23 मार्च: प्रथम न्यायिक हत्या और बलिदानी स्वयंसेवक राजगुरु
June 13, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम भारत

23 मार्च: प्रथम न्यायिक हत्या और बलिदानी स्वयंसेवक राजगुरु

23 मार्च: भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु के बलिदान दिवस पर सादर समर्पित 

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Mar 23, 2026, 09:25 pm IST
in भारत
अमर बलिदानी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु

अमर बलिदानी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में 23 मार्च 1931 का दिन बलिदान दिवस के रुप में शिरोधार्य किया गया है,परंतु वास्तविकता यह है, कि लाहौर षड्यंत्र केस में बरतानिया सरकार द्वारा इस दिन कानून और न्याय की हत्या कर, सजा के एक दिन पूर्व ही 23 मार्च को निर्दोष भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर चढ़ा दिया था।

अति तो तब हुई जब सरकार ने इन महारथियों के शवों को काटकर उनके टुकड़ों को सतलज नदी के किनारे हुसैनीवाला में चुपके से फेंक कर जला दिया और हैवानियत तथा क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं । अतः यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का काला दिन और प्रथम न्यायिक हत्या थी।औपनिवेशिक न्याय प्रणाली का एक काला अध्याय है।

एफआईआर में नहीं था नाम

सब कुछ पूर्व निर्धारित था, जिस सांडर्स मर्डर केस (सन् 1928) में फांसी हुई, उसकी मूल एफ.आई.आर.में भगत सिंह, सुखदेव या राजगुरु का नाम नहीं था, उसमें केवल दो अज्ञात लोगों का उल्लेख था। विचारण भी गैर-कानूनी था, क्योंकि एक विशेष ट्रिब्यूनल के माध्यम से मुकदमा चलाया गया था, यह भी वैधानिक नहीं था। यह ट्रिब्यूनल निष्पक्ष नहीं था, जिसने बचाव पक्ष को साक्ष्य पेश करने का उचित मौका नहीं दिया। दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह था कि ट्रिब्यूनल के विरुद्ध अपील भी नहीं सकती थी। यह सजा नहीं साजिश थी जब निर्दोष स्वातंत्र्य वीरों को फांसी पर एक दिन पहले लटका दिया गया।

श्रद्धांजलि के लिए हूटर भी नहीं बजता

दुखद यह है कि पहली न्यायिक हत्या और बलिदान के दिन श्रद्धांजलि के लिए हूटर भी नहीं बजता? कांग्रेस अंग्रेजों के साथ खड़ी थी। गांधी जी, स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे अब्दुल रशीद का केस लड़ने को तैयार थे और उसका समर्थन भी किया था, परंतु उन्होंने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के मामले में चुप्पी सी साध ली, आखिर क्यों?

स्वतंत्रता संग्राम को विद्रोह कहा गया

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास लेखन का सबसे दुखद पहलू यह रहा कि बरतानिया सरकार के विरुद्ध जितने भी सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम हुए,उनको विद्रोह, गदर, लूट, डकैती और आतंकवाद की संज्ञा दे दी गई और सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर शासन में सहभागिता कर रही कांग्रेस ने भी तथाकथित स्वाधीनता संग्राम लड़ते हुए यही विचार रखा। क्रांतिकारियों ने ही सर्वप्रथम स्वतंत्रता मांग की थी, जबकि कांग्रेस और उनके समर्थक अंत तक डोमिनियन स्टेट्स की मांग करते रहे।

कांग्रेस को महापुरुषों ने क्या संज्ञा दी

कांग्रेस ने बरतानिया सरकार के कंधे से कन्धा मिलाकर शासन करते हुए ऐसा विचित्र स्वतंत्रता संग्राम लड़ा कि एक भी बड़े नेता को न फांसी दी गई, और न ही काला पानी की सजा हुई, फिर स्वाधीनता का पूरा श्रेय कांग्रेस ने लूट लिया। बंकिम चंद्र चटर्जी ने इनकी पद लोलुपता को देखते हुए इन्हें “पदों के भूखे राजनीतिज्ञों ” की संज्ञा दी थी। लोकमान्य तिलक ने कांग्रेस को “चापलूसों का सम्मेलन” और कांग्रेस के अधिवेशनों को “छुट्टियों का मनोरंजन ” बतलाया था। वही लाला लाजपत राय ने कांग्रेस के सम्मेलनों को ” शिक्षित भारतीयों के वार्षिक राष्ट्रीय मेले” की संज्ञा दी थी।

