एलन ट्यूरिंग ने 1950 में अपने प्रसिद्ध शोधपत्र ‘Computing Machinery and Intelligence’ में एक सरल, पर गहरा प्रश्न उठाया था। क्या मशीनें सोच सकती हैं? इसे परखने के लिए उन्होंने एक परीक्षण भी प्रस्तावित किया था, जिसे ‘ट्यूरिंग टेस्ट’ के नाम से जाना जाता है। इस परीक्षण का उद्देश्य यह जानना था कि क्या कोई मशीन मानव की तरह इतनी स्वाभाविक बातचीत कर सकती है कि व्यक्ति उसके और इनसान के बीच अंतर न कर पाए। कुछ वर्ष बाद, 1956 में डार्टमाउथ कॉलेज में आयोजित एक शोध सम्मेलन के दौरान ‘कृत्रिम बुद्धिमता (एआई)’ शब्द को औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया गया। जो विचार कभी एक दार्शनिक बहस के रूप में शुरू हुआ था, वह धीरे-धीरे हमारे समय की सबसे शक्तिशाली तकनीकी क्रांतियों में से एक में बदल गया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता भले ही हाल के वर्षों की देन प्रतीत होती हो, लेकिन इसकी जड़ें दशकों पुरानी हैं।

ऐसे काम करता है एआई
कृत्रिम बुद्धिमत्ता को एक उदाहरण से समझें। दुनिया में कुत्तों की लगभग 336 मान्यताप्राप्त नस्लें हैं। हममें से अधिकांश लोगों ने शायद उनमें से केवल 30 या 40 ही देखी होंगी। अब कल्पना कीजिए कि आप किसी शांत सड़क पर चल रहे हैं और अचानक एक अपरिचित जानवर आपकी ओर दौड़ता हुआ आता है। आपने उस नस्ल को पहले कभी नहीं देखा है, फिर भी एक क्षण में आपका मन कह देता है-यह एक कुत्ता है। आपने इसका सचेत रूप से विश्लेषण नहीं किया। आपके मस्तिष्क ने उसके कान-पूंछ, चाल-ढाल और हाव-भाव की तुलना अपने पिछले अनुभवों में संचित पैटर्न से की। यही त्वरित पैटर्न पहचानने की क्षमता ही बुद्धिमत्ता कहलाती है।
अब कल्पना कीजिए कि आप एक कंप्यूटर प्रोग्राम लिखते हैं। आप उसमें कुत्तों की 30 नस्लों की तस्वीरें डालते हैं और फिर उसे 31वीं ऐसी नस्ल की तस्वीर दिखाते हैं, जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा। एक पारंपरिक प्रोग्राम इस स्थिति में संघर्ष करेगा, जब तक कि आपने हर संभव भिन्नता के लिए विस्तार से नियम न लिख दिए हों। पारंपरिक कंप्यूटर वही करते हैं, जो उन्हें बताया जाता है। वे केवल निर्देशों का पालन करते हैं। वे अपनी प्रोग्रामिंग से आगे बढ़कर स्वयं कोई निष्कर्ष नहीं निकालते।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता इसी अंतर को पाटने का प्रयास करती है। मशीन को हर कदम पर निर्देश देने के बजाय, हम उसे उदाहरणों से सीखने का अवसर देते हैं। हम उसे डेटा प्रदान करते हैं। वह उसमें पैटर्न पहचानती है और अपने आंतरिक मानकों (पैरामीटर) को समायोजित करती है। समय के साथ वह ऐसी नई चीजों को भी पहचानने में सक्षम हो जाती है, जो पहले देखी गई चीजों से मिलती-जुलती हों। सरल शब्दों में, एआई का अर्थ है मशीनों को केवल आदेश मानने के बजाय अनुभव से सीखना सिखाना।
आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता के पीछे की प्रमुख तकनीकों में से एक है न्यूरल नेटवर्क। यह मानव मस्तिष्क के न्यूरॉनों से प्रेरित है। न्यूरल नेटवर्क आपस में जुड़े कई स्तरों (लेयर्स) से मिलकर बनते हैं, जो जानकारी को संसाधित करते हैं। प्रारंभिक स्तर सरल विशेषताओं की पहचान करते हैं, जबकि गहरे स्तर उन्हीं विशेषताओं को मिलाकर अधिक जटिल पैटर्न बनाते हैं। जब इन्हें विशाल डेटा-संग्रह पर प्रशिक्षित किया जाता है, तो ये प्रणालियां चेहरों की पहचान कर सकती हैं, भाषाओं का अनुवाद कर सकती हैं, धोखाधड़ी का पता लगा सकती हैं, उत्पादों की सिफारिश कर सकती हैं और डॉक्टरों को बीमारियों की पहचान में सहायता प्रदान कर सकती हैं।
बढ़ता दायरा और जोखिम
