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मर्यादा लांघती कांग्रेस

कांग्रेस का एआई समिट में अर्धनग्न हंगामा, संसद में महिला सांसदों से प्रधानमंत्री की कुर्सी का घेराव कराना और राहुल गांधी द्वारा का पूर्व सेना प्रमुख की अप्रकाशित पुस्तक पर विवाद खड़ा करने की कोशिश, केवल हताशा नहीं है। कांग्रेस की ये हरकतें बताती हैं कि वह सत्ता पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है

Written byरमेश शर्मारमेश शर्मा
Mar 2, 2026, 11:30 pm IST
in दिल्ली

कांग्रेस के नेता कांग्रेस ने तो बहुत पहले ही अपनी राजनीतिक गरिमा और संसदीय मर्यादा का त्याग कर दिया था, अब वह राष्ट्रीय हितों और भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी आघात करने लगी है। दिल्ली में एआई इम्पैक्ट समिट-2026 के दौरान हुए कांग्रेस का ‘अर्धनग्न’ प्रदर्शन और ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा का बयान इसी श्रेणी में आता है। ढिठाई की पराकाष्ठा देखिए, अपने सहयोगी दलों और न्यायालय द्वारा अनुचित ठहराए जाने के बाद भी कांग्रेस इस कृत्य को अपना अधिकार ठहराने पर आमादा है।

सामान्यतः माना जाता है कि लक्ष्य पूर्ति में लगातार असफलता व्यक्ति को अवसाद में डुबो देती है, जिससे मनोरोग जन्म लेते हैं। कुछ तो ऐसी विक्षिप्त अवस्था में पहुंच जाते हैं कि सार्वजनिक स्थलों पर अर्धनग्न होकर चिल्लाने लगते हैं, जिससे लोगों का ध्यान उसकी ओर चला जाता है। सामान्य बोलचाल में इसे ‘विक्षिप्तता’ कहा जाता है। एआई इम्पैक्ट समिट के दौरान युवा कांग्रेस नेताओं का अर्धनग्न हंगामा भी ऐसा ही था। जनमानस और सोशल मीडिया में इसे ‘नंगई’ प्रदर्शन कहा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया भी यही रही।
बड़े षड्यंत्र का हिस्सा तो नहीं!

कांग्रेस की युवा टोली द्वारा सुरक्षा घेरा तोड़कर एआई समिट में प्रवेश करना, एक जैसी शर्ट उतारकर लहराना और हंगामा करना, सामान्य राजनीतिक प्रदर्शन नहीं माना जा रहा। आलोचकों के अनुसार यह सत्ता के लिए अपनाई जा रही नकारात्मक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। इस अर्धनग्न प्रदर्शन में शामिल लोग अलग-अलग राज्यों से आए थे। सबकी शर्ट एक जैसी थी, जिस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चित्र छपे थे। यह संकेत है कि पूरी तैयारी की गई थी। अब तक 10 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। शेष की पहचान की जा रही है।

इनमें भारतीय युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय भानु चिब को मुख्य साजिशकर्ता के रूप में गिरफ्तार कर दिल्ली पुलिस ने पटियाला हाउस कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे पुलिस रिमांड पर भेजा गया है। इसके अलावा, कृष्ण हरि (दिल्ली), कुंदन यादव (बिहार), अजय कुमार (उत्तर प्रदेश), नरसिम्हा यादव (तेलंगाना), राजा गुर्जर और अजय कुमार (मध्य प्रदेश) के हैं। हिमाचल प्रदेश से हिरासत में लिए गए सिद्धार्थ, सौरभ और अरबाज को दिल्ली कोर्ट में पुलिस हिरासत में भेजा गया है। आलम यह था कि तीनों को गिरफ्तार करने जब दिल्ली पुलिस हिमाचल पहुंची तो स्थानीय पुलिस ही उससे भिड़ गई।

