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USCIRF: हमको तुम जैसे पंच की जरूरत नहीं !

भारत आज एक उभरती आर्थिक शक्ति है, एक सशक्त लोकतंत्र है और एक स्वतंत्र आवाज है। जब कोई राष्ट्र इस स्तर पर पहुंचता है, तो उसके विरुद्ध आरोप भी पकाए जाते हैं। किंतु जब ये आरोप तथ्यों से टकराते हैं, तो सत्य स्वयं सामने आ जाता है।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Mar 21, 2026, 01:20 pm IST
in सम्पादकीय

अमेरिका जो स्वयं को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है, जो वैश्विक मंचों पर मानवाधिकार और आस्थागत स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाता है, लेकिन जब बात अपने घर की आती है, तो वही देश नफरत, हिंसा और पहचान आधारित हमलों को रोक पाने में असमर्थ दिखाई देता है। फिर भी वह बाहर बैठकर भारत जैसे देशों का मूल्यांकन करता है, उन्हें कसौटियों पर कसता है, प्रमाणपत्र बांटने की भूमिका निभाता है। यह विरोधाभास केवल एक सामान्य विसंगति नहीं, बल्कि एक गहरी संरचनात्मक प्रवृत्ति का संकेत है। यही संदर्भ है उस रिपोर्ट का, जिसे यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम द्वारा जारी किया गया है। जिसमें एक बार फिर भारत को “विशेष चिंता का देश” घोषित करने की सिफारिश की गई है।

प्रश्न यह नहीं है कि आलोचना क्यों हो रही है। प्रश्न यह है कि क्या यह आलोचना निष्पक्ष है ? या फिर यह एक भू-राजनीतिक औजार बन चुकी है? 2020 से 2026 तक लगातार भारत को निशाने पर रखना क्या महज संयोग है, या इसके पीछे कोई व्यवस्थित सोच काम कर रही है ? इसमें भी सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है क्या इस रिपोर्ट को तैयार करने वाला देश स्वयं इस विषय में निर्दोष है?

हर वर्ष जारी होने वाली यह रिपोर्ट दुनिया के देशों को आस्थागत स्वतंत्रता के आधार पर वर्गीकृत करती है। किंतु 2026 की रिपोर्ट ने केवल भारत पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाए, बल्कि अपनी ही विश्वसनीयता और मंशा को भी संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है। इस बार भारत को “कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न” यानी CPC में डालने की अनुशंसा के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारत की जांच एजेंसी पर टिप्पणी करना सामान्य आलोचना से आगे जाकर संप्रभुता को चुनौती देने जैसा प्रतीत होता है।

निश्चित ही ऐसे में भारत सरकार की प्रतिक्रिया तीखी ही रहनी थी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट शब्दों में इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि यह भारत की विकृत और चयनित तस्वीर प्रस्तुत करती है। यह उत्तर केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि तथ्यात्मक आधार पर भी उचित प्रतीत होता है। एक ओर रॉ जैसी संवेदनशील सरकारी खुफिया एजेंसी है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी है, और दूसरी ओर रा.स्व.संघ एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है। इन दोनों को एक ही स्तर पर रखकर टिप्पणी करना या तो विषय तथा संगठनों की संरचना की समझ के अभाव को दर्शाता है। या फिर जानबूझकर धूर्ततापूर्वक रचा गया जाल प्रतीत होता है।

संघ को इस रिपोर्ट में जिस प्रकार प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है, वह न केवल सतही है, बल्कि एक गहरे पूर्वाग्रह से भी ग्रसित प्रतीत होता है। किसी भी संगठन का मूल्यांकन उसके दीर्घकालिक कार्य, सामाजिक योगदान और वैचारिक आधार के संदर्भ में किया जाना चाहिए, न कि चयनित आरोपों और सीमित स्रोतों के आधार पर। रा. स्व. संघ की स्थापना 1925 में इस उद्देश्य से हुई थी कि भारतीय समाज को संगठित, सशक्त और आत्मविश्वासी बनाया जा सके। इसका मूल विचार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित है, जो भारत की विविधता को एकता के सूत्र में बांधने की बात करता है। रिपोर्ट में संघ को लेकर जो निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए हैं, वे आलोचनाओं और एकपक्षीय दृष्टिकोण पर आधारित प्रतीत होते हैं।संघ की विचारधारा को लेकर अक्सर भ्रम फैलाया जाता है। जबकि संघ के दृष्टिकोण में यह सांस्कृतिक पहचान और सभ्यता का बोध है, जो सभी को साथ लेकर चलने की बात करता। संघ को बिना जाने जो रिपोर्ट में कहा गया है वह जानबूझकर सिर्फ और सिर्फ भ्रम फैलाने के लिए किया गया प्रयास है और कुछ नहीं।

