आज जिस तरह देश में ईसाई मिशनरियों और जिहादियों द्वारा भोले-भाले हिंदुओं को लोभ-लालच में फंसाकर जबरन कन्वर्जन का कुचक्र बड़े पैमाने रचा जा रहा है, ठीक ऐसा ही परिदृश्य मध्य युग में भी था। उस समय देश में सत्तासीन मुसलमान आक्रांता हिंदुओं को डरा-धमका-बरगलाकर जबरन इस्लाम कबूलने को बाध्य कर रहे थे। इसके विरोध में आवाज उठाने वालों में एक प्रमुख संत थे रैदास, जिन्हें संत रविदास के नाम से भी जाना जाता है।
ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार सिकंदर लोदी के शासनकाल में हिंदुओं का जीना दूभर था। हिंदुओं को धन का प्रलोभन देकर और डरा-धमका कर मुसलमान बनाना आम बात थी। हिंदुओं पर विभिन्न प्रकार के कर लगाए जा रहे थे। शादी-ब्याह पर जजिया, पूजा-पाठ पर जजिया, तीर्थ यात्रा पर जजिया, यहां तक कि शव-दाह पर जजिया। इन अत्याचारों से देश का हिंदू समाज त्राहि-त्राहि कर रहा था। हिंदू परंपराओं के पालन पर ‘कर’ वसूली और इस्लाम मानने वालों को छूट देने के पीछे एकमात्र भाव यही था कि हिंदू तंग आकर इस्लाम स्वीकार कर लें।
स्वामी रामानंदाचार्य के शिष्य
ऐसे विषम समय में स्वामी रामानंदाचार्य ने भारतमाता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए और देशवासियों को विधर्मियों से बचाने के लिए अपने शिष्यों में से चयनित कर ‘द्वादश भागवत शिष्य मंडली’ का गठन किया था। उन 12 प्रमुख शिष्यों में संत रविदास भी एक थे। सन् 1376 में माघ पूर्णिमा, रविवार के दिन काशी के मडुवाडीह में जन्मे संत रविदास का परिवार अत्यंत निर्धन था। जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने पैतृक व्यवसाय जूता बनाने को अपनाया, किंतु स्वामी रामानंदचार्य का शिष्य बनने के पश्चात् उनका समूचा जीवन बदल गया। स्वामी रामानंदाचार्य के पारस स्पर्श ने रैदास को भारत वर्ष का महान चमत्कारी संत बना दिया।
‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ उनकी यह कहावत आज भी भारत के घर-घर में लोकप्रिय है। इसका अर्थ है कि यदि आपका मन पवित्र, शुद्ध और नेकनीयत है, तो ईश्वर की प्राप्ति के लिए तीर्थयात्रा की आवश्यकता नहीं है। घर पर ही पूजास्थल पर गंगा स्नान जितना पुण्य मिल सकता है। यह बाहरी दिखावे के स्थान पर आंतरिक शुद्धता पर जोर देती है।
बाद में संत रविदास सिकंदर लोदी के क्रूर अत्याचारों व आतंक से दुखी होकर उसके प्रतिकार को पूरी मजबूती से उठ खड़े हुए और कन्वर्जन के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने उस आक्रांता की चुनौतियों को स्वीकार कर न केवल सनातनधर्मियों को स्वधर्म में अडिग रहने का आत्मबल दिया, वरन् हजारों मतांतरित हिंदुओं की घर वापसी भी करायी। अपनी ‘रैदास रामायण’ में वे लिखते हैं-
वेद धर्म सबसे बड़ा अनुपम सच्चा ज्ञान
फिर क्यों छोड़ इसे पढ़ लूं झूठ कुरआन
वेद धर्म छोडूं नहीं कोसिस करो हजार
तिल-तिल काटो चाहि, गला काटो कटार।
सदना बना रामदास
कहा जाता है कि संत रविदास की बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर सिकंदर लोदी ने सदना नाम के एक कसाई को संत रविदास के पास इस्लाम अपनाने का संदेश लेकर भेजा, क्योंकि वह सोचता था कि यदि संत रविदास इस्लाम स्वीकार लेंगे तो उनके अनुयायी भी इस्लाम के अनुयायी हो जाएंगे। लेकिन उसकी यह कुत्सित मंशा तब धरी की धरी रह गई जब वह सदना कसाई उस महान संत के तर्कों तथा उनके व्यक्तित्व व आचरण से प्रभावित होकर उनका शिष्य बन गया।
इस्लाम त्याग कर उसने वैष्णव पंथ स्वीकार कर लिया और वह रामदास के नाम से सदा-सदा के लिए विष्णु भक्ति में लीन हो गया। जरा विचार कीजिए कि यदि उस समय संत रविदास लोभ-लालच में फंस जाते या तत्कालीन शासक से भयभीत हो जाते तो इस देश के हिंदू समाज को कितनी बड़ी ऐतिहासिक हानि हुई होती।
दिशाभ्रमित समाज को दी दिशा
