वैश्विक गठबंधनों पर पुनर्विचार: व्यावहारिक नेतृत्व की आवश्यकता, क्या हो रही ट्रम्प की कूटनीतिक नीति की वापसी
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वैश्विक गठबंधनों पर पुनर्विचार: व्यावहारिक नेतृत्व की आवश्यकता, क्या हो रही ट्रम्प की कूटनीतिक नीति की वापसी

कुछ आलोचक यह भी कहते हैं कि पश्चिमी देशों ने रूस को अंतरराष्ट्रीय मंचों से अलग-थलग करके स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा
Mar 18, 2026, 08:11 am IST
in विश्व
डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका के राष्ट्रपति

डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका के राष्ट्रपति

कई विश्लेषकों का मानना है कि अब वह समय आ गया है, बल्कि काफी पहले आ जाना चाहिए था, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को अपने पहले कार्यकाल की कूटनीतिक नीति की ओर लौटना चाहिए। उस नीति का आधार प्रमुख वैश्विक नेताओं के साथ सीधे संवाद पर था, जिनमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल थे, जिन्हें ट्रम्प अक्सर विश्वसनीय मित्रों के रूप में देखते थे।

इस दृष्टिकोण के समर्थकों का मानना है कि ऐसी व्यावहारिक कूटनीति, जिसमें प्रतिबंधों की समीक्षा और संवाद की पुनर्स्थापना शामिल हो, आज की विभाजित वैश्विक राजनीति में स्थिरता ला सकती है।

ईरान संघर्ष और अलग-अलग दृष्टिकोण

ईरान के विरुद्ध कठोर नीति के समर्थक इसे ईरानी जनता को एक दमनकारी मजहबी शासन से मुक्त कराने का प्रयास बताते हैं। आलोचकों के अनुसार ईरान का शासन न केवल अपने देश में कठोर नियंत्रण बनाए रखता है बल्कि इज़राइल के अस्तित्व के विरुद्ध भी लगातार आक्रामक बयान देता है।

हालांकि कुछ विश्लेषक यह भी तर्क देते हैं कि पश्चिमी देशों की नीतियों में एक विरोधाभास दिखाई देता है – वे विदेशों में लोकतंत्र की बात करते हैं लेकिन कभी-कभी अपने देशों में असहमति की आवाज़ों को सीमित करते हुए दिखाई देते हैं।

यूक्रेन युद्ध और वैश्विक जोखिम

हाल के वर्षों में यूक्रेन युद्ध सबसे गंभीर भू-राजनीतिक संकट के रूप में उभरा है। आलोचकों का कहना है कि नाटो नेतृत्व ने अमेरिका पर रूस के विरुद्ध कठोर रुख अपनाने का दबाव बनाया, जिससे परमाणु शक्तियों के बीच टकराव का खतरा बढ़ गया।

इस दृष्टिकोण के अनुसार, युद्ध के प्रारंभिक चरण में ही कूटनीतिक समाधान तलाशने के बजाय यूक्रेन को लगातार लड़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप एक सुंदर और समृद्ध देश युद्ध की विनाशलीला में झोंक दिया गया।

रूस की सुरक्षा चिंताओं का प्रश्न

इस बहस का एक प्रमुख बिंदु नाटो का विस्तार है। रूस की यह मांग कि यूक्रेन नाटो में शामिल न हो, कई लोगों के अनुसार उसकी सुरक्षा चिंताओं से जुड़ी हुई थी। समर्थक तर्क देते हैं कि यदि किसी सैन्य गठबंधन को, जिसे रूस अपना प्रतिद्वंद्वी मानता है, उसके दरवाजे तक आने दिया जाए तो स्वाभाविक रूप से प्रतिक्रिया होगी। अक्सर यह प्रश्न भी उठाया जाता है कि क्या अमेरिका या नाटो के देश यह स्वीकार करेंगे कि उनके पड़ोसी देश रूस या चीन के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन में शामिल हो जाएं।

कूटनीतिक अपमान और तनाव

कुछ आलोचक यह भी कहते हैं कि पश्चिमी देशों ने रूस को अंतरराष्ट्रीय मंचों से अलग-थलग करके स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया। उदाहरण के लिए, रूस को जी-7 जैसे मंचों से बाहर करना मॉस्को के लिए एक प्रकार का कूटनीतिक अपमान माना गया। उनका मानना है कि ऐसी नीतियों ने तनाव कम करने के बजाय उसे और अधिक बढ़ाया।

पुनर्मूल्यांकन का समय

जब रूस ने अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन किया, तब कई पश्चिमी देशों को इस टकराव की गंभीरता का एहसास हुआ। कुछ विश्लेषकों का दावा है कि इसके बाद वही देश अमेरिका की ओर देखने लगे कि वह इस संकट को नियंत्रित करने में नेतृत्व करे।

सोवियत संघ के विघटन से मिलने वाले सबक

इतिहास की ओर देखें तो सोवियत संघ के विघटन के समय कई रणनीतिक क्षेत्रों का प्रश्न भी उठता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उस समय सोवियत नेतृत्व ने भविष्य की सुरक्षा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कुछ क्षेत्रों को अपने नियंत्रण में रखा होता, तो आज की भू-राजनीतिक स्थिति अलग हो सकती थी। हालाँकि उस समय अधिकांश गणराज्यों को बिना युद्ध के स्वतंत्रता मिली, इसलिए उनकी संप्रभुता व्यापक रूप से स्वीकार कर ली गई।

एक अधिक यथार्थवादी विश्व व्यवस्था की आवश्यकता

अंततः यह पूरा विवाद इस बड़े प्रश्न की ओर संकेत करता है कि विश्व की बड़ी शक्तियाँ अपने हितों को संतुलित करते हुए वैश्विक शांति कैसे बनाए रखें। कई विश्लेषकों का मानना है कि स्थिरता तभी संभव है जब सभी प्रमुख शक्तियों की सुरक्षा चिंताओं को समझा और स्वीकार किया जाए। परमाणु हथियारों और परस्पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के इस युग में गलत आकलन की कीमत पूरी मानवता को चुकानी पड़ सकती है।

Topics: व्लादिमीर पुतिननरेंद्र मोदीडोनाल्ड ट्रंपईरान अमेरिका युद्धयूक्रेन इजरायल संघर्ष
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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