आरोप जमानती होने के बावजूद न्यायालय ने इसे गंभीर मानते हुए आरोपियों को पांच दिन के पुलिस रिमांड में भेज दिया। साथ ही, न्यायालय ने कहा, ‘‘अंतरराष्ट्रीय मंच पर सार्वजनिक व्यवस्था और राज्य की सुरक्षा से जुड़े ऐसे मामलों की कड़ी जांच आवश्यक है। इस विरोध ने न केवल कार्यक्रम की पवित्रता, बल्कि देश की कूटनीतिक छवि को भी खतरे में डाला।’’ अदालत ने कहा कि आरोपियों ने एआई समिट के दौरान उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्र में सुनियोजित घुसपैठ की, जबकि यह एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन था, जिसमें विश्वभर से प्रतिनिधि शामिल थे। ऐसा आचरण वैध असहमति की सीमा से परे है। न्यायालय ने यह आशंका भी व्यक्त की कि आरोपियों के कुछ साथी फरार हो सकते हैं और डिजिटल साक्ष्यों, वित्तीय लेनदेन या सह-आरोपितों से जुड़ी जानकारी से छेड़छाड़ संभव है। इसलिए मामले की विस्तृत जांच आवश्यक है।

चौतरफा छीछालेदर के बावजूद कांग्रेस अड़ी हुई है और इसे राजनीतिक प्रदर्शन का अधिकार बता रही है। अंतरराष्ट्रीय अतिथियों के सामने हुए हंगामे के बारे में कहा जा रहा है कि कांग्रेस देश में नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसा वातावरण बनाना चाहती है। आलोचकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन राजनीतिक मंच नहीं, बल्कि देश की प्रतिष्ठा बढ़ाने के अवसर होते हैं। ऐसे समय, जब भारत तकनीक और एआई क्षेत्र में वैश्विक आकर्षण का केंद्र बना है, इस घटना ने उपलब्धियों से अधिक हंगामे पर ध्यान खींचा। पुलिस की प्रारंभिक टिप्पणी में भी इसे ‘जेन-जी’ शैली की उकसावे वाली रणनीति से जोड़कर देखा गया है।

आलोचकों का कहना है कि कांग्रेस युवाओं के बीच असंतोष का माहौल बनाने का प्रयास कर रही है। इसी संदर्भ में सैम पित्रोदा का एक बयान चर्चा में आया, जिसमें उन्होंने कहा कि भारत ने बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली युवा तैयार किए, पर उनका उपयोग मुख्यतः विदेशी कंपनियों के लिए हुआ। भारत ने अपने वैश्विक स्तर के उत्पाद, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म या ऑपरेटिंग सिस्टम विकसित नहीं किए। शर्म की बात है कि 1.5 अरब आबादी वाले देश ने अपने टैलेंट को दूसरों की सेवा के लिए उपयोग किया है। उनके इस वक्तव्य को कई लोगों ने तथ्यात्मक रूप से गलत बताया है। भाजपा नेता शहजाद पूनावाला ने इसका खंडन करते हुए भारतीय कंपनियों और उत्पादों के उदाहरण गिनाए। बावजूद इसके, कांग्रेस के कुछ नेताओं ने पित्रोदा के बयान का समर्थन कर झूठ को सच साबित करने का प्रयास किया।

संसद की गरिमा भी ताक पर

कांग्रेस की स्थापना एक अंग्रेज अधिकारी ए.ओ. ह्यूम ने की थी, जिसका भारत की छवि या गरिमा से दूर-दूर तक कुछ लेना देना नहीं था। अंग्रेजों का उद्देश्य केवल सत्ता पाना था। इसलिए कांग्रेस की राजनीति में सत्ता-केंद्रित दृष्टि हावी रही है। समय के साथ उस पर वामपंथ का रंग चढ़ा। इसलिए जब सत्य, तथ्य और तर्क, तीनों कमजोर पड़ जाते हैं, तो वह आरोपों की धुंध फैलाती है। जब से कांग्रेस सत्ता से बेदखल हुई है, तब से वह इसी ढर्रे पर चल रही है ठोस तथ्य या नीति आधारित विमर्श के बजाय विरोध और नारे उछालती है। ‘चौकीदार चोर’ और ‘वोट-चोर’ जैसे नारे इसी प्रवृत्ति के उदाहरण हैं। कुछ मामलों में तो उसे अदालत में माफी भी मांगनी पड़ी। लेकिन अपनी गलतियों से सीख लेना, कांग्रेस कीआदत ही नहीं रही।