आज, हम जो अधिकांश एआई का उपयोग करते हैं, वह संकीर्ण एआई है। यह विशेष कार्यों को बेहद दक्षता के साथ पूरा करता है। उदाहरण के लिए, एक स्पैम फ़िल्टर अनचाहे ईमेल पहचानता है। एक नेविगेशन ऐप ट्रैफिक का अनुमान लगाता है। एक बैंकिंग प्रणाली संदिग्ध लेन-देन को चिह्नित करती है। इसके बाद आया जनरेटिव एआई। ChatGPT जैसे सिस्टम निबंध लिख सकते हैं, प्रश्नों के उत्तर दे सकते हैं, कोड तैयार कर सकते हैं और बातचीत का अनुकरण कर सकते हैं। इमेज जनरेटर केवल एक साधारण विवरण के आधार पर कलाकृति बना सकते हैं। ये उपकरण विशाल मात्रा में डेटा पर प्रशिक्षित होते हैं और भाषा तथा दृश्य सामग्री के भीतर छिपे पैटर्न को सीखते हैं। इसके आगे आता है सुपर एआई का विचार। ऐसी सैद्धांतिक बुद्धिमत्ता, जो हर क्षेत्र में मानव से आगे निकल जाए। यह अभी केवल कल्पना और शोध का विषय है, लेकिन यह नैतिकता और शासन से जुड़े गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
आज एआई हमारे दैनिक जीवन में गहराई से समाहित हो चुका है। किसान मिट्टी और फसल के स्वास्थ्य की निगरानी के लिए एआई-संचालित उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं। डॉक्टर चिकित्सीय स्कैन के विश्लेषण में सहायता के लिए एआई प्रणालियों पर निर्भर हैं। व्यवसाय ग्राहक सेवा के लिए एआई चैटबॉट्स का उपयोग करते हैं। सरकारें यातायात प्रबंधन और धोखाधड़ी की पहचान के लिए एआई का प्रयोग कर रही हैं। हम जितना समझते हैं, उससे कहीं अधिक बार हम एआई के साथ संपर्क में आते हैं। लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है। कल्पना कीजिए, एक व्यवसायी को एक वीडियो कॉल आती है। स्क्रीन पर व्यक्ति बिल्कुल उसके वित्त प्रबंधक जैसा दिखता है। आवाज भी पूरी तरह मेल खाती है। अनुरोध अत्यंत तात्कालिक और विश्वसनीय प्रतीत होता है, तुरंत धनराशि स्थानांतरित करनी है। वह बिना संदेह किए पैसा ट्रांसफर कर देता है। बाद में उसे पता चलता है कि उसका वास्तविक वित्त प्रबंधक तो कहीं और था। वह वीडियो डीपफेक तकनीक से बनाया गया था। आवाज की नकल की गई थी। और तब तक पैसा जा चुका था।
यह साइबर अपराध का नया चेहरा है। ओपन-सोर्स एआई उपकरणों ने नवाचार को लोकतांत्रिक बना दिया है। अब कोई भी व्यक्ति प्रयोग कर सकता है, प्रणालियां बना सकता है और उन्हें बेहतर बना सकता है। लेकिन यही खुलापन अपराधियों को इन उपकरणों का दुरुपयोग करने का अवसर भी देता है। OpenClaw जैसे आक्रामक ढांचे यह दिखाते हैं कि एआई किस प्रकार कमजोरियों की स्वचालित जांच, फिशिंग ईमेल तैयार करने और यहां तक कि दुर्भावनापूर्ण कोड उत्पन्न करने में सहायता कर सकता है। अब सीमित तकनीकी ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी एआई के मार्गदर्शन से जटिल और परिष्कृत साइबर हमले को अंजाम दे सकता है।
भविष्य को देखते हुए, साइबर खतरे और अधिक व्यक्तिगत तथा विश्वसनीय बनने की संभावना है। एआई सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी एकत्र कर सकती है और आपके पेशे, रुचियों तथा हाल की गतिविधियों के अनुसार विशेष रूप से तैयार किए गए फिशिंग संदेश बना सकती है। आवाज की नकल करने वाली तकनीक परिवार के सदस्यों की आवाज तक की हू-ब-हू नकल कर सकती है। वास्तविक और कृत्रिम डेटा को मिलाकर बनाई गई सिंथेटिक पहचानें पारंपरिक सत्यापन प्रणालियों को भी धोखा दे सकती हैं।
रैनसमवेयर भी पहचान से बचने के लिए स्वयं को परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है। ये धोखाधड़ी इसलिए सफल होती हैं, क्योंकि ये मानव मनोविज्ञान का फायदा उठाती हैं। तात्कालिकता भय और घबराहट पैदा करती है। अधिकार पालन करने का दबाव बनाता है। मेल-जोल विश्वास जगाता है। एआई इन भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को और भी प्रभावशाली बना देता है। जब कोई धोखाधड़ी वाला संदेश आपके वास्तविक विवरणों के साथ आता है, तो यह असली जैसा महसूस होता है। इन मनोवैज्ञानिक तरीकों के प्रति जागरूक रहना तकनीकी सुरक्षा उपायों के बराबर महत्वपूर्ण है।

