America-Israel के Iran पर हमले में फंसे खाड़ी के इस्लामी देशों की चुप्पी के मायने क्या? संयम या संतुलन की मजबूरी!
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America-Israel के Iran पर हमले में फंसे खाड़ी के इस्लामी देशों की चुप्पी के मायने क्या? संयम या संतुलन की मजबूरी!

खाड़ी देशों की प्राथमिकता “डी‑एस्केलेशन” पर केन्द्रित है। यह बात सही है कि ईरानी हमले की जद में आए सभी खाड़ी देशों में प्रत्युत्तर देने का दबाव बढ़ रहा है, लेकिन देखना होगा कि यह दबाव 'संयम' को कब तक थाम कर रख पाएगा

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Mar 3, 2026, 07:32 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
इस्राएली हमलों से ध्वस्त तेहरान का एक इलाका

इस्राएली हमलों से ध्वस्त तेहरान का एक इलाका

अमेरिका और इस्राएल का संयुक्त आपरेशन एपिक फ्यूरी जारी है, ईरान के कई ठिकाने बर्बाद हो चुके हैं। ईरान ही नहीं उसकी तरफ से जिहादी गुट हिज्बुल्ला ने इस्राएल पर मिसाइलों और ड्रोन से निशाने साधे हैं, जिनसे इस्राएल को भी काफी नुकसान पहुंचा है। इस्राएल का कहना है कि जानबूझकर उसके रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया गया है, ​जो युद्ध के कायदों के विपरीत है। लेकिन इतना ही नहीं, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमले खाड़ी के इस्लामी देशों को भी परेशान किए हुए हैं। लेकिन हैरानी की बात है कि ईरान के इन हमलों का उस देशों की ओर से कोई ठोस सैन्य जवाब नहीं दिया गया है। इसे लेकर विशेषज्ञ अनेक कारण गिना रहे हैं। इनमें जहां आर्थिक कारण हैं तो क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने से बचाने की चिंता भी है।

गल्फ सहयोग परिषद (GCC) के विदेश मंत्रियों ने ईरान के बढ़ते की मिसाइल और ड्रोन हमलों पर कल चिंता जताने के लिए वीडियो के जरिए एक आपातकालीन बैठक की (Representational Image)

ईरान के खाड़ी देशों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों पर कूटनीतिक प्रतिक्रिया करते हुए सऊदी अरब, कतर, बहरीन, जॉर्डन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और अमेरिका ने एक संयुक्त बयान जारी कर ईरान की ओर से ‘बिना सोचे‑समझे’ हमले करने की कड़ी निंदा की है और इन्हें क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बताया है। इस संयुक्त बयान में इस बात पर जोर दिया गया है कि ‘ये देश अपनी संप्रभुता, नागरिकों की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के एकजुट रहने और आत्मरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल करने को लेकर प्रतिबद्ध हैं।’

GCC बैठक में ईरान के प्रति सख्त रवैया

गल्फ सहयोग परिषद (GCC) के विदेश मंत्रियों ने ईरान के बढ़ते मिसाइल और ड्रोन हमलों पर कल चिंता जताने के लिए वीडियो के जरिए एक आपातकालीन बैठक की, जिसमें यूनाइटेड अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, बहरीन और ओमान जैसे देशों के मंत्री शामिल रहे। इस बैठक में ईरान के द्वारा संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर और जॉर्डन पर किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों को दिल का आहत करने वाले और अनुचित आक्रमण बताकर निंदा की गई। इन हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के स्पष्ट उल्लंघन के तौर पर देखा गया। GCC ने इन हमलों के बाद जवाबी कार्रवाई के ‘विकल्प’ के खुला होने की बात कही है। लेकिन अभी तक ईरानी पर इन देशों की ओर से कोई सीधा जवाबी हमला नहीं देखने में आया है।

ईरानी के मिसाइल हमले के बाद दुबई में उठता धुंआ

संयम और आर्थिक समीकरण

ईरानी मिसाइलों ने खाड़ी के कई शहरों में होटलों, बंदरगाहों, ऊर्जा फेसिलिटीज और नागरिक इमारतों को निशाना बनाया है। उसके बावजूद प्रभावित GCC देशों ने अभी तक ईरान पर सीधे हमलों का जवाब देने से संयम बरता हुआ है। इन देशों ने हवाई सुरक्षा बढ़ा दी है, हमलों की सख़्त निंदा की है और अपने जवाब देने के अधिकार को खुला भी रखा ह। लेकिन इसके साथ ही उनका कहना है कि वे नहीं चाहते युद्ध का व्याप बढ़े, क्योंकि संघर्ष लंबा चला तो इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती हैं। गल्फ इंटरनेशनल फोरम की निदेशक डानिया थाफर जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि खाड़ी देशों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर युद्ध का दायरा बढ़ता है तो तेल निर्यात टर्मिनल, एविएशन हब, बंदरगाह, पर्यटन और वित्तीय केंन्द्रों जैसी बुनियादी इकाइयां लंबे समय तक डावांडोल हो सकती हैं।

दोहा स्थित अमेरिकी सैन्य बेस पर ईरानी का मिसाइल हमला

ईरान का तर्क और अमेरिका‑इस्राएल की भूमिका

ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारीजानी ने खाडत्री देशों पर अपने हमलों को जवाबी कार्रवाई और अमेरिकी संपत्ति को निशाना बनाने वाली कार्यवाही के रूप में बताया है। लेकिन हैरानी की बात है कि लारीजानी यह भी कहते हैं कि वे खाड़ी देशों पर प्रत्यक्ष आक्रमण करने की इच्छा नहीं रखते हैं। ईरानी अधिकारियों का दावा है कि उनके मिसाइल और ड्रोन अमेरिकी ठिकानों और उन सुविधाओं पर निशाना लगा रहे हैं जो अमेरिका और इस्राएल के खिलाफ उनके युद्ध में इस्तेमाल होती हैं। लेकिन सच तो यह है कि कई मिसाइलें नागरिक इलाकों पर भी गिरी हैं जिनसे काफी तबाही मची है। इसी वजह से खाड़ी देशों के लिए यह एक पेचीदा मामला बनता जा रहा है। तकनीकी रूप से वे अपनी जमीन पर अमेरिकी ठिकानों के जरिए युद्ध में अप्रत्यक्ष तौर पर शामिल हैं, लेकिन सीधे ईरान पर हमला करने पर वे औपचारिक रूप से लड़ाई का एक पक्ष बन जाएंगे। और वे फिलहाल, ऐसा नहीं चाहते।

अबु धाबी पर भी बरसे ईरानी ड्रोन

ईरान के खिलाफ बढ़ता दबाव

कुवैत विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर बदर अल‑सैफ का मानना है कि खाड़ी देशों के लिए सबसे बड़ा डर ईरान के अंदर सरकार बदलने की संभावना से जुड़ा है, न कि उसकी वर्तमान शिया गठबंधन आधारित सरकार के प्रति किसी लगाव से। अफगानिस्तान और इराक में सत्ता बदल के अनुभव दिखाते हैं कि अगर किसी बड़े और जटिल समाज (जहां आबादी लगभग 9 करोड़ है) में राजनीतिक अस्थिरता फैलती है तो लंबे समय तक अफरातफरी, शरणार्थियों का आना, मिलिशिया का फैलाव और छद्म युद्ध जैसी समस्याएं उठ खड़ी होती हैं, ये स्थिति खाड़ी देशों के लिए सीधा खतरा बन सकती है। इसीलिए, ,खाड़ी देश अब तक ईरान के विरुद्ध व्यापक सैन्य अभियान छेड़ने में जल्दबाजी नहीं दिखा रहे। उनकी प्राथमिकता “डी‑एस्केलेशन” पर केन्द्रित है। यह बात सही है कि ईरानी हमले की जद में आए सभी खाड़ी देशों में प्रत्युत्तर देने का दबाव बढ़ रहा है, लेकिन देखना होगा कि यह दबाव ‘संयम’ को कब तक थाम कर रख पाएगा!

 

Topics: खाड़ी देशtrumpdubaiisraelसंयुक्त अरब अमीरातnetyanahumissile attackइस्राएलgulf countriesQatarसऊदी अरबabu dhabiईरानAmerica Iran attackUAE
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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