बच्चों की कल्पनाएं असीम होती हैं। ये कल्पनाएं रंगों के माध्यम से कैनवस पर उतरती हैं। लेकिन क्या होगा जब उनकी इस कला पर ऐसा प्रहार हो, जो उन्होंने कभी सोचा ही न हो? क्या हो जब सरकार द्वारा उनकी इस कला के विषय में कहा जाए कि यह तो इस्लामिक कानूनों के खिलाफ है?
क्या किसी भी देश या प्रांत की सरकार यह कह सकती है कि बच्चों की चित्रकारी भी इस्लामिक कानून के अंतर्गत बेअदबी हो सकती है? लेकिन ऐसा इंग्लैंड में हुआ है।
क्या कहा लेबर काउन्सिल्स ने?
लेबर के नेतृत्व वाली उत्तरी इंग्लैंड की काउन्सिल्स ने शिक्षकों के लिए कई दिशानिर्देश जारी किये हैं। इनमें यह भी कहा गया है कि शरिया के अंतर्गत बच्चों द्वारा कला की कक्षा में बनाई गई चित्रकारी भी बेअदबी के दायरे में आ सकती है।
क्यों बनाए गए ये दिशानिर्देश?
अब प्रश्न उठता है कि ऐसे दिशानिर्देश आखिर क्यों बना दिए गए हैं? कहा जा रहा है कि ये दिशानिर्देश इसलिए बनाए गए हैं कि ताकि वहां शिक्षक को मजहबी संवेदनशीलता को समझने में सहायता मिल सके। इन दिशानिर्देशों मे यह चेतावनी भी दी गई है कि संगीत और नृत्य कक्षाएं भी इस्लाम की हिदायतों के विपरीत हो सकती हैं। द टेलीग्राफ के अनुसार इसमें यह भी कहा गया है कि कक्षाओं में विविधता को एक शक्ति के एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में देखा जाना चाहिए, मगर यह भी कि मजहबी अंतरों को समझने में स्कूल सक्षम होने चाहिए।
यह दिशानिर्देश उत्तरी इंग्लैंड के स्थानीय अधिकारियों द्वारा जारी किये गए हैं, जिसमें किर्कलीज भी शामिल है – यह वही काउंसिल क्षेत्र है जहां बैटली ग्रामर स्कूल स्थित है। यह वही स्कूल है जो वर्ष 2021 में चर्चा में आया था। वर्ष 2021 में, एक टीचर द्वारा क्लास में पैगंबर की एक तस्वीर दिखाए जाने के बाद, इस स्कूल के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन हुए थे और संबंधित कर्मी अभी भी छिपा हुआ है।
दिशानिर्देश में क्या कहा गया है
“Sharing the Journey” शीर्षक वाले इस गाइडेंस डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि “कुछ मुस्लिम माता-पिता के लिए, कला, नृत्य, नाटक, संगीत, शारीरिक शिक्षा, धार्मिक शिक्षा और RSHE (संबंध, यौन और स्वास्थ्य शिक्षा) से जुड़े विषयों की पढ़ाई को लेकर कुछ संवेदनशीलताएं हो सकती हैं।”
इसमें लिखा हुआ है कि कैसे कुछ मजहबी पाबंदियों का प्रबंधन करना है और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम भी यह कहता है कि “यह सच है कि इस्लामी तहजीब ने लंबे समय तक टिकने वाली अमूर्त कला का निर्माण किया है, फिर भी “इंसानों की त्रि-आयामी आकृतियों को कुछ मुसलमानों द्वारा मूर्ति-पूजा माना जाता है।” इस दिशानिर्देश में शिक्षकों को यह सलाह दी गई है: “यह बहुत ज़रूरी है कि स्कूल इस बात को समझे और इस बात का भी ध्यान रखे कि वह अपने विद्यार्थियों से ईसा मसीह, पैगंबर मोहम्मद या इस्लाम में पैगंबर माने जाने वाले अन्य लोगों की तस्वीरें बनाने के लिए न कहे। कुछ मुस्लिम छात्र इंसानी आकृतियाँ बनाना पसंद नहीं कर सकते हैं।”
सोशल मीडिया पर लोगों का विरोध?
इन दिशानिर्देशों को लेकर एक बार फिर से इंग्लैंड में सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है। उनका कहना है कि आखिर बच्चों की चित्रकारी कैसे बेअदबी हो सकती है? लोग एक्स पर प्रश्न कर रहे हैं कि क्या लोकतान्त्रिक संवेदनशीलता कुछ नहीं होती है? लोग हैरानी व्यक्त कर रहे हैं कि बच्चों की चित्रकारी को बेअदबी बताकर लेबर काउंसिल आखिर क्या कर रही है? क्या वह शरिया लागू करने की योजना बना चुकी है और अब चरणबद्ध तरीके से इंग्लैंड में शरिया लागू किया जा रहा है?
इन दिशानिर्देशों में संगीत को लेकर भी काफी भ्रामक लिखा गया है। संगीत को लेकर लिखा है कि “इस्लाम में, संगीत पारंपरिक रूप से केवल मानवीय आवाज और ऐसे ताल-वाद्य यंत्रों तक ही सीमित है जिन्हें सुर में नहीं मिलाया जा सकता—ठीक वैसे ही जैसे पैगंबर के ज़माने में था, जब इनका इस्तेमाल सिर्फ़ शादी-ब्याह के मौकों और युद्ध के मैदान में किया जाता था।” दिशानिर्देशों में यह भी कहा गया है कि हालांकि संगीत को लेकर इस्लाम में लोगों की राय भिन्न हो सकती है, परंतु “स्कूलों को लोगों की चिंताओं पर ध्यान देना चाहिए, पाठ्यक्रम में संगीत की जगह पर चर्चा करनी चाहिए, और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विद्यार्थियों से ऐसे गीत गाने के लिए न कहा जाए जो उनके धार्मिक विश्वासों के विपरीत हों।”
समुदायों में सामंजस्य बनाने के लिए हैं ये दिशानिर्देश
काउन्सिल्स के अनुसार ये दिशानिर्देश समुदायों के मध्य सामंजस्य और समझ बढ़ाने के लिए हैं, जिससे स्थानीय समुदायों के बीच की दूरी कम हो सके। चूंकि लेबर सरकार ने पिछले ही सप्ताह तमाम स्कूलों से यह अनुरोध किया था कि वह सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए मुस्लिम विरोधी माहौल पर निगरानी रखे। द टेलीग्राफ के अनुसार इंग्लैंड में अन्य स्थानों पर भी ऐसे ही दिशानिर्देश जारी किये गए हैं, जिनमें यह चेताया गया है कि कुछ मुस्लिम परिवारों को किसी प्रकार की चित्रकारी या संगीत से परेशानी हो सकती है, तो इसका ध्यान रखा जाए।
जहां काउन्सिल्स का यह कहना है कि यह दिशानिर्देश सामाजिक सौहार्द को बनाए रखने के लिए है तो वहीं सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि यह और कुछ नहीं बल्कि इस्लामी कट्टरता की ओर इंग्लैंड का एक और कदम है और ऐसा लगता है कि सरकार ने मजहबी ताकतों के सामने अपने घुटने पूरी तरह से टेक दिए हैं।