पारदर्शिता और जवाबदेही
एआई का एक राष्ट्रीय पहलू भी है। देश एआई शोध और इसके उपयोग में तीव्र प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। एआई संचालित निगरानी, स्वायत्त प्रणालियां और साइबर युद्ध क्षमताएं राष्ट्रीय सुरक्षा की रणनीतियों को नया रूप दे रही हैं। जनरेटिव एआई से संचालित भ्रामक सूचना अभियान बड़े पैमाने पर जनता की राय को प्रभावित कर सकते हैं। डिजिटल युद्धभूमि में अब केवल सैनिक नहीं, बल्कि एल्गोरिदम और नैरेटिव भी शामिल हैं।
इसलिए नैतिकता सबसे केंद्रीय विषय बन जाती है। यदि कोई एआई प्रणाली पक्षपाती डेटा के कारण किसी व्यक्ति का ऋ ण अनुचित रूप से अस्वीकृत कर देती है, तो जिम्मेदार कौन है? यदि चेहरे की पहचान किसी व्यक्ति की गलत पहचान कर देती है, तो गलती का उत्तरदाता कौन होगा? एआई सिस्टम डेटा से सीखते हैं। यदि डेटा में ऐतिहासिक पक्षपात मौजूद है, तो उसका परिणाम और भी बढ़ सकता है। यही कारण है कि एआई के संचालन में पारदर्शिता, व्याख्यात्मकता और जवाबदेही अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हम इन प्रणालियों को रहस्यमय ‘ब्लैक बॉक्स’ की तरह नहीं देख सकते।
रोजगार का प्रश्न भी ईमानदारी से विचारणीय है। एआई केवल एक रात में नौकरियां समाप्त नहीं कर देगा। यह उन्हें रूपांतरित करेगा। दोहराए जाने वाले मानसिक कार्य कम हो सकते हैं, जबकि रचनात्मकता, सहानुभूति और नैतिक निर्णय वाले कार्यों का महत्व बढ़ सकता है। भविष्य की कार्यशक्ति को एआई के साथ प्रतिस्पर्धा करने के बजाय सहयोग करना सीखना होगा। अनुकूलनशीलता और सतत सीखने की क्षमता ही पेशेवर सफलता की पहचान होगी। इस परिवेश में, एआई साक्षरता एक मूलभूत जीवन कौशल बननी चाहिए। लोगों को केवल एआई उपकरणों का उपयोग करना ही नहीं, बल्कि उनकी सीमाओं को समझना भी जरूरी है। स्वचालित परिणामों पर सवाल उठाना और उनकी पुष्टि करना आवश्यक है। एल्गोरिथमिक निर्णयों में अंधविश्वास करना खतरनाक हो सकता है।
सुरक्षा जरूरी
अब सुरक्षा पर ध्यान दें। हर डिवाइस में भरोसेमंद सुरक्षा सॉफ्टवेयर स्थापित होना चाहिए और इसे नियमित रूप से अपडेट करना चाहिए। महत्वपूर्ण अकाउंट्स के लिए दो-चरणों वाला प्रमाणीकरण सक्षम किया जाना चाहिए। ऑपरेटिंग सिस्टम और एप्लिकेशन समय पर अपडेट किए जाने चाहिए, क्योंकि अपडेट अक्सर कमजोरियों को ठीक करते हैं। सार्वजनिक वाई-फाई नेटवर्क का उपयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए, विशेष रूप से वित्तीय लेन-देन के लिए। अलग-अलग सेवाओं के लिए मजबूत और अद्वितीय पासवर्ड बनाए रखना चाहिए।
भारत में नागरिकों के पास कई आधिकारिक सुरक्षा तंत्र उपलब्ध हैं। नेशनल साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में तुरंत सहायता प्रदान करती है। जल्दी रिपोर्ट करने से लेन-देन को रोकने में मदद मिल सकती है। नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पीड़ितों को ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने की सुविधा देता है। चक्षु (Chakshu) सुविधा संदिग्ध संचार की रिपोर्ट करने में मदद करती है। संचार साथी पोर्टल व्यक्तियों को उनके आधार से जुड़े मोबाइल नंबर की जांच करने और खोए या चोरी हुए फोन को आईएमईआई नंबर निष्क्रिय करके ब्लॉक करने की सुविधा देता है।