वामपंथियों की निर्लज्जता

वामपंथियों ने तो हद कर दी। द्वितीय विश्व युद्ध के आरम्भ होते ही पाला बदल लिया और इंग्लैंड के पक्ष में भारत छोड़ो आंदोलन का घनघोर विरोध किया।सत्ता के भूखे ऐसे लोग क्रांतिकारियों को अंग्रेजों के साथ और वामपंथियों के सहयोग से आतंकवादी कहते रहे। क्रांतिकारियों को कभी लुटेरा, कभी पागल और कभी डकैत तक कहा गया।

हेडगेवार जी के साथ भी यही किया

कांग्रेस, तथाकथित सेक्युलरों और वामियों ने ठीक उपर्युक्त प्रकार की रणनीति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरुद्ध अपनाई। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आद्य सरसंघचालक केशव राव बलिराम हेडगेवार का योगदान सर्वविदित और अविस्मरणीय है और उनके निर्देश पर स्वाधीनता संग्राम में हजारों स्वयंसेवकों ने प्रत्यक्ष और परोक्ष रुप में आहुतियां दीं, परन्तु अत्यंत दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह रहा कि उसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कांग्रेस पोषित इतिहासकारों ने रेखांकित ही नहीं किया। हद तो तब हो गई जब 30 जनवरी सन् 1948 को महात्मा गांधी की हत्या का ठीकरा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर फोड़कर उसे प्रतिबंधित कर छवि धूमिल करने का दुष्कृत्य किया।

यह ठीक उसी प्रकार हुआ, जिस प्रकार बरतानिया सरकार के विरुद्ध जितने भी सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम हुए, उनको विद्रोह, गदर, लूट, डकैती और आतंकवाद की संज्ञा दे दी गई और बरतानिया सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर शासन में सहभागिता कर रही कांग्रेस ने भी तथाकथित स्वाधीनता संग्राम लड़ते हुए यही विचार रखा।

स्वाधीनता के बाद भी न्याय नहीं

स्वाधीनता के उपरांत भी न्याय नहीं हुआ। कांग्रेस सरकार में लगातार 11 वर्ष मौलाना अब्दुल कलाम आजाद भारत के शिक्षा मंत्री रहे और उन पर भी इतिहास के पन्नों को विषाक्त करने का आरोप लगा। यही नहीं,रही सही कसर,कांग्रेस ने राज्य सभा से नुरुल हसन को प्रविष्ट कराकर सन् 1971 से सन् 1977 तक भारत का शिक्षा मंत्री बनाकर पूरी की।

कांग्रेस ने वामपंथियों और तथाकथित सेक्यूलर इतिहासकारों की जमात भारत के सभी विश्वविद्यालय और महाविद्यालय में बैठा दी गई फलस्वरूप इन्होंने भी बरतानिया सरकार और कांग्रेस के इतिहास को बुलंद करते हुए, सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के इतिहास को क्षत – विक्षत किया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास को विलोपित ही कर दिया।

राजगुरु के स्वंयसेवक होने पर कांग्रेसियों को दर्द

इसलिए जब भी स्वाधीनता संग्राम में संघ के योगदान को रेखांकित किया जाता है, तो कांग्रेस सहित सभी हिंदू विरोधी खेमे एकत्र होकर हंगामा खड़ा करने लग जाते हैं। अब देखिए न, क्रांतिकारियों को आतंकवादी, पागल, लुटेरा बताने वाले कांग्रेसियों और वामियों को महान् क्रांतिकारी राजगुरु के स्वयंसेवक होने पर इतना दर्द क्यों होना चाहिए? क्यों हो रहा है?कहीं ऐंसा तो नहीं कि राष्ट्र निर्माण और स्वतंत्रता संग्राम में संघ के योगदान को रेखांकित करने से कांग्रेस और वामियों के पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाएगी? ये तो समय ही बताएगा, परन्तु महारथी राजगुरु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कर्मठ स्वयंसेवक थे, इस बात के संदर्भ और पुख्ता साक्ष्य उपलब्ध हैं,अपनों और विघ्न संतोषियों के लिए भी प्रस्तुत करना आवश्यक है।

