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‘विजन ओडिशा को साकार करने के लिए विकास को सभ्यतागत मूल्यों से जोड़ना आवश्यक’

‘विजन ओडिशा 2036 एवं 2047’ जैसे महत्वाकांक्षी दस्तावेज़ को सफल बनाने के लिए हमें “औपनिवेशिक मानसिकता के हैंगओवर” से बाहर निकलना होगा।

Written byडॉ. समन्वय नंदडॉ. समन्वय नंद — edited by Lalit Fulara
Feb 27, 2026, 05:24 pm IST
inओडिशा

भुवनेश्वर: नीति-निर्माण में बुनियादी बदलाव की आवश्यकता पर बल देते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं आर्गनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर ने शुक्रवार को कहा कि ‘विजन ओडिशा 2036 एवं 2047’ जैसे महत्वाकांक्षी दस्तावेज़ को सफल बनाने के लिए हमें “औपनिवेशिक मानसिकता के हैंगओवर” से बाहर निकलना होगा और “वन-साइज़-फिट्स-ऑल” दृष्टिकोण को त्यागना होगा।

लोकसेवा भवन के कन्वेंशन सेंटर में आयोजित दो दिवसीय राज्य स्तरीय नीति परामर्श ‘विकास मंथन 1.0’ के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए केतकर ने कहा कि विजन दस्तावेज़ व्यापक और गतिशील है, किंतु इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम विकास की प्रक्रिया को ओडिशा की अपनी सभ्यतागत चेतना, सामाजिक संरचना और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप किस प्रकार ढालते हैं।
उन्होंने कहा, “विजन ओडिशा 2036 और 2047 के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हमारी दृष्टि ‘स्व’ पर आधारित होनी चाहिए, अपनी शक्तियों, परंपराओं और समकालीन आवश्यकताओं पर। हमें उधार के ढाँचों और औपनिवेशिक युग की मानसिकता से बाहर निकलना होगा। एक समान टेम्पलेट समाज की विविध आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकता।”

केतकर ने जोर देकर कहा कि किसी भी योजना या नीति के कार्यान्वयन के समय प्रत्येक क्षेत्र और प्रत्येक समुदाय की विशिष्ट सांस्कृतिक चेतना तथा परंपरागत ज्ञान-व्यवस्था को समझना आवश्यक है। विकास को स्थानीय समाज की परंपरागत ज्ञान प्रणाली के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए। हमें उन पर अपना विकास मॉडल थोपना नहीं चाहिए, बल्कि उनके स्वभाव और सामाजिक संरचना के अनुरूप विकास को सुगम बनाना चाहिए।

उन्होंने दो वर्ष पूर्व संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के वक्तव्य का उल्लेख करते हुए कहा कि 15 अगस्त 1947 को भारत राजनीतिक रूप से स्वाधीन अवश्य हुआ, किंतु वास्तविक स्वतंत्रता की यात्रा अभी जारी है। हमने स्वाधीनता प्राप्त की है, परंतु व्यवस्था, मानसिकता और मनोवैज्ञानिक स्तर पर हम अभी पूर्णतः स्वतंत्र नहीं हुए हैं। केतकर ने कहा कि भारत ने इतिहास में ग्रीक, शक, हुण, कुशाण, तुर्क, मुगल, मंगोल, डच और अंग्रेजों के निरंतर आक्रमणों का सामना किया, किंतु इसके बावजूद वह एक राष्ट्र के रूप में आज भी खड़ा है। उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में विदेशी आक्रमणों के कुछ वर्षों के भीतर ही वहां के मूल निवासी अत्यंत कम संख्या में रह गए। “भारत का ‘स्व’ ही उसकी स्थायित्व शक्ति है। यही कारण है कि हजारों वर्षों के आक्रमणों के बावजूद भारत एक जीवंत राष्ट्र के रूप में विद्यमान है ।

उन्होंने भारत की सांस्कृतिक एकात्मता का उदाहरण देते हुए कहा कि कैलास से कन्याकुमारी तक शिव और शक्ति की समान अवधारणा विद्यमान है। गंगा, पुरी और रामेश्वरम का आध्यात्मिक महत्व पूरे देश में समान रूप से स्वीकार किया जाता है। आशाढ़ शुक्ल द्वितीया को आयोजित होने वाली रथयात्रा की परंपरा अनादि काल से चली आ रही है। “भारत में ऐसा कोई राजा नहीं आया जिसने पंचांग को बदल दिया हो। यह हमारी सभ्यता की निरंतरता का प्रमाण है । केतकर ने कहा कि पश्चिमी दृष्टि समय को रेखीय (लीनियर) मानती है, जबकि भारतीय दृष्टि उसे चक्रीय (सर्कुलर) रूप में देखती है। “भारत का तथाकथित अशिक्षित व्यक्ति भी यह मानता है कि भले ही कलियुग चल रहा है, परंतु सतयुग अवश्य आएगा। यह हमारी समय-दृष्टि की विशेषता है।

उन्होंने आगे कहा कि भारत में ‘जियोग्राफी’ को ‘भूगोल’ कहा जाता है, जो इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि यहां हजारों वर्ष पूर्व से पृथ्वी के गोल होने का ज्ञान था। उन्होंने टिप्पणी की “जो लोग कभी पृथ्वी को समतल मानते थे, आज वे हमें ज्ञान देने का दावा करते हैं,” । उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय और पश्चिमी चिंतन में मूलभूत अंतर है। पश्चिम जहां चीजों को खंड-खंड में देखता है, वहीं भारतीय दृष्टि एकात्म है। पश्चिमी विचार में मानव और प्रकृति के बीच संघर्ष का भाव है और यह धारणा है कि मानव को प्रकृति पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। इसके विपरीत भारतीय चिंतन मानव को प्रकृति का अभिन्न अंग मानता है।
भारत के प्रख्यात चिंतक दीनदयाल उपाध्याय का उल्लेख करते हुए केतकर ने कहा कि पश्चिमी सोच प्रायः द्वैत (बाइनरी) में कार्य करती है, जबकि भारतीय दृष्टिकोण एकात्म और समग्र है। उपाध्याय के अनुसार भारतीय दृष्टि में व्यक्ति अकेला इकाई नहीं है; परिवार व्यक्ति से बड़ा है और वही समाज की मौलिक इकाई है। उन्होंने व्यष्टि (व्यक्ति), समष्टि (समाज), सृष्टि (प्रकृति) और परमेष्टि (परमात्मा) के परस्पर संबंध की अवधारणा को रेखांकित किया।

कार्यक्रम में मुख्य सचिव अनु गर्ग ने कहा कि राज्य सरकार ने विजन दस्तावेज़ तैयार करते समय समाज के सभी वर्गों से व्यापक परामर्श लिया है। “सरकार नहीं चाहती कि लोग केवल योजनाओं के लाभार्थी बनें, बल्कि वे विकास प्रक्रिया के सक्रिय भागीदार बनें,” उन्होंने कहा। उन्होंने कहा कि ओडिशा के पास अनेक शक्तियां हैं, साथ ही कुछ चुनौतियां भी