भगत सिंह की पुण्यतिथि : नाैजवानों के नायक
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भगत सिंह की पुण्यतिथि : नाैजवानों के नायक

भगत सिंह ने 8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंककर अंग्रेजों को खुली चुनौती दी थी। अंग्रेजों ने 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह के साथ राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर लटका दिया। इन तीनों के बलिदान ने अंग्रेजों को और मुश्किल में डाल दिया। युवा 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े

Written byप्रो. हरमहेन्द्र सिंह बेदीप्रो. हरमहेन्द्र सिंह बेदी
Mar 23, 2026, 10:22 am IST
in भारत, विश्लेषण, श्रद्धांजलि, पंजाब

मात्र 23 वर्ष की आयु में भगत सिंह ने अपना बलिदान दिया था। वे कहा करते थे, “युवा देश की स्वतंत्रता के लिए आधारभूत चिंतन के साथ जुड़ कर मुक्ति की राह खुद ढूंढे।” क्या आज युवा इस आह्वान को अपना जीवन आदर्श बना रहे हैं? या इससे दूर भाग रहे हैं?

बहुत कुछ बदल गया है। युवकों का चिंतन अब नई चुनौतियों का सामना करने के लिए भगत सिंह की सोच को न केवल अपना रहा है, बल्कि उनकी मूल संवेदना को जिंदगी के सच्चे अर्थों के साथ जोड़ भी रहा है। भगत सिंह कहते थे, “खेतों में बंदूकें बीज दो, ताकि ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को काटा जा सके।” भगत सिंह की इस सोच ने क्रांतिकारी चिंतन धारा को ऐसी दिशा दी कि वह जवान होकर देश की स्वतंत्रता के लिए कटिबद्ध होकर सर्वस्व न्योछावर करने के लिए अपनी चेतना के साथ उन रास्तों पर चल पड़ा जिसकी मंजिल आजादी थी।

आर्य समाज का प्रभाव

भगत सिंह ने बहुत कुछ भारतीय संस्कृति और भारतीय वांग्मय से ग्रहण किया तथा इस ज्ञान का उपयोग उन्होंने अपने रास्तों को रोशन करने के लिए और वैचारिकता को प्रखर बनाने के लिए भी किया। भगत सिंह का परिवार आर्य समाज से प्रभावित था। भगत सिंह के पिता को स्वामी दयानंद ने आर्य समाज से जोड़ा था। आर्य समाज की विचारधारा का भगत सिंह पर गहरा प्रभाव रहा। इस प्रभाव के अधीन भगत सिंह ने आध्यात्मिक ऊंचाइयों की दार्शनिकता को भी बारीकी से समझा। गायत्री मंत्र का पाठ भी बचपन में भगत सिंह की दिनचर्या का हिस्सा था। बात यहीं समाप्त नहीं होती।

भारतीय भाषाओं के प्रति भगत सिंह के मन में अथाह प्रेम था। भगत सिंह को अनेक हिंदी और पंजाबी की कविताएं कंठस्थ थीं। भारतेंदु के नाटक ‘भारत दुर्दशा’ में भी भगत सिंह ने अभिनय किया था। स्कूली शिक्षा के दौरान भगत सिंह ने संस्कृत में भी दक्षता हासिल की थी। अपने दादा को लिखे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था, “आज मैं बहुत खुश हूं। सबसे ज्यादा अंक मुझे संस्कृत के पत्र में प्राप्त हुए हैं।” भारतीय साहित्य की अच्छी जानकारी भगत सिंह को थी।

साहित्य में रुचि

जेल के दौरान भगत सिंह ने अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया। हिंदी, अंग्रेजी और पंजाबी की कालजयी रचनाओं को पढ़ कर अपने विचारों को दृढ़ भी किया और ज्ञान-पिपासा को शांत भी किया। भगत सिंह हिंदी के बहुत बड़े निबंधकार थे। राष्ट्रभाषा हिंदी एवं मातृभाषा पंजाबी के ऊपर भगत सिंह ने बहुत ही तथ्यपरक आलेख लिखे, जिनकी चर्चा आज भी साहित्यिक हलकों में होती है।

सतगुरु राम सिंह के ऊपर पहला विस्तृत आलेख भी भगत सिंह ने हिंदी भाषा में लिख कर कूका (नामधारी) आंदोलन की भूरी-भूरी प्रशंसा की। लाला लाजपतराय के द्वारा संपादित ‘वंदे मातरम्’पत्रिका में प्रकाशित एक-एक आलेख को केवल पढ़ा ही नहीं, बल्कि उसकी वैचारिकता पर भी चिंतन-मनन किया। भगत सिंह दुनिया में हो रहे उन प्रयासों को भी हमेशा आदर की दृष्टि से देखते थे, जिनका सीधा संबंध स्वतंत्रता और मानवीय सरोकारों की प्रासंगिकता के साथ जुड़ता था। वे मार्क्सवादी चिंतन से भी प्रभावित थे और इस चिंतन की मूल संवेदना को भी परख कर सही निष्कर्षों तक पहुंचते थे। ब्रिटिश साम्राज्य को खोखला करने के लिए वे लगातार राजगुरु, सुखदेव और चंद्रशेखर से मिल कर नई-नई योजनाओं का निर्माण करते थे।