रिपोर्ट में जिस “सीपीसी” श्रेणी में भारत को डालने की सिफारिश की गई है, वह सामान्यतः उन देशों के लिए होती है जहां राज्य स्वयं आस्थागत स्वतंत्रता का दमन करता है। इस श्रेणी में चीन, पाकिस्तान, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देश शामिल हैं, और प्रस्तावित सूची में अफगानिस्तान, सीरिया तथा लीबिया जैसे देश भी हैं। इन देशों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है, चीन में उइगर मुसलमानों पर अत्याचार, पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम पर भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा, ईरान में महिलाओं पर कठोर मजहबी नियंत्रण, उत्तर कोरिया में किसी आस्था को मानना ही अपराध होना, अफगानिस्तान में तालिबान शासन के तहत महिलाओं पर लगाए गए कठोर प्रतिबंध। क्या ऐसे देशों की पंक्ति में भारत को खड़ा करना न्यायसंगत तुलना करना है?

एक दृष्टि उस देश की ओर भी डालनी आवश्यक है जिसने यह रिपोर्ट तैयार की है। अमेरिका के भीतर बीते वर्षों में क्या हो रहा है, यह जानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि अमेरिकी कसौटी को अमेरिका पर ही लागू किया जाए, तो तस्वीर उतनी संतोषजनक नहीं दिखती। पिछले एक दशक में हिंदू विरोधी घटनाओं में वृद्धि, मंदिरों पर हमले, तोड़फोड़ और नफरत भरे नारों की पुनरावृत्ति एक स्पष्ट तरीके का संकेत देती है।

2017 में डोनाल्ड ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से सात मुस्लिम बहुल देशों के नागरिकों के प्रवेश पर रोक लगाई गई, जिसे विश्व स्तर पर “मुस्लिम बैन” कहा गया। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा और संशोधित रूप में इसे स्वीकार भी किया गया। यदि यही कदम कोई अन्य देश उठाता, तो क्या उसे मजहबी भेदभाव नहीं कहा जाता ?

इसी प्रकार चिन्हित आस्थाओं और समुदायों की निगरानी का प्रश्न भी उठता है। यदि यही कार्य कोई अन्य राष्ट्र करता, तो उसे “रिलिजियस प्रोफाइलिंग” का नाम दिया जाता। क्यूबा स्थित ग्वांतानामो बे में बिना सुनवाई के वर्षों तक लोगों को हिरासत में रखना भी मानवाधिकार और आस्थागत स्वतंत्रता दोनों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

अमेरिका के भीतर ‘हेट क्राइम’ यानी घृणा अपराधों की स्थिति भी चिंताजनक है। एफबीआई के आंकड़े बताते हैं कि आस्थागत पहचान के आधार पर अपराध हर वर्ष होते हैं, जिनमें यहूदी, मुस्लिम और सिख समुदाय सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। 2014–2015 के दौरान “हिंदूज गो बैक” जैसे नारे, मंदिरों में तोड़फोड़, 2019 में धार्मिक प्रतीकों का अपमान, 2022 में मंदिरों और महात्मा गांधी की प्रतिमा पर हमले, और 2023–2024 में एक ही क्षेत्र में कई मंदिरों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि यह केवल छिटपुट घटनाएं नहीं, बल्कि एक क्रमबद्ध तरीका है।

2025–2026 में एक ही मंदिर पर बार-बार हमले और “हिंदुस्तान मुर्दाबाद” जैसे संदेश इस प्रवृत्ति को और स्पष्ट करते हैं। यह संकट अब केवल धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यक्तियों तक पहुंच चुका है। न्यूयॉर्क में सिख बुजुर्ग जसमेर सिंह की हत्या, अन्य सिखों पर हमले, पगड़ी उतारना, कैलिफोर्निया में नस्लीय टिप्पणियां, सभी घटनाएं केवल हिंसा नहीं, बल्कि पहचान पर सीधा आघात हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जो देश अपने यहां इन घटनाओं को रोक पाने में असफल है, वह विश्व को धार्मिक स्वतंत्रता का प्रमाणपत्र कैसे दे सकता है?