मंत्रालय ने प्रकाशित की किताब

अब जब से भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी ने संघ शताब्दी वर्ष में स्वाधीनता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अवदान को रेखांकित किया है, तब से कांग्रेस और उनके समर्थकों को ज्यादा समस्या हो गई है। कांग्रेस और उनके समर्थकों का वश चलता तो वो ये भी कह देते कि डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने स्वाधीनता संग्राम में भाग ही नहीं लिया और न ही कभी राजगुरु से उनकी मुलाकात हुई! भला हो अनिल वर्मा जी का जिन्होंने अपनी पुस्तक, “अजेय क्रांतिकारी राजगुरु “में पृष्ठ क्रमांक 29 में डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार और महारथी राजगुरु का अमरावती में मिलने का वृतांत लिखा है और ये पुस्तक अगस्त सन् 2008 में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में सूचना प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार ने प्रकाशित की है।

राजगुरु के दो कोड नाम थे 

आइये प्रारम्भ, राजगुरु की वीरोचित गाथा से करते हैं। 17 दिसंबर 1928 को राजगुरु ने, पंजाब केसरी लाला लाजपत राय के हत्यारे, जे. पी. सांडर्स पर पहला फायर खोल दिया। उसके उपरांत सरदार भगत सिंह और महारथी सुखदेव ने सांडर्स का वध कर दिया।

शिवराम हरि राजगुरु के 2 कोड नाम क्रमशः रघुनाथ और एम याने महाराष्ट्र थे। शिवराम हरि राजगुरु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महान् क्रान्तिकारी थे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में राजगुरु का बलिदान एक महत्वपूर्ण घटना थी। शिवराम हरि राजगुरु का जन्म 24 अगस्त, सन् 1908 में पुणे जिला के खेड़ा गाँव (अब राजगुरु नगर) में हुआ था।6 वर्ष की आयु में पिता का निधन हो जाने से बहुत छोटी उम्र में ही ये वाराणसी विद्याध्ययन करने एवं संस्कृत सीखने आ गये थे। इन्होंने हिन्दू धर्म-ग्रंन्थों तथा वेदों का अध्ययन तो किया ही लघु सिद्धान्त कौमुदी जैसा क्लिष्ट ग्रन्थ बहुत कम आयु में कण्ठस्थ कर लिया था। इन्हें कसरत (व्यायाम) का बेहद शौक था और छत्रपति शिवाजी की छापामार युद्ध-शैली के बड़े प्रशंसक थे। वाराणसी में विद्याध्ययन करते हुए राजगुरु का सम्पर्क अनेक क्रान्तिकारियों से हुआ।

चन्द्रशेखऱ आजाद से प्रभावित

चन्द्रशेखर आजाद से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से तत्काल जुड़ गये। आजाद की पार्टी के अन्दर इन्हें रघुनाथ के छद्म-नाम से जाना जाता था; राजगुरु के नाम से नहीं चन्द्रशेखर आज़ाद,सरदार भगत सिंह और यतीन्द्रनाथ दास आदि क्रान्तिकारी इनके अभिन्न मित्र थे। राजगुरु, हिदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में सबसे बेहतरीन निशानेबाज माने जाते थे।

सांडर्स का वध

सांडर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव का पूरा साथ दिया था जबकि चन्द्रशेखर आज़ाद ने छाया की भाँति इन तीनों को सामरिक सुरक्षा प्रदान की थी। 23 मार्च सन् 1931 को इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेण्ट्रल जेल में फांसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को भारत के अमर बलिदानियों में प्रमुखता से दर्ज करा दिया।

नरेंद्र सहगल जी की पुस्तक

गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रचारक एवं पत्रकार नरेंद्र सहगल जी ने प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर ‘भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता’ पुस्तक लिखी है, जिसके अनुसार, ‘सरदार भगत सिंह और राजगुरु ने अंग्रेज अफसर सांडर्स को लाहौर की माल रोड पर गोलियों से उड़ा दिया। फिर दोनों लाहौर से निकल गए। राजगुरु नागपुर आकर डॉ. हेडगेवार से मिले। राजगुरु संघ के स्वयंसेवक थे’।

नरेंद्र सहगल की पुस्तक में प्रमाणित किया गया है कि राजगुरु संघ की मोहिते के बाड़े की शाखा के स्वयंसेवक थे। सहगल की लिखी पुस्तक के अनुसार नागपुर के भोंसले वेदशाला के छात्र रहते हुए राजगुरु, संघ संस्थापक हेडगेवार के बेहद करीबी रहे। पुस्तक में यह भी दावा किया गया है कि सुभाष चंद्र बोस भी संघ से काफी प्रभावित थे। भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता’ की भूमिका सर संघ चालक मोहन भागवत जी ने लिखी है।