युवा शक्ति का केंद्र

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का सुनहरा अध्याय भी भगत सिंह की वैचारिकता से जुड़ता है। भगत सिंह के चिंतन ने राष्ट्रीय अखंडता एवं ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति का जो रास्ता सुझाया उसी रास्ते पर स्वतंत्रता संग्राम को गहराई वाली शक्ति मिली। संपूर्ण भारत में एकता का बिगुल भी बजा और युवा शक्ति की मानसिकता में राष्ट्रभक्ति का भाव भी उत्पन्न हुआ। देश की आजादी के लिए जितने प्रयास अलग-अलग कोनों से हो रहे थे, उनका केंद्र ‘इंकलाब जिंदाबाद’ की संवेदना से जुड़ गया। युवा इस क्रांतिकारी नारे के माध्यम से अपने विचारों की अभिव्यक्ति करने लगे।

भगत सिंह की सोच ने इस संघर्षगाथा को केवल आगे ही नहीं बढ़ाया, बल्कि इसकी सांस्कृतिक पहचान में भी नए बिंदुओं को जोड़ा। पत्रकारिता की दिशा भी बदल गई। अंग्रेजी और पंजाबी, हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में युवा लेखकों ने खुलकर स्वतंत्रता के विचार को अपने लेखन का आधार बनाया। भगत सिंह के बलिदान ने युवकों में सोई स्वतंत्रता की इच्छा को साकार भी किया तथा वैश्विक चेतना में उसको रूपांतरित किया। एशिया के चिंतकों ने भारतीय क्रांति के प्रयासों को सराहा। पंजाबी साहित्य में इस चेतना का सैद्धांतिक स्वरूप भी देखा जा सकता है। पंजाबी साहित्य में क्रांतिकारियों की जीवनियां एवं इनके संघर्षों को लेकर कविताएं, कहानियां, उपन्यास और निबंध लिखे जाने लगे। पंजाबी साहित्य की संवेदना ही बदल गई। यह प्रभाव भगत सिंह की सोच का था। इसी सोच ने स्वतंत्रता आंदोलन में नई जान फूंक दी।

भगत सिंह अपने समय में ही युवा शक्ति का केंद्र बन गए। उनके द्वारा लिखे गए साहित्य को नवयुवकों ने केवल अध्ययन की सामग्री ही नहीं समझा, बल्कि उन्हें अपने भावी जीवन की सही दिशा में भी स्वीकार किया। यही कारण है कि उस समय युवाओं में यह बात प्रमुख स्वर के रूप में गूंजने लगी कि यही सही समय है जब गुलामी की जंजीरों को तोड़ा जा सकता है।

दार्शनिक एवं राजनीतिज्ञ

दूसरी बात भी हमारा ध्यान आकर्षित करती है कि भगत सिंह ने ­भारतीय चिंतन के उन संदर्भों का नवीकरण भी अपने लेखों में किया। स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम प्रयास 1857 की क्रांति पर गंभीरता पूर्वक विचार भी किया और उसकी मूल भावना को जन साधारण तक पहुंचाने के लिए प्रयास भी किए। भगत सिंह के लेखन में इन संदर्भों को देखा जा सकता है। इसीलिए भगत सिंह युवा शक्ति के प्रेरणास्रोत थे। आज भगत सिंह को अपनी स्मृति का हिस्सा बनाने का अर्थ है भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन पहलुओं को समझना जिनके कारण 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त हुई। शहीद ए आजम भगत सिंह बहुत बड़े दार्शनिक एवं राजनीतिज्ञ भी थे। वे भारत को दुनिया की अर्थव्यवस्था में भी आगे ले जाना चाहते थे, ताकि मानव कल्याण का रास्ता प्रशस्त हो सके। वे सच्चे अर्थों में जननायक थे। आज भी भगत सिंह के चिंतन, विचार और दर्शन की प्रासंगिकता बनी हुई है। भगत सिंह के सपनों का भारत 21वीं शताब्दी में विश्व के मानचित्र पर अपनी पहचान बनाएगा। इस पहचान में युवा शक्ति उपस्थित रहेगी।

आज की राजनीतिक और सामाजिक वैचारिकता को पारदर्शी ढंग से समझने के लिए युवा पीढ़ी को भगत सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व से प्रेरणा लेकर उन रास्तों को प्रशस्त करना पड़ेगा जो सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संकल्पों को सिद्ध करने में समर्थ हो। युवा पीढ़ी के आदर्श आज भी भगत सिंह हैं और भविष्य में भगत सिंह की छवि भारतीय युवा मन को उत्साहित भी करेगी और राष्ट्रीयता के नए आयामों को समझने में मददगार भी बनेगी। इसीलिए हमें लगता है कि भगत सिंह की स्मृति से जुड़ी युवा शक्ति नए भारत के संकल्पों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में समर्थ बनेगी, यही भगत सिंह का अवदान होगा।

Topics: राष्ट्रभक्तिभगत सिंह की फांसी1857 की क्रांतिकूका आंदोलनलाला लाजपत रायइंकलाब जिंदाबादराष्ट्रीय अखंडताक्रांतिकारी चिंतनचंद्रशेखर आजादमार्क्सवादी विचारधारापाञ्चजन्य विशेषस्वामी दयानंदराजगुरु और सुखदेवशहीद-ए-आजम भगत सिंहसेंट्रल असेंबली बम कांड
प्रो. हरमहेन्द्र सिंह बेदी
प्रो. हरमहेन्द्र सिंह बेदी
कुलाधिपति, केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश, धर्मशाला [Read more]
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