आज हरियाणा में मेहंदीपुर गांव को हर कोई जानता है। गांव को यह यश कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दिलाया है। लगभग दो दशक में गांव में बड़े परिवर्तन हुए हैं। ग्रामीण संजीव कुमार बताते हैं, ”हम गांव के लोग अपने गांव को तीर्थ मानते हैं। यही कारण है कि ग्राम विकास के लिए जो समिति बनी, उसका नाम-‘मेरा गांव, मेरा तीर्थ’ समिति रखा गया है। यही समिति पूरे गांव का ध्यान रखती है।”
समय-समय पर गांव में फिरनी (जिसमें सिंचाई का पानी बहता है) और नालों की सफाई कराई जाती है।
पॉलीथीन-मुक्त गांव कार्यक्रम के अंतर्गत घर-घर से कूड़ा-कचरा एकत्रित करने के लिए ट्रैक्टर ट्रॉली की व्यवस्था की गई है। इस कारण गांव की गलियां पूर्ण रूप से साफ रहती है। गांव में पॉलीथीन के उपयोग में 40 प्रतिशत की कमी भी आई है। समिति ने 20 लाख रुपए खर्च कर गांव में एक मंदिर बनवाया है। सामाजिक समरसता के लिए यह समिति वर्ष में दो बार भंडारे का आयोजन करती है, जिसमें गांव के सभी लोग एक साथ भोजन करते हैं। गांव के बच्चों के लिए खेल का मैदान बनवाया गया है, जहां एक एक कोच की देखेरख में प्रतिदिन 50 से अधिक बच्चे विभिन्न खेलों का अभ्यास करते हैं। समय-समय पर खेल प्रतियोगिताओं का भी आयोजन होता है।
गांव को बाहरी दुनिया से जोड़ने के लिए दो मुख्य मार्ग हैं-यमुना रोड और मुरथल रोड। समिति ने इनकी दोनों तरफ पेड़ लगवाए हैं। इस कारण गांव हरा-भरा है। जब भी आवश्यकता होती है, तब नए वृक्षारोपण भी किए जाते हैं। समिति ने गांव के पर्यावरण को बचाने लिए भंडारे या अन्य किसी अवसर पर थर्मोकोल की प्लेट पर प्रतिबंध लगा दिया है। भंडारे के लिए समिति ने स्टील की प्लेट और गिलास की व्यवस्था की है।
बरसाती पानी को बचाने लिए समिति ने गांव के विद्यालय परिसर और अन्य बड़े-बड़े मकानों में वर्षा जल संचयन (वाटर हार्वेस्टिंग) की व्यवस्था की है। यही नहीं, पानी की आपूर्ति करने वाली पाइप लाइन में जहां भी टोटी खराब होती है, उसे समिति ही तत्काल ठीक करवाती है। इससे जल बचता है। गांव में गो-संवर्धन के लिए एक केंद्र स्थापित किया गया है। इसमें गिर, साहीवाल, हरियाणा नस्ल के नंदी और बछिया तैयार की जाती है।
इसका सुपरिणाम यह हुआ है कि गांव के 30 घरों में विदेशी नस्ल के गोवंश की जगह देसी नस्ल के गोवंश का पालन शुरू हो गया है। इनसे प्रेरणा लेकर आपसपास के अन्य गांवों के लोगों ने भी देसी नस्ल की गायें रखना शुरू कर दिया है, जिनकी संख्या लगभग 1,000 है। गो-संवर्धन केंद्र में पंचगव्य उत्पादों का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। इससे लगभग 50 लोगों को रोजगार मिला है। समिति ने गांव में सिलाई केंंद्र खोला है, जहां से प्रशिक्षण लेकर महिलाएं स्वावलंबी बन रही हैं। यही कारण है कि गांव के 70 प्रतिशत लोग रोजगार से युक्त हैं।