राजगुरु और डॉ हेडगेवार की मुलाकात

यह इसलिए भी प्रमाणित है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आद्य संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार, कलकत्ता में अपने अध्ययन कल से ही क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति के अंतरंग समिति के सदस्य थे, और विभिन्न क्रांतिकारी संगठनों के क्रान्तिकारी ,बरतानिया सरकार की पकड़ से दूर रहकर गुप्त प्रवास हेतु बुंदेलखंड,महाकौशल और नागपुर आते थे। नागपुर उस समय मध्य प्रांत और बरार की राजधानी था, तथा भौगोलिक दृष्टि से गुप्त प्रवास के लिए अत्यंत सुरक्षित था और डॉ. हेडगेवार ने भी नागपुर आकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कर ली थी, इसलिए क्रांतिकारियों का बरतानिया सरकार की पकड़ से दूर रहने के लिए,डॉ. हेडगेवार के पास गुप्त प्रवास पर आना स्वाभाविक था, साथ ही शाखाओं में स्वयंसेवक के रुप भाग लेना, गुप्त प्रवास का ही एक हिस्सा रहा होगा।महारथी राजगुरु निश्चित ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे और इसलिए उन्होंने संघ में प्रचलित काली टोपी सदैव धारण की।

मनमोहन सिंह के समय छपी किताब

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में अगस्त 2008 को अनिल वर्मा की पुस्तक “अजेय क्रांतिकारी राजगुरु” प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार द्वारा प्रकाशित की गई, जिसमें डॉ. हेडगेवार और राजगुरु के मिलन के संबंध में प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक के पृष्ठ क्रमांक 28 में अनिल वर्मा लिखते हैं कि ” राजगुरु बनारस से अमरावती पहुंचे। उन्होंने अमरावती जाकर हनुमान प्रसारक मंडल की ग्रीष्मकालीन शिविर में प्रशिक्षण हेतु अपना नाम दर्ज करवा लिया। पृष्ठ क्रमांक 29 में लिखते हैं कि ” यहां राजगुरु ने युवकों से चर्चा करते हुए अंग्रेजों को देश के बाहर निकालने एवं मातृभूमि को स्वतंत्र कराने की इच्छा जाहिर की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) के संस्थापक सरकार्यवाहक डॉ.केशव बलिराम हेडगेवार इस शिविर में पधारे,एक वर्ष पूर्व ही उन्होंने सन् 1925 में इस संगठन की नींव रखी थी। फिर राजगुरु करीब एक वर्ष तक अमरावती में सामाजिक एवं देशभक्ति से संबंधित कार्यों में संलग्न रहे।”

पुस्तक के हवाले से स्पष्ट है कि सन् 1926 में ही डॉ. हेडगेवार और महारथी राजगुरु की अमरावती में भेंट हो गई थी और लेखक महोदय ने एक वर्ष तक साथ कार्य करने का संकेत भी दिया है। इन बातों से स्पष्ट है कि महारथी राजगुरु का संघ से गहरा नाता था।

सांडर्स वध के बाद अमरावती गए राजगुरु

यह भी गौरतलब है कि सांडर्स के वध के उपरांत राजगुरु अमरावती आ गए। यहाँ से अकोला गए और राजराजेश्वर मंदिर के समीप एक किराए के घर में रहने लगे, जिसका इंतजाम बापू साहब सहस्त्रबुद्धे ने किया था। इसी दौरान, 1929 में जब राजगुरु नागपुर में थे, तब उनकी मुलाकात पुनः डॉ. हेडगेवार से हुई। सरसंघचालक ने उन्हें सलाह दी कि वे पुणे न जाएं। ब्रिटिश सरकार से बचाने के लिए उन्होंने राजगुरु के रहने की व्यवस्था भैयाजी दाणी के उमरेड स्थित एक स्थान पर कर दी थी। हालांकि, राजगुरु ने इस सलाह को नहीं माना और पुणे चले गए, जहां 30 सितंबर 1929 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।सन्दर्भ के लिए देखें पुस्‍तक- द फाउंडर ऑफ आर. एस. एस. : डॉ. हेडगेवार (ची. प. भिशीकर, केशव संघ निर्माता, सुरुचि प्रकाशन: नई दिल्ली, 1979, पृष्ठ 70)