मध्ययुग के दिशाभ्रमित समाज को उचित दिशा देने वाले इस महान संत का समूचा जीवन तमाम ऐसे अद्भुत एवं अविस्मरणीय प्रसंगों से भरा हुआ है, जो मनुष्य को सच्चा जीवन-मार्ग अपनाने को प्रेरित करता है। भारत की यह महान आध्यात्मिक विभूति कहती है, “रे मन तू अमृत देश को चल जहां न मौत है न शोक है और न कोई क्लेश।” अपनी क्रांतिकारी वैचारिक अवधारणा, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना तथा युगबोध की मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण संत रविदास का धर्म-दर्शन आज भी पूर्ण प्रासंगिक बना हुआ है।
नकारा जातिवाद को
संत रविदास ने जातिवाद को मिथ्या बताया और कहा कि जीव की कोई जाति नहीं होती. न वर्ण, न कुल। ऋषि-मुनियों ने वर्ण को कर्मप्रधान बताया, हमारे शास्त्र भी यही बात करते हैं, जाति भेद की बात को तो मूढ़ और शठ करते हैं-
जति एक जाने एकहि चिन्हा, देह अवयव कोई नही भिन्ना।
कर्म प्रधान ऋषि मुनि गावें, यथा कर्म फल तैसहि पावें।।
जीव न जाति बरन कुल नाहीं, जाति भेद है जग मुखखाई।
नीति-स्मृति शास्त्र सब गावें, जाति भेद शठ मूढ बतावें।।
संत रविदास कहते हैं कि संतों के मन में तो सभी के हित की बात रहती है। वे सभी के अंदर एक ही ईश्वर के दर्शन करते हैं तथा जाति-पांति का विचार भी नहीं करते हैं-
संतन के मन होत हैं, सब के हित की बात।
घट-घट देखें अलख को पूछे जात न पा।।
उन्होंने लोगों को समझाया कि जन्म से कोई श्रेष्ठ या नीच नहीं होता। ओछे (छोटे) कर्म ही व्यक्ति को नीच बनाते हैं।
करुणा के सागर
संत रविदास ने मन के नियंत्रण पर जोर दिया। वे कहते हैं कि जब तक मन निर्मल नहीं होता ऐच्छिक फल की प्राप्ति नहीं हो सकती। वे समझाते हैं, “रे मन, तु भले-बुरे का विचार कर, प्रभु के निर्मल यश का गुणगान कर।” उन्होंने गुरु की खुब महिमा गाई। उनकी मान्यता थी कि जहां तक संभव हो मेहनत करके खाना चाहिए। श्रम रूपी नेक कमाई का फल कभी निष्फल नहीं जाता। उन्होंने मनुष्य जन्म को दुर्लभ बताया तथा कहा कि हमें इस दुर्लभ जीवन की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उन्होंने संपूर्ण देश का भ्रमण किया। वे करुणा के सागर थे। वे जानवरों के प्रति भी करुणा प्रदर्शित करते थे। वे कहते हैं कि जो अपने स्वाद हेतु दूसरे प्राणी की हत्या करता है, उसे कड़ी सजा जरूर मिलेगी। उन्होंने पराधीनता को पाप बताया, धार्मिक आडम्बरों का विरोध किया। सामाजिक समरसता का समर्थन किया। समाज को संगठित करने के लिए उन्होंने एक सूत्र दिया- ‘सत संगत मिलि रहियो माधो, जैसे मधुप मखीरा।’ इसका अर्थ है कि जिस प्रकार मधुमक्खियां मिलकर शहद बनाती हैं, उसी प्रकार सत्संग में मिल-जुलकर प्रेमपूर्वक रहना चाहिए।
उनके इन विचारों ने उन्हें संपूर्ण देश में सम्मान दिलाया। उनके चालीस पदों ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब में प्रतिष्ठा प्राप्त की। उनके अनुयायियों में सभी वर्ग और जाति के लोग शामिल हैं। संत कबीर ने भी ‘संतन में रविदास संत हैं’ कहकर उनके प्रति श्रद्धा प्रकट की।
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द अनटचेबल्स’ को इन्हीं को समर्पित किया। उन्होंने गुरु रविदास जन्मोत्सव कमेटी का गठन कर पंजीकृत कराया तथा दिल्ली में इनकी जन्मोत्सव शोभायात्रा प्रारंभ की। धीरे-धीरे पूरे देश में उनके जन्मदिन पर शोभायात्राएं निकाली जाने लगीं। दिल्ली में रविदास मंदिर, करोल बाग की जमीन भी बाबासाहेब ने खरीदकर दी थी। विदेश में बसे प्रवासी भारतीयों ने भी रविदास सभा तथा रविदास मंदिर स्थापना कर संत रैदास की शिक्षाओं को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दी। आज हम संत रविदास के विचारों पर चलकर सामाजिक समरसता स्थापित करते हुए भारत को विश्वगुरु के पद पर आरूढ कर सकते हैं।

