बजट सत्र में संसद में भी कांग्रेस नेताओं ने जो किया, उसने संसदीय गरिमा और आचरण, दोनों को चोट पहुंचाई। लोकसभा में सात महिला सांसदों के जरिये कांग्रेस ने हंगामे की पटकथा तैयार कर रखी थी। दरअसल, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलना था। जैसे ही पता लगा कि प्रधानमंत्री आने वाले हैं, कांग्रेस की महिला सांसद उनकी सीट के पास पहुंच गईं और उसे घेर कर नारेबाजी करने लगीं। बाद में वे सत्तापक्ष के सांसदों की ओर बढ़ी। इससे हंगामा मच गया और सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने स्थिति को भांपते हुए प्रधानमंत्री से सदन में न आने का आग्रह किया, अन्यथा प्रधानमंत्री मोदी सदन में आ जाते तो अप्रिय स्थिति बन सकती थी। बाद में असंसदीय आचरण के कारण आठ महिला सांसदों को निलंबित किया गया, जिनमें एक कम्युनिस्ट पार्टी की थी। संसदीय इतिहास की यह पहली घटना है, जब विपक्ष के व्यवधान के कारण लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रधानमंत्री का उत्तर नहीं हो सका।

दूसरी घटना। निलंबित सांसदों की बहाली के लिए संसदीय परिसर में कांग्रेस का धरना चल रहा था। उसी समय भाजपा के राज्यसभा सांसद रवनीत बिट्टू का आगमन हुआ। राहुल गांधी ने उन्हें ‘ट्रेटर फ्रेंड’ (गद्दार दोस्त) कहा तो कांग्रेसियों ने ठहाके लगाए। बिट्टू तो कुछ नहीं बोले, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यसभा में 1984 सिख विरोधी दंगों का जिक्र कर कांग्रेस की सिख-विरोधी मानसिकता पर प्रहार किया। राजनीतिक आकलन भले जो हो, ये घटनाएं सामाजिक विद्वेष बढ़ाने वाली और संसदीय गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली हैं।

कांग्रेस देश पर बोझ

संसद में कांग्रेस की मर्यादाहीनता व एआई इम्पैक्ट समिट में अर्धनग्न हंगामे पर देशभर में फजीहत हुई। जवाब में भाजपा नेताओं की प्रतिक्रियाएं आईं और पार्टी ने कांग्रेस कार्यालय में प्रदर्शन भी किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ‘राजनीति की नग्नता’ करार देते हुए पाप और देश विरोधी कार्रवाई बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए जनता का विश्वास हासिल करना जरूरी होता है, लेकिन कांग्रेस तो जहरीली और देश विरोधी राजनीति कर रही है। वह देश पर बोझ बन गई है। विश्व स्तर पर भारत की तकनीकी क्षमता दिखाने के अवसर पर कांग्रेस के हंगामे ने देश की छवि धूमिल की।

अंतरराष्ट्रीय अतिथियों के सामने भारत की छवि खराब करने पर प्रधानमंत्री मोदी का दुख भी स्पष्ट झलका। इसलिए उन्हें कहना पड़ा कि जहां भारत तकनीकी क्षमता दिखा रहा था, वहां कांग्रेस के ‘अराजक’ नेताओं ने देश को बदनाम करने की कोशिश की। उन्होंने उन विपक्षी दलों का आभार माना, जिन्होंने कांग्रेस के एआई समिट हंगामे से दूरी बनाई। उन्होंने कहा, ‘‘मुझे खुशी है कि दिल्ली में हुई शर्मनाक घटना के बाद अन्य विपक्षी सहयोगी दलों ने कांग्रेस की खुलकर आलोचना करने का साहस दिखाया है। टीएमसी, डीएमके, बीएसपी नेशनल कांफ्रेंस जैसी पार्टियों की इसमें कोई भूमिका नहीं थी। मैं सच्चाई के साथ खड़े रहने के लिए इन सहयोगी दलों का सार्वजनिक रूप से धन्यवाद करता हूं।’’