नागपुर में हेडगेवार जी से दोबारा मुलाकात

डॉ. हेडगेवार से राजगुरु के दोबारा नागपुर में मिलने की पुष्टि अनिल वर्मा ने अपनी पुस्तक ‘अजेय क्रन्तिकारी राजगुरु’ के पृष्ठ क्रमांक 106 में की। लिखा कि ” राजगुरु ने फरारी के इस दौर में नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यकर्ता के यहां शरण ली थी और आर.एस.एस. के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार से भी मुलाकात की थी।”

उपरोक्त साक्ष्यों के आलोक में यह प्रमाणित हो जाता है कि महान् क्रांतिकारी राजगुरु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भारत के स्वाधीनता संग्राम में अविस्मरणीय योगदान रहा है, परन्तु संघ की रीति-नीति अपने को रेखांकित कर ढिंढोरा पीटने की नहीं रही है।

Topics: भगत सिंहराजगुरुसुखदेवसांडर्स वधनरेंद्र सहगलराजगुरु स्वयंसेवकअनिल वर्मान्यायिक हत्या23 मार्च 1931डॉ. हेडगेवारआरएसएस
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
ShareTweetSendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

RSS के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी

श्रीगुरुजी तत्वलीन विभूति : पंडित दीनदयाल उपाध्याय

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री दत्तात्रेय होसबाले

‘अविनाशी और शाश्वत होते हैं मंत्र’

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री सुनील आंबेकर

‘1947 में संघ होता मजबूत तो न बंटता देश’

Rahul Gandhi traitor remarks FIR

PM मोदी को देशद्रोही कह फंसे राहुल गांधी, बीजेपी युवा मोर्चा ने की पुलिस में शिकायत

दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन करते श्री नरेंद्र ठाकुर और अन्य वरिष्ठ कार्यकर्ता

‘संघ का उद्देश्य है भारत को सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र बनाना’

नाटक का मंचन करते कलाकार

‘संघ गंगा के तीन भगीरथ’ नाटक का मंचन

Load More

ताज़ा समाचार

RSS Sangh Shiksha Varg Vrindavan Concludes Kshetra Pracharak Mahendra

‘संघ को समझना है तो शाखा में आना ही पड़ेगा’: वृंदावन में संघ शिक्षा वर्ग का समापन, महेंद्र जी ने बताया शाखा का महत्व

Sanatan Dharma Controversy Udayanidhi Stalin Akhilesh Yadav Rahul Gandhi Analysis

निंदनीय है सनातन धर्म का विरोध! उदयनिधि स्टालिन से लेकर राहुल गांधी के बयानों का अकाट्य प्रमाणों से खंडन

Bhopal ATS Action Suspect Mohammad Faraz Arrested UAPA MP Police

Bhopal ATS Action: कंपाउंडर मोहम्मद फराज गिरफ्तार, आतंकी साहित्य बरामद, अफगानिस्तान जाने की थी तैयारी!

G7 Summit in France President Emmanuel Macron and PM Narendra Modi

G7 शिखर सम्मेलन: फ्रांस में PM मोदी पर होंगी सबकी नजरें, राष्ट्रपति मैक्रों ने भारत को क्यों बताया ‘टॉप प्रायोरिटी’?

Har Har Mahadev in AMU Kennedy Auditorium Minister Dinesh Pratap Singh Video

AMU में गूंजे ‘हर हर महादेव’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे, मंत्री दिनेश सिंह ने शेयर किया वीडियो

भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा के साथ वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यकर्ता

‘प्रेरणा का अक्षय स्रोत हैं बिरसा मुंडा’

Kolanupaka Someswara Temple Mural Paintings Telangana KTCB

सनातन संस्कृति का जीवंत प्रमाण: तेलंगाना में मिले 16वीं सदी के सनातनी भित्तिचित्र, सोमेश्वर मंदिर में खुला रहस्य!

RSS Almora Meritorious Students Award Function Indian Knowledge System Book Launch

अल्मोड़ा: संघ के कार्यक्रम में 60 मेधावी छात्र हुए सम्मानित, ‘भारतीय ज्ञान परम्परा’ पुस्तक का भी हुआ विमोचन!

CM Pushkar Singh Dhami Media Briefing Dehradun BJP Office PM Modi

उत्तराखंड: सीएम धामी बोले- देश अब नारों पर नहीं, काम पर देता है वोट

PM मोदी के 12 वर्ष: रणनीतिक शासन से कैसे बदला देश का रक्षा बजट? परमाणु ब्लैकमेलिंग खत्म कर बनाई भारत की नई सैन्य पहचान!

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies