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संघ के 100 साल : कैसे बदला वैचारिक विमर्श और भारतीय राजनीति का चेहरा?

Rashtriya Swayamsevak Sangh के 100 वर्ष पूरे होने पर उसके वैचारिक प्रभाव, भारतीय लोकतंत्र, सामाजिक विमर्श और राजनीति में भूमिका पर विस्तृत चर्चा। Narendra Modi और Bharatiya Janata Party के संदर्भ में संघ की भूमिका को समझें।

Written byमहेंद्र कुमार पाण्डेयमहेंद्र कुमार पाण्डेय
Mar 10, 2026, 09:30 pm IST
inविश्लेषण, संघ @100

संघ अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर रहा है। भारत के इतिहास पर विहंगम दृष्टिपात करें तो 100 वर्ष का कालखंड बड़ा नहीं है किन्तु सामयिक इतिहास में सतत अखंड वैचारिक धारा के अनुसार लक्ष्य सिद्धि के लिए अनवरत सामूहिक पुरुषार्थ करते हुए कोई भी संगठन किसी भी क्षेत्र में दिखाई नहीं देता है। इन 100 वर्षों में संघ एवं संघ के विचार से अनुप्राणित अनेकानेक संगठनों का विस्तार चहुंओर हुआ है। आज देश का कोई भी वर्ग संघ-कार्य से अछूता नहीं है।

देश के हर क्षेत्र में संघ स्वयंसेवकों की भूमिका

आज संघ के स्वयंसेवक देश के हर क्षेत्र में और हर विषय में वैचारिक हस्तक्षेप करने में न केवल सक्षम है अपितु पहले से चल रहे, पश्चिम से प्रभावित, पोषित, निर्देशित विमर्श की धारा को मोड़ने में भी सक्षम हैं। आजादी के बाद विमर्श के तय मापदंड आज एक के बाद एक धराशायी हो रहे हैं। चाहे धर्म निरपेक्षता का विषय हो, चाहे हिंदू मुस्लिम का विषय हो या कोई अन्य सामाजिक, सांस्कृतिक बौद्धिक विमर्श हो, सब कुछ बहस के दायरे में है। नेहरू जी द्वारा स्थापित विकास का मापदंड अब बहस से परे नहीं है यहाँ तक कि गाँधी जी के हिन्दू-मुस्लिम विमर्श भी अब बहस के दायरे में आने लगे हैं।

देश में नए वैचारिक विमर्श का वातावरण

हमारी पुरानी पीढ़ी कुछ असहज सी दिखती है। वो लोग भी बिफरे हुए हैं जो इस बहस से बना दिए गए मायाजाल के ढहने से अपनी रोजी-रोटी पर खतरा मंडराते देख रहे हैं? यदि ऐसे कुछ श्रद्धावान या लंपट जमात/ जवान को छोड़ दिया जाए तो पूरे देश में संघ के माध्यम से खड़ी हुई बहस ओर नए बने वातावरण के प्रति स्वागतशीलता है। लोग स्वतंत्रता आंदोलन की गलतियों पर भी बहस करना चाहते हैं। लोग नेहरू-गाँधी मॉडल पर भी बहस करना चाहते हैं। लोग हिंदू मुस्लिम विमर्श के मापदंडों पर बहस करना चाहते हैं। लोग धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद ऐसे सब विषयों पर बहस करना चाहते हैं जो सामाजिक समरसता ओर राष्ट्र की बहुआयामी एकता अखंडता के लिए महत्वपूर्ण है।

संघ के कारण बदला वैचारिक परिदृश्य

आज भारत में यह संभव हो सका तो उसका सबसे बड़ा कारण है संघ के स्वयंसेवकों की देश के हर क्षेत्र में बनी पैठ। नेहरुवियन मॉडल के नाम पर बना दिये गए मापदंडों को ढहाने में संघ का स्वयंसेवक सक्षम है। परिवारवाद को पोषित करती इस व्यवस्था के ढहने से उपजी इस बिलबिलाहट हम देख रहे हैं। नेहरू मॉडल से पल्लवित पोषित बुद्धिजीवी वर्ग ने देश की हर संस्था को अपने पंजों में जकड़ रखा था। देशभर में संघ विचार से वैचारिक क्षितिज में आए सकारात्मक परिवर्तनों से इन संस्थाओं में भी बदलाव आया है। पर दशकों से काबिज इस ईको-सिस्टम की जगह इतनी मजबूत है कि ये सब संस्थाएँ इनके ही इशारों पर काम करती हैं। ये चोला बदलने में भी माहिर है। आज जो ताकते संघ को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रही है वो ये जानती है कि चोला बदलकर अंदर घुसने का प्रयास सफल नहीं हो रहा है। इसलिए बौखलाहट में वो खुलकर सामने आ गए। पर यह विचलित करने वाला कतई नहीं। अब हम ऐसी ताकतों को परास्त करने में सक्षम है। आज संघ का नेतृत्व ऐसा है जो अपनी ताकत भी पहचानता हैं और अपनी मर्यादा भी।

भारतीय लोकतंत्र और संघ की भूमिका

एक और विषय जो अत्यंत महत्वपूर्ण है, वह यह कि संघ ने इस देश के लोकतंत्र के लिए क्या किया? एक वैचारिक राजनीतिक संगठन के रूप में भाजपा आज पूरे देश में अपनी जड़ें जमा चुका है। दक्षिण भारत में भी ताकत लगातार बढ़ रही है। आज भाजपा की ताकत बढ़ने के साथ-साथ उस पर हमले भी बहुत तेज हो गए। नेहरू गाँधी की वंशवाद की राजनीति के आदी हो चुके और उसमें अपनी आजीविका धनबल सत्ता-बल प्राप्त करने वाले पत्रकार, बुद्धिजीवी, समाजशास्त्री पूरी ताकत से भाजपा को येन केन प्रकारेण बाहर करने के लिए कमर कसकर लगे हुए है।

राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा की कल्पना के बिना स्थिति

पर मैं एक और विषय पर सोचने का आग्रह करना चाहता हूँ। कल्पना कीजिये आज राजनैतिक परिदृश्य में भाजपा नहीं होती। कांग्रेस समय के साथ-साथ कमजोर हो रही थी और सन 1969 के विघटन के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, सिमटकर इंदिरा कांग्रेस और उनके एक परिवार की पार्टी बन कर रह गई। व्यक्ति पूजा के गांधी-नेहरू माडल की मानसिक दासता ने नेहरू के बाद इंदिरा गांधी के द्वार पर लाकर खड़ा कर दिया जिसका दुष्परिणाम आपातकाल के रूप में देश को अमानवीय पीड़ा झेलने के लिए मिला। इंदिरा गांधी की सत्ता को बचाने के लिए देश में लोकतंत्र को फांसी पर लटका दिया गया।

परिवारवाद और क्षेत्रीय दलों का उदय

कांग्रेस के चिंतन में देशहित के स्थान पर गांधी परिवार का हित ही एकमात्र लक्ष्य रह गया। ऐसी परिस्थितियों में कांग्रेस के कुछ क्षत्रप देश के अलग-अलग हिस्सों में अपने निहित स्वार्थों के लिए कांग्रेस को अपने-अपने क्षेत्रों में जीवित रखे रहे। फिर इन्ही क्षत्रपो की सत्ता की लालसा परवान चढ़ने लगी और कमजोर होती कांग्रेस से अपने अपने प्रदेशों में छिटककर वहाँ के सर्वेसर्वा बन बैठे। यही से जन्म होता है एक ऐसे संकटकारी राजनैतिक नेतृत्व का जो भारतीय भूमि से उपजे लेकिन मानसिकता में अंग्रेजों की बांटो और राज करो की चाबी पकड़े हुए है।

क्षेत्रीय परिवारवादी दलों का विस्तार

कांग्रेस से ही क्षेत्रीय पार्टियों का या फिर क्षेत्रीय परिवारवादी दलों का उदय हुआ। बिहार में लालू परिवार का राजद, उत्तर प्रदेश में मुलायम परिवार की सपा, बंगाल में ममता परिवार की टीएमसी, महाराष्ट्र में शरद परिवार की एनसीपी, तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार की डीएमके। इन सभी क्षेत्रीय राजनैतिक दलों में व्याप्त भ्रष्टाचार, संकीर्ण स्वार्थी राजनैतिक सोच और अपने परिवार के स्वार्थ पूर्ति के देश को भी बेच देने की मानसिकता वाली राजनीति ने देश को अस्थिर अक्षम भ्रष्ट सरकारे, जिनके प्रधानमंत्री इंद्राकुमार गुजराल ने देश के एकता अखंडता ओर सुरक्षा को लेकर समझोते किये।

कमजोर केंद्र सरकार की संभावित स्थिति

बीजेपी की अनुपस्थिति में कल्पना कीजिए राजस्थान में कोई मीणा अथवा बेनीवाल परिवारवाद वंशवाद की भ्रष्ट राजनीति करता। मध्यप्रदेश में कोई दिग्विजय या असम में किसी गोगोई का भ्रष्ट राजनैतिक दल होता है। यानी कमजोर होती परिवारवादी कांग्रेस सिमटती गई और अलग-अलग प्रांतों में क्षेत्रीय दल ओर इन दलों पर निर्भर अत्यंत कमजोर केंद्र सरकार।

देश के लिए संभावित खतरे

कल्पना कीजिए कितनी भयावह स्थिति होती, अलग-अलग प्रांतों में मजबूत क्षेत्रीय परिवारों की भ्रष्ट सरकार और केंद्र में इनके आसरे टिकी कमजोर सरकार। भारत के लोकतंत्र की इस भयावह तस्वीर कई मुख्तार अंसारी कई शहाबुद्दीन कई बदरुद्दीन फल-फूल रहे होते। देश में सांप्रदायिकता का जहर घोल कर कई दंगों को अंजाम दे रहे होते। भारत की सुरक्षा एजेंसियों सेना की गुप्त जानकारिया शत्रुओ से साझा हो रही होती। सियाचिन पाकिस्तान को देने के समझौते हो रहे होते। चीन को अंडमान निकोबार दिया जा रहा होता जैसे कोको द्वीप दे दिया गया था। भारत के बाल्कनाईजेशन का ऑपनिवेशिक शक्तियों का दशकों पुराना एजेंडा साकार हो रहा होता। भारत खंड-खंड होकर बिखर रहा होता।

परिवारवाद: लोकतंत्र का सबसे बड़ा अभिशाप

परिवारवाद के विषैले सांप की जकड़ में फंसे ये राजनैतिक दल, विदेशी शक्तियों के इशारे पर भारत के की टुकड़े करने में लगे होते। भारत के लोकतंत्र का सबसे बड़ा अभिशाप है परिवारवाद! इस भयावह तस्वीर की कल्पना मात्र से ही सिहरन उठती है। आज संघ-भाजपा ने इन विध्वंसकारी शक्तियों को रोक रखा है। संघ की भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी सेवा यही है की देश में लोकतंत्र को बचाने में संघ ने भाजपा को परिवार वादी पार्टी नहीं बनने दीया।

भाजपा का संगठनात्मक लोकतंत्र

आज के परिदृश्य में भाजपा सही अर्थों में एकमात्र लोकतांत्रिक पार्टी बची है, जहाँ नीचे से ऊपर तक चुनाव होते हैं। मंडल स्तर से पार्टी में काम करनेवाले कार्यकर्ता राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते हैं, कभी स्व अटलजी, कभी आडवाणीजी, तो मुरलीमनोहर जी तो कभी राजनाथ जी, कभी नितिन गडकरी जी, कभी अमित शाह जी, कभी नितिन नवीन जी, सभी के सभी नीचे से उठे हुए कार्यकर्ता रहे। सत्ता में भी यही नियम रहा है। शासन में कभी अटल जी तो कभी नरेंद्र मोदी जी जिनके परिवार, परिवारों से भी शायद देश परिचित ना हो। यह संभव हुआ है उस वैचारिक संगठन के कारण जिसका नाम है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।

संघ और लोकतंत्र की रक्षा

संघ की शक्ति से लोकतंत्र-विरोधी परिवारवादी संगठन भयभीत है। उन्हे भय है कि जनजागरण से आज उनके परिवार की सत्ता को संकट है। संघ विचार से लड़ने का सामर्थ्य इन भ्रष्ट वंशवादी राजनैतिक दलों के पास कभी ना था। आज भाजपा नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में एक सशक्त सरकार चला रही है, जो आगे भी चलती रहेगी। कल कोई और जमीनी स्वयंसेवक कार्यकर्ता संगठन सत्ता को संघ विचार के अनुरूप नेतृत्व देगा। इतना तय है की वो किसी एक परिवार का नहीं होगा।

संघ की भूमिका और राष्ट्र की एकता

संघ के रहते भारत की एकता अखंडता अक्षुण्ण रहेगी, संघ के स्वयंसेवक माँ भारती पर कोई आंच नहीं आने देंगे। जैसे एक समय छत्रपति शिवाजी राजे ने कटक से अटक तक हिन्दू स्वराज का भगवा ध्वज फहराया था उसी प्रकार आज संघ का भगवा ध्वज भारत को पुनः परम वैभव पर ले जाने के लिए तत्पर सक्षम अग्रसर है। संघ की सौ वर्ष की यात्रा ने शिवाजी राजे की उपस्थिति उनकी भूमिका को पुन:प्रतिष्ठित किया है।

कविराज भूषण की पंक्तियाँ

शिवराजभूषण में कविराज भूषण कहते है कि –

काशी हूँ की कला गई, मथुरा मसीत भई,

भूषण भनत है, सरजा शिवाजी महाराज।

न होते तो सबकी धर्म-हानी भई।।

“काशी हूँ की कला गई, मथुरा मसीत भई,

शिवाजी ना होतो तो सुन्नत होती सबकी”

राष्ट्र निर्माण के लिए त्याग और समर्पण

हमें यह विस्मरण ना हो कि राष्ट्र त्याग बलिदान सेवा समर्पण ओर ध्येयनिष्ठ साधन माँगता है ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इन्ही भावों का प्रकटीकरण है।

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महेंद्र कुमार पाण्डेय
महेंद्र कुमार पाण्डेय
एमएससी, PGDMM(HPU). 1981 से 2000 तक अ भा वि प में प्रदेश संगठन मंत्री, क्षेत्रीय संगठन मंत्री एवं राष्ट्रीय महामंत्री का दायित्व. 2000-03 तक क्षेत्रीय संयोजक स्वदेशी जागरण मंच. 2003-2010 तक प्रदेश संगठन मंत्री भाजपा हिमाचल प्रदेश. 2010-2015 राष्ट्रीय संगठक मोर्चा एवं प्रकोष्ठ भाजपा संप्रति केंद्रीय कार्यालय मंत्री भाजपा [Read more]
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