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छत्तीसगढ़ : बाहरी गांव से बाहर ही

छत्तीसगढ़ में गांवों की सीमा पर लगे 'चेतावनी बोर्ड' को सर्वोच्च न्यायालय ने माना सही। इसके साथ ही कहा कि कहा कि स्थानीय ग्राम सभाएं पेसा कानून-1996 के अंतर्गत अपनी परंपराओं को बचाने के लिए बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा सकती हैं

Written byरजनी प्रकाशरजनी प्रकाश
Mar 3, 2026, 03:39 pm IST
in भारत, विश्लेषण, छत्तीसगढ़

लोभ-लालच से हिंदुओं को ईसाई या मुसलमान बनाने वालों को 17 फरवरी को जबर्दस्त झटका लगा। सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे लोगों की एक याचिका को खारिज करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ में जनजातीय गांवों में ईसाई मिशनरियों और बाहरी पादरियों के प्रवेश पर रोक जारी रहेगी। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने इससे संबंधित एक याचिका को खारिज करते हुए कहा कि ग्राम सभाओं को यह अधिकार है कि वे अपनी संस्कृति और परंपरा की रक्षा के लिए कदम उठा सकती हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के उस विचार को सही करार दिया, जिसमें ‘लालच और धोखाधड़ी’ द्वारा कन्वर्जन कराए जाने को रोकने के लिए ‘चेतावनी बोर्ड’ लगाने को असंवैधानिक नहीं माना था।

सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि यह मामला सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। इसमें किसी भी मत-पंथ को मानने की स्वतंत्रता के उल्लंघन जैसी बात नहीं है। स्थानीय ग्राम सभाएं पेसा कानून-1996 के अंतर्गत अपनी परंपराओं को बचाने के लिए बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा सकती हैं। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि अगर जनजातीय लोगों की परंपरा और संस्कृति की रक्षा के लिए ‘बाहरी हस्तक्षेप’ को रोकना और नियंत्रित करना आवश्यक है, तो ऐसा किया जा सकता है। अगस्त, 2025 में छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले की 14 ग्राम सभाओं (कुड़ाल, सुलंगी, घोटिया, जुनवानी, जनकपुर, चारभाठा, हवेचूर, बोटेचांग, मुसुरपुट्टा, टेकाठोड़ा, घोटा, जामगांव और परवी) ने अपनी सीमाओं पर ईसाई मिशनरियों के विरुद्ध ‘चेतावनी बोर्ड’ लगाए थे। उनमें ‘जबरन और प्रलोभन आधारित कन्वर्जन’ के विरुद्ध वैधानिक चेतावनी दी गई थी।

चेतावनी बोर्ड लगाने से पहले ग्राम की प्रथम प्रमुख देवी मां शीतला के मंदिर में विशेष बैठक आयोजित हुई। इसमें सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि कन्वर्जन कराने वाले पादरियों को गांव में प्रवेश नहीं दिया जाएगा। इसके साथ ही कुछ प्रस्ताव पारित किए गए। एक प्रस्ताव में कहा गया कि गांव की सीमा के प्रवेश द्वार पर बोर्ड लगाया जाएगा। दूसरे प्रस्ताव में कहा गया कि ग्राम का व्यक्ति कन्वर्जन में सम्मिलित पाया जाता है तो उसके विरुद्ध ग्राम सभा कड़ी से कड़ी कार्रवाई करेगी। कन्वर्जन से जुड़ी हर गतिविधि गांव में प्रतिबंधित रहेगी।

जैसे ही इन प्रस्तावों की जानकारी कन्वर्जन करने वाले लोगों और संस्थाओं को हुई, वे इसके विरोध में उतर आए। यही नहीं, इनके विरुद्ध भ्रम फैलाने लगे। कहीं-कहीं तो जनजातियों पर दबाव डाला गया कि वे प्रस्तावों को वापस ले लेें। उनकी हरकतों की जानकारी राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को दी गई। आयोग ने बिना देर किए अपने वरिष्ठ सलाहकार एवं पूर्व न्यायाधीश प्रकाश कुमार उइके को बस्तर भेजा। उन्होंने ग्रामीणों से बात की और आश्वस्त किया कि जो भी प्रस्ताव पारित हुए हैं, वे सभी कानूनी रूप से सही हैं। उन्होंने ग्रामीणों को बताया कि पेसा कानून के तहत आपको ये सभी अधिकार मिले हैं। इससे ग्रामीणों का हौंसला बढ़ा और उन्होंने प्रस्तावों को वापस लेने से मना कर दिया।

जनसांख्यिकीय संकट और सांख्यिकीय सत्य

2011 की जनगणना में ईसाई जनसंख्या 1.92 प्रतिशत थी, लेकिन हालिया क्षेत्रीय आंकड़े चौकाने वाले हैं। बस्तर और जशपुर के कई क्षेत्रों में ईसाई आबादी में 41 प्रतिशत तक की असामान्य वृद्धि देखी गई है। संभाग के कई गांव जैसे भूमियाबेड़ा, ओरछा और चिपरेल में ईसाइयों की जनसंख्या 90 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। फरवरी, 2026 में छत्तीसगढ़ विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो वर्ष में अवैध कन्वर्जन की 100 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुईं, जिनमें से 44 प्रकरणों में औपचारिक एफ.आई.आर. दर्ज की गई। सबसे गंभीर स्थिति ‘शव दफनाने’ के विवादों को लेकर उभरी है। 2025 में पूरे भारत में दर्ज ऐसे 23 विवादों में से 19 अकेले छत्तीसगढ़ में थे। यह दर्शाता है कि कन्वर्जन ने जनजातीय गांवों के सामाजिक ताने-बाने को किस सीमा तक छिन्न-भिन्न कर दिया है। इसी पृष्ठभूमि में पुराने कानून में संशोधन करते हुए राज्य सरकार ने ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य (संशोधन) विधेयक 2025’ प्रस्तावित किया है, जिसमें 10 वर्ष तक की जेल का कठोर प्रावधान है।

-डॉ. विश्वास कुमार चौहान

आ रही है जागृति

छत्तीसगढ के बस्तर संभाग को भारतीय संस्कृति की आत्मा और देवों की भूमि कहा जाता है। इस संभाग के अंतर्गत सात जिले-कांकेर, कोण्डागांव, नारायणपुर, बस्तर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा आते हैं। यह जनजाति बहुल क्षेत्र है। संपूर्ण बस्तर संभाग भारतीय संविधान के अंतर्गत अनुच्छेद 244(1) अर्थात पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यहां पेसा कानून लागू है। यह कानून जनजातियों की रूढ़ि प्रथा, परंपरा को संरक्षण व संवर्धन देता है। उन्हें पारंपरिक रूढ़ि न्याय व्यवस्था, ग्राम सभा, प्रकृति आधारित आदर्श जीवन-मूल्यों, संस्कृति, परपंरा, आस्था और सामुदायिक एकता व पहचान को बनाए रखने का अधिकार देता है। लेकिन बीते कुछ दशक से बस्तर के जनजाति कन्वर्जन और षड्यंत्र का शिकार हो रहे हैं। वे लोग अपनी अस्मिता, अस्तित्व और विकास के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कट्टर मुसलमान और ईसाई जनजाति क्षेत्रों में लव जिहाद, लैंड जिहाद कर रहे हैं। चेतावनी बोर्ड लगाने का प्रकरण बता रहा है कि अब लोग जाग रहे हैं।

इसके बाद छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में ईसाई मिशनरियों ने एक याचिका दायर की। उसमें ग्राम सभाओं को चेतावनी बोर्ड हटाने, आजादी से किसी के आने-जाने, गांवों में रहने वाले ईसाई पादरियों और लोगों को पूरी सुरक्षा देने आदि की मांग की गई थी। उच्च न्यायालय ने उस याचिका पर विचार किया और 28 अक्तूबर, 2025 को अपना निर्णय सुनाया। उस निर्णय में कई ऐसी बातें कही गई हैं, जिन्हें पूरे देश को जानना चाहिए। निर्णय में कहा गया है कि संविधान का अनुच्छेद 25 मजहब की आजादी तो पक्का करता है, लेकिन यह अधिकार पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं है। यह नैतिकता और सेहत के अधीन है।

इस अधिकार के गलत इस्तेमाल की संभावना को देखते हुए ओडिशा, मध्य प्रदेश, गुजरात और छत्तीसगढ़ जैसे कई राज्यों ने कन्वर्जन के खिलाफ कानून बनाए हैं। अपने मत को ‘बढ़ाने’ के अधिकार में किसी दूसरे व्यक्ति का धर्म बदलने का अधिकार शामिल नहीं है। चुनौती पांथिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक और सामाजिक एकता की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की है। कई जनजाति समूहों के लिए धर्म उनकी पुरानी परंपराओं और पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ा हुआ है। धर्म बदलने से यह जुड़ाव टूट जाता है। जनजातियों के कन्वर्जन करने से स्थानीय भाषाएं, रीति-रिवाज और आम कानून खत्म हो सकते हैं। इसके अलावा, सामाजिक अलगाव और बिखराव बढ़ता है। धर्म बदलने से जनसांख्यिकी बदलाव होता है। इससे मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। भारत का सेकुलर ताना-बाना साथ रहने और विविधताओं के सम्मान पर टिका है।

उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि पेसा एक्ट का नियम 129-सी ग्राम सभा की शक्तियों और कामों को बताता है। इसमें कहा गया है कि खंड 7 में दी गई शक्तियों और कामों के अलावा, अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा के पास लोगों की परंपराओं और रीति-रिवाजों, उनकी सांस्कृतिक पहचान और झगड़े सुलझाने के पारंपरिक तरीके को सुरक्षित रखने और बचाने की शक्ति होगी। न्यायालय ने कहा कि हमें कोई शक नहीं है कि अनुच्छेद 25 (1) में ‘प्रोपेगेट’ शब्द का इस्तेमाल इसी मतलब में किया गया है, क्योंकि यह अनुच्छेद किसी दूसरे व्यक्ति को अपने मत में बदलने का अधिकार नहीं देता, बल्कि अपने मत की बातों को बताकर उसे दूसरों तक पहुंचाने या फैलाने का अधिकार देता है। यह याद रखना होगा कि अनुच्छेद 25 (1) हर नागरिक को ‘अंतरात्मा की आजादी’ की गारंटी देता है, न कि सिर्फ एक खास मत को मानने वालों को।

न्यायालय ने कहा कि लालच या धोखे से या जबरन धर्म बदलने से रोकने के लिए चेतावनी बोर्ड लगाना गैर-कानूनी नहीं कहा जा सकता। ऐसा लगता है कि चेतावनी बोर्ड संबंधित ग्राम सभाओं ने स्थानीय जनजातियों और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत के हितों की रक्षा के लिए एहतियात के तौर पर लगाए हैं। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में हारने के बाद मिशनरी से जुड़े लोग सर्वोच्च न्यायालय पहुंचे। याचिकाकर्ता डिगबल टांडी ने उच्च न्यायालय के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। सर्वोच्च न्यायालय ने 16 फरवरी को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के निर्णय को सही मानते हुए याचिका को कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 25 के अंतर्गत ‘रिलीजन’ का प्रचार करने के अधिकार का अर्थ किसी अन्य व्यक्ति को अपने ‘रिलीजन’ में परिवर्तित करने का मौलिक अधिकार नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति छल, बल या कपट से दूसरे का मत बदलता है, तो वह संविधान प्रदत्त ‘अंतःकरण की स्वतंत्रता’ का हनन करता है।

Topics: पाञ्चजन्य विशेषसांस्कृतिक पहचानमतांतरण (कन्वर्जन)पेसा कानूनग्राम सभाप्रलोभन और धोखाधड़ीजनसांख्यिकीय संकटसर्वोच्च न्यायालयअन्तःकरण की स्वतंत्रताSupreme Courtअसंवैधानिकreligious conversion
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