डेटा उल्लंघन भी एक बढ़ती चिंता का विषय है। दुनिया भर की बड़ी संस्थाओं में ऐसे रिसाव हुए हैं, जिन्होंने लाखों उपयोगकर्ताओं के रिकॉर्ड उजागर कर दिए। व्यक्तियों को समय-समय पर यह जांचना चाहिए कि क्या उनका ईमेल पता किसी उल्लंघन में शामिल तो नहीं हुआ, इसके लिए विश्वसनीय breach notification services का उपयोग किया जा सकता है। यदि किसी उल्लंघन का पता चलता है, तो तुरंत पासवर्ड बदलना चाहिए और जहां संभव हो, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन सक्षम करना चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि एआई सुरक्षा का भी हिस्सा है। बैंक एआई का उपयोग असामान्य लेन-देन को सेकंडों में पहचानने के लिए करते हैं। साइबर सुरक्षा कंपनियां मशीन लर्निंग सिस्टम का उपयोग असामान्य नेटवर्क गतिविधि की निगरानी के लिए करती हैं। सरकारें एआई का उपयोग समन्वित साइबर हमलों की पहचान करने के लिए करती हैं। यानी वही तकनीक, जो हमलावरों को सशक्त बनाती है, वह रक्षकों को भी मजबूत कर सकती है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता जादू नहीं है। यह गणित और डेटा है, जो असाधारण पैमाने पर काम करता है। जब आपका मस्तिष्क किसी नए कुत्ते को पहचानता है, तो यह स्मृति से पैटर्न की तुलना करके जटिल मानसिक प्रक्रिया करता है। इसी तरह, जब कोई एआई प्रणाली किसी छवि की पहचान करती है, तो यह सीखे हुए पैरामीटर के बीच पैटर्न मिलान करती है। अंतर यह है कि मानव के पास संदर्भ, भावनाएं और नैतिक निर्णय होते हैं। मशीनों में ये नहीं होते।
हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जब तकनीक जनता की जागरूकता से तेजी से विकसित हो रही है। चुनौती यह नहीं है कि हम एआई से डरें, बल्कि यह है कि इसे समझें और जिम्मेदारी से उपयोग करें। जैसे-जैसे हम 2026 और उससे आगे बढ़ेंगे, एआई और साइबर सुरक्षा का संगम हमारे व्यक्तिगत सुरक्षा, हमारी अर्थव्यवस्थाओं और राष्ट्रीय स्थिरता को आकार देगा। स्मार्ट मशीनों का आना अवश्यंभावी है। असली सवाल यह है कि क्या हम समझदार डिजिटल नागरिक बनेंगे?
(लेखक साइबर कानून एवं साइबर सुरक्षा, विशेषज्ञ हैं)
एआई उपयोग के लिए नियम एवं दिशा-निर्देश
भारत सरकार ने एआई के उपयोग को सुरक्षित, नैतिक और जिम्मेदार बनाने के लिए नए नियम लागू किए हैं। इनके उल्लंघन पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान भी किया गया है-
- एआई या कम्प्यूटर द्वारा मोडिफेकशन करके यदि कोई कंटेंट बनाया जाता है तो उसे सिंथेटिकली जनरेटेड (एसजीआई) कंटेंट माना जाएगा। ऐसा कोई भी कंटेंट जो किसी वास्तविक व्यक्ति, घटना या स्थान जैसा प्रतीत हो, उसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म या इंटरनेट पर साझा करने से पहले उस पर ‘एआई-जनरेटेड’ वाटरमार्किंग या लेबलिंग जरूरी है।
- एक बार लेबल लगने पर उसे हटाया नहीं जा सकेगा। पहले लोग एआई से बनी फोटो का कोना काटकर या एडिटिंग करके उसका ‘वॉटरमार्क’ हटा देते थे। अब यह गैर-कानूनी होगा।
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को यूजर्स द्वारा अपलोड एआई जेनरेटेड कंटेंट को सत्यापित करने के लिए जरूरी टूल्स विकसित करने के निर्देश दिए गए हैं। यानी बिना सत्यापन ऐसे कंटेंट सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपलोड नहीं किए जा सकेंगे।
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को यह भी निर्देश दिया गया है कि वह अपने यूजर्स को हर तीन माह में चेतावनी
जारी करे कि एआई के दुरुपयोग पर जुर्माना या सजा हो सकती है। - किसी भ्रामक कंटेंट को सोशल मीडिया से हटाने के निर्देश जारी होने पर 3 घंटे में उसे हटाना होगा। पहले यह समयसीमा 36 घंटे की थी। साथ ही, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को कोडिंग का उपयोग करने को कहा गया है, ताकि पल चल सके कि एआई कंटेंट किसने बनाया है।
- बच्चों से जुड़े हिंसक और अश्लील वीडियो पर तुरंत कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है। साथ ही, रिस्पॉन्स की टाइमलाइन घटाकर 12 घंटे किया गया है।

















