जम्मू विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम (सिलेबस) को लेकर उपजा विवाद अब एक बड़े वैचारिक युद्ध में बदलता दिखाई दे रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत राजनीति विज्ञान के सिलेबस में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना को शामिल किए जाने पर छात्र संगठनों और स्थानीय लोगों ने कड़ा ऐतराज जताया है।
दरअसल, जम्मू विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान (पॉलिटिकल साइंस) विभाग ने अपने नए सिलेबस ‘मॉडर्न इंडियन पॉलिटिकल थॉट’ (आधुनिक भारतीय राजनीतिक विचार) में मोहम्मद अली जिन्ना से संबंधित एक अध्याय शामिल किया है। विवाद की मुख्य वजह यह है कि जिन्ना को महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और डॉ. बी.आर. आंबेडकर जैसे महान राष्ट्रनायकों की श्रेणी में रखकर पढ़ाया जा रहा है।
विरोध कर रहे छात्रों और संगठनों का तर्क है कि जिस व्यक्ति ने धर्म के आधार पर देश के टुकड़े किए और लाखों लोगों के विस्थापन व हिंसा का कारण बना, उसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महापुरुषों के समकक्ष स्थान देना देश की भावनाओं का अपमान है। छात्रों का कहना है कि जिन्ना जैसे विवादित व्यक्तित्व को पाठ्यक्रम में जगह देने से नई पीढ़ी के मन में इतिहास को लेकर भ्रम पैदा होगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह स्वतंत्रता संग्राम के मूल मूल्यों को कमजोर करने की कोशिश है।
ABVP की चेतावनी
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) इस फैसले के खिलाफ सबसे मुखर होकर सामने आई है। परिषद के राज्य मंत्री सनक श्रीवत्स ने विश्वविद्यालय प्रशासन को स्पष्ट चेतावनी दी है कि वो जिन्ना के किसी भी प्रकार के ‘महिमामंडन’ को बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने विश्विद्यालय प्रशासन से जिन्ना से जुड़े अध्याय को तुरंत पाठ्यक्रम से हटाने की मांग की है। एबीवीपी का आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन अनजाने में या जानबूझकर विभाजनकारी विचारधारा को बढ़ावा दे रहा है।
छात्र संगठन ने कहा कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन ने जल्द ही अपना निर्णय वापस नहीं लिया, तो पूरे जम्मू-कश्मीर में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन और आंदोलन शुरू किया जाएगा।
विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष
दूसरी ओर, जम्मू विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपना बचाव करते हुए कहा है कि किसी भी विषय या व्यक्ति को पाठ्यक्रम में शामिल करने का अर्थ उसका समर्थन करना नहीं होता। प्रशासन के अनुसार, राजनीति विज्ञान के छात्र के लिए विभाजन के इतिहास और उससे जुड़ी विचारधाराओं को समझना एक अकादमिक आवश्यकता है। राजनीति शास्त्र विभाग के प्रमुख बलजीत सिंह मान ने तर्क देते हुए बताया कि जिन्ना और अन्य विचारकों का उल्लेख पूरी तरह अकादमिक है।
इसे भी पढ़ें: राजस्थान: मस्जिद में मौलवी ने टॉयलेट में मजदूर को जिंदा जला दिया, दर्दनाक मौत
यह देशभर के दूसरे विश्वविद्यालयों में अपनाए जाने वाले पाठ्यक्रम और यूजीसी के मानदंडों के अनुरूप है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर वह पाठयक्रम को बदलते या हटाते हैं तो इससे छात्रों को नुकसान हो सकता है। हालांकि, यह स्पष्टीकरण छात्रों को संतुष्ट करने में विफल रहा है। छात्रों ने जिन्ना के पोस्टर फाड़ते हुए चेतावनी दी कि अगर अध्याय नहीं हटाया गया तो विरोध प्रदर्शन तेज होगा।
छात्र हो सकते हैं भ्रमित
विरोध कर रहे छात्रों का तर्क है कि यह प्रदर्शन केवल एक अध्याय को लेकर नहीं बल्कि राष्ट्रीय पहचान और इतिहास को गलत तरीके से पेश करने को लेकर है। उनका कहना है कि ‘मॉर्डन पालिटकल थॉट’ में ऐसे लोगों को शामिल किया जाना चाहिए जिन्होंने देश के निर्माण में जी-जान लगा दी। ऐसे लोगों की यहां कोई जगह नहीं होने चाहिए जिसने देश का बंटवारा कर दो भागों में बांटने का काम किया। इससे छात्रों में गलत संदेश जाएगा। वह इतिहास को लेकर भ्रमित हो सकते हैं।
यह विवाद जल्द नहीं सुलझा तो आने वाले समय में इसका असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ेगा। साल के अंत में विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की परीक्षाएं होनी तय हैं। इस विरोध के कारण न केवल छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, बल्कि परिसर का माहौल भी तनावपूर्ण हो गया है।

















