीति बनाने की खुली छूट दी गई है। मोदी 2.0 सरकार के तहत वर्ष 2019 में गृह मंत्री के रूप में कार्यभार संभालने के बाद, श्री शाह ने नक्सलवाद को समाप्त करने के लिए कुछ निर्णायक कदम उठाए। इसके तहत केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF), राज्य पुलिस, कमांडो इकाइयों, खुफिया इकाइयों और रसद व्यवस्था में काफी सुधार किया गया । सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के गढ़ों में लगातार घुसपैठ की। एक बार जब गृह मंत्री द्वारा समय सीमा दे दी गई, जिसे पीएम मोदी का समर्थन प्राप्त था, तो बलों ने तात्कालिकता और उद्देश्य की भावना के साथ काम किया। समय सीमा घोषित होने के बाद, 706 नक्सली मारे गए, 2218 गिरफ्तार किए गए और प्रमुख नक्सली नेताओं सहित 4839 कैडर सदस्यों ने आत्मसमर्पण किया।

इसे भी पढ़ें: बड़े माओवादी हमले की साजिश नाकाम: तेज हुआ एंटी-नक्सल अभियान; गुप्त गुफा में हथियार छिपाकर रख रहे थे नक्सली

कई राज्यों में मुट्ठी पर माओवादी अभी भी सक्रिय

सुरक्षा बलों द्वारा इतने कम समय में प्राप्त किए गए यह प्रभावशाली आंकड़े हैं। लेकिन खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में मुट्ठी भर कैडर अभी भी सक्रिय हैं। गणपति और मिशीर बेसरा जैसे कुछ प्रमुख नक्सली नेता अभी भी गायब हैं। इस प्रकार, निकट भविष्य में कुछ तात्कालिक सुरक्षा चिंताएं होना स्वाभाविक है। हां, वामपंथी उग्रवाद की विचारधारा हार गई है और मोदी सरकार को पिछले दशक में नक्सल प्रभाव से मुक्त हुए नक्सलियों के गढ़ों में सुशासन लाने का पूरा श्रेय दिया जाना चाहिए। अब आर्थिक और मानवीय रूप से प्रभावित नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तेजी से विकास को और गति दी जानी चाहिए।

नक्सलियों से सबसे स्पष्ट खतरा सरकार के इस दावे को खारिज करना होगा कि भारत नक्सलमुक्त हो चुका है और मोदी सरकार को शर्मिंदा किया जाए। इस दिशा में नक्सली साल 2014 से पहले किए गए घात लगा कर किए बड़े हमले से सुरक्षा बलों को निशाना बनाना हो सकता है। नक्सली वीआईपी काफिले या किसी प्रमुख नेता द्वारा संबोधित की जा रही जनसभा को भी निशाना बना सकते हैं। इस लिए सुरक्षा बलों और राज्य/जिला प्रशासन को सुरक्षा प्रोटोकॉल को सख्ती से लागू करना चाहिए और निर्धारित एसओपी का कड़ाई से पालन करना चाहिए। मैं पुरजोर अनुशंसा करता हूं कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सक्रिय सुरक्षा बलों को अगले तीन महीनों के लिए यानी 30 जून 2026 तक परिचालन गति बनाए रखनी चाहिए। प्रभावित राज्यों और जिलों को भी इसी तरह की अप्रोच अपनानी चाहिए। जिन राज्यों में कोई सक्रिय वामपंथी उग्रवाद कैडर नहीं है, उन्हें भी सतर्क रहना चाहिए।

दूसरी सुरक्षा चिंता सुरक्षा बलों और आम जनता को रोकने के लिए नक्सल कैडर द्वारा बड़ी संख्या में बारूदी सुरंगों और आईईडी का पता लगाना और उन्हें निष्प्रभावी करना है। डिमाइनिंग ऑपरेशन समय लेने वाली और जोखिम भरा काम है। इसलिए, संदिग्ध क्षेत्रों में स्थानीय लोगों की आवाजाही को तब तक प्रतिबंधित किया जाना चाहिए, जब तक कि पूरे क्षेत्र को सैनिटाइज नहीं किया जाता है। इसके अलावा, यह माना जाता है कि नक्सलियों ने अपने अपेक्षाकृत नए और स्वचालित हथियारों को सुरक्षित पनाहगाहों में छिपा दिया होगा। बड़ी संख्या में नक्सलियों ने पुराने और कम गुणवत्ता वाले हथियारों के साथ आत्मसमर्पण किया है। इस तरह की रणनीति  भारत के पूर्वोत्तर में विद्रोही समूहों द्वारा भी अपनाई जाती है। छिपाए गए उच्च गुणवत्ता वाले हथियारों के जम्मू-कश्मीर या मणिपुर तक पहुँचने की संभावना भी है। इन हथियारों की खोजबीन जारी रहनी चाहिए।

अगली चिंता नक्सलियों के समर्थन आधार की पहचान करने की होगी, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में। इन ओवरग्राउंड कार्यकर्ताओं को ग्रामीण पार्टी कमेटी (आरपीसी) का सदस्य कहा जाता है और विभिन्न नक्सल प्रभावित राज्यों में इनकी संख्या हजारों  में हैं। सुरक्षा बलों और स्थानीय प्रशासन दोनों के लिए यह एक चुनौती होगी कि वे उन्हें नक्सली विचारधारा से दूर करें और उन्हें समाज में शामिल करें। ग्रामीण क्षेत्रों में यह साबित करने के लिए कि सरकार को उनकी परवाह है, दिखाई देने वाले विकास के त्वरित संकेतों पर ध्यान देना होगा। सामाजिक क्षेत्र में नागरिक प्रशासन की मदद  के लिए कुछ एनजीओ अच्छा योगदान दे सकते हैं।

अर्बन नक्सलवाद अभी भी बड़ा खतरा

अंत में, अर्बन नक्सलियों से खतरा अब और अधिक सामने आने की संभावना है। वामपंथी उग्रवाद का यह नेतृत्व छोटे शहरों और कस्बों में अपनी विचारधारा को फैलाने की कोशिश करेगा, खासकर जहां अभी भी बहुत विकास नहीं हुआ है। तथाकथित वामपंथी उदारवादी बेरोजगार युवाओं को अपने साथ जुड़ने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। खुफिया एजेंसियों को इस तरह के किसी भी प्रयास को शुरू में ही नाकाम करने के लिए बेहद सतर्क रहना होगा। कुछ विपक्षी शासित राज्यों में, स्थानीय प्रशासन शहरी नक्सलियों के प्रति पूरी तरह से सक्रिय नहीं हो सकते हैं। निकट भविष्य में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच एक बहुत ही उच्च स्तर का समन्वय आवश्यक है, इससे पहले कि हम यह कह सकें कि वामपंथी उग्रवाद को भारत से पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है।

स्वतंत्रता के बाद, भारत की आंतरिक सुरक्षा को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले इस संकट के लगभग 59 वर्षों के बाद मार्च 2026 में वामपंथी उग्रवाद का लगभग उन्मूलन एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को इस खतरे से निपटने में उनकी दृढ़ता के लिए पूरा श्रेय दिया जाना चाहिए। इतनी जटिल समस्या के उन्मूलन के तुरंत बाद कुछ तात्कालिक सुरक्षा चिंताएं होना स्वाभाविक है। इन समस्यों पर केंद्र और हर राज्य सरकार को ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। साथ ही हर भारतीय को अपनी धरती से वामपंथी उग्रवाद के अंत पर गर्व होना चाहिए।

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