USCIRF स्वयं एक अमेरिकी संस्था है, जिसकी अनुशंसाएं सलाहकारी हैं, बाध्यकारी नहीं। यह कोई वैश्विक न्यायालय नहीं है, न ही इसकी रिपोर्ट अंतिम सत्य है। इसके निष्कर्ष प्रायः गैर-सरकारी संगठनों, कार्यकर्ताओं और एक विशिष्ट वैचारिक तंत्र पर आधारित होते हैं। 2022 की रिपोर्ट में कुछ ऐसे दृष्टिकोणों को स्थान दिया गया, जिन पर स्वयं विवाद रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि इन रिपोर्टों में जमीनी सचाई से अधिक गढ़ी गई बातों की भूमिका होती है। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि यह रिपोर्ट अकादमिक शोध की तरह “पीयर रिव्यू” प्रक्रिया से नहीं गुजरती। यह नीति-आधारित दस्तावेज होती है, जिसमें पहले दृष्टिकोण तय होता है और उदाहरण उसके अनुरूप चुने जाते हैं। यही कारण है कि इसकी भाषा में निष्पक्ष शोध की बजाय पूर्वनिर्धारित राय की छाप अधिक दिखाई देती है।

इस रिपोर्ट का समय-क्रम भी ध्यान देने योग्य है। 2020 के बाद जब भारत तेजी से एक उभरती आर्थिक शक्ति के रूप में सामने आ रहा है, तभी से इस प्रकार की रिपोर्टों की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ी है। कभी भूख सूचकांक, कभी प्रेस स्वतंत्रता, कभी धार्मिक स्वतंत्रता—एक समान पैटर्न स्पष्ट दिखाई देता है। यह केवल रिपोर्ट नहीं, बल्कि कूटनीति का एक पैंतरा प्रतीत होती है, जिसमें आंकड़ों से अधिक गढ़ी हुई कहानी को महत्व दिया जाता है।

ऐसी रिपोर्टों में अक्सर चयनित घटनाओं को उठाकर पूरे देश की तस्वीर बना दी जाती है, जिसे शोध की भाषा में “सेलेक्शन बायस” कहा जाता है। इससे वास्तविक स्थिति का संतुलित चित्र सामने नहीं आ पाता।भारत और पश्चिम के बीच धार्मिक स्वतंत्रता की समझ में भी मूलभूत अंतर है। पश्चिम में व्यक्ति केंद्र में होता है, जबकि भारत में समाज, परंपरा और संतुलन समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि बाहरी दृष्टिकोण कई बार भारतीय संदर्भ को पूरी तरह समझने में असफल रहता है।

अंततः किसी भी रिपोर्ट को अंतिम सत्य मानने के बजाय उसे विभिन्न स्रोतों के साथ परखना आवश्यक है, अदालती निर्णय, जमीनी आंकड़े, स्वतंत्र शोध और भारतीय संदर्भ को साथ रखकर ही संतुलित निष्कर्ष निकाला जा सकता है। प्रश्न आलोचना का नहीं, बल्कि निष्पक्षता और नीयत का है। यदि तथ्यों से अधिक चयन और संतुलन से अधिक एजेंडा दिखाई दे, तो वह रिपोर्ट नहीं, बल्कि एक गढ़ी हुई कहानी बन जाती है।

भारत आज एक उभरती आर्थिक शक्ति है, एक सशक्त लोकतंत्र है और एक स्वतंत्र आवाज है। जब कोई राष्ट्र इस स्तर पर पहुंचता है, तो उसके विरुद्ध आरोप भी पकाए जाते हैं। किंतु जब ये आरोप तथ्यों से टकराते हैं, तो सत्य स्वयं सामने आ जाता है। ऐसे में आवश्यक है कि जो देश दूसरों को परखने का दावा करता है, वह पहले अपने भीतर झांके। क्योंकि जो स्वयं कटघरे में खड़ा हो, वह दूसरों का न्याय नहीं करता। भारत की पहचान इसकी संस्कृति और इस संस्कृति की पोषक संस्थाओं की पहचान किसी बाहरी रिपोर्ट से नहीं, बल्कि अपने सत्य और अपनी शक्ति से निर्धारित होती है।

X@hiteshshankar

Topics: अमेरिकी आयोगभारतीय विदेश मंत्रालयपाञ्चजन्य विशेषसांस्कृतिक राष्ट्रवादRSSUSCIRFअंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रताअमेरिका में मानवाधिकारमुस्लिम बैनअफगानिस्तानभारत की प्रगतिराष्ट्रीय सुरक्षाहिंदूफोबिया
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