इसी तरह, कांग्रेस ने भारत-अमेरिका ‘व्यापार समझौते’ को मुद्दा बनाने की कोशिश की, जिसे फिलहाल टाल दिया गया है। कांग्रेस ने किसानों को भड़काने की कोशिश की कि इस सौदे से उन्हें नुकसान होगा। इस पर सदन में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट कहा कि समझौते में किसानों के हितों का ख्याल रखा गया है।

उल्टा पड़ा दाव

परिहास में कहा जाता है कि राहुल बम तो मोदी सरकार पर फेंकते हैं, लेकिन फूटते तो कांग्रेस कैंप में ही हैं। बजट सत्र में राहुल ने पूर्व सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक लहराते हुए दावा किया, ‘चीन के पांच टैंक हिमालय रेंज में 500 मीटर अंदर आ गए थे। आगे बोलूंगा तो पीएम व रक्षामंत्री की पोल खुल जाएगी।’ इतना कहकर वे रुक जाते, जिससे सदन में हंगामा होता और कार्यवाही स्थगित हो जाती। बाद में नरवणे ने भी राहुल केे दावों को खारिज किया।

राहुल का दाव तब उल्टा पड़ गया, जब भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने एक-एक कर सदन में छह प्रकाशित पुस्तकें दिखाईं, जो नेहरू-गांधी परिवार की नीतियों व निजी जीवन पर केंद्रित हैं। इनमें एम.ओ. मथाई की ‘Reminiscences of the Nehru Age’ (इंदिरा गांधी के साथ संबंध), जेवियर मोरो की ‘The Red Sari’ (सोनिया गांधी का जीवन), ‘एडविना एंड नेहरू’ (नेहरू-एडविना संबंध व प्रभावित निर्णय), जनरल एस.पी.पी. थोराट की ‘Rebels Retreat 1962’ (नेहरू द्वारा चीन हमले की अनदेखी) व कैथरीन फ्रैंक की ‘Indira: The Life of Indira Nehru Gandhi’ शामिल थीं। इस पर हंगामा स्वाभाविक था।

लोकतंत्र में असहमति का अधिकार मूलभूत है, पर उसकी अभिव्यक्ति की भी मर्यादा होती है। जब विरोध प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय मंचों, संसद की गरिमा और राष्ट्रीय छवि से टकराने लगें, तो वे केवल राजनीतिक नहीं रह जाते, वे व्यापक संदेश भी देते हैं। एआई समिट से लेकर संसद तक घटी घटनाओं ने यही प्रश्न खड़ा किया है कि क्या तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए संस्थाओं की प्रतिष्ठा और देश की छवि दांव पर लगाई जानी चाहिए?

शर्मनाक हरकत

देशभर के 150 से अधिक शिक्षाविदों, कुलपतियों, निदेशकों एवं शोधकर्ताओं ने इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में युवा कांग्रेस के अर्धनग्न प्रदर्शन की कड़ी भर्त्सना की। उन्होंने सामूहिक बयान जारी कर इसे वैश्विक मंच पर भारत की तकनीकी छवि को धूमिल करने वाला बताया। अकादमिक वर्ग का कहना है कि ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन भारत के एआई नेतृत्व को प्रदर्शित करने का अवसर था, लेकिन कांग्रेस के व्यवधान से अंतरराष्ट्रीय साख को ठेस पहुंची। बुद्धिजीवियों ने स्पष्ट किया कि इसे ‘लोकतांत्रिक विरोध’ नहीं, बल्कि गैर-जिम्मेदाराना ड्रामेबाजी थी। अकादमिक जगत ने कांग्रेस की हरकत को दुर्भावनापूर्ण व शर्मनाम करार दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि एक गौरवशाली राष्ट्रीय मंच को दलीय राजनीति और ड्रामेबाजी का अखाड़ा बनाना कांग्रेस की समझ और राष्ट्रीय हितों के प्रति उसकी उदासीनता को दर्शाता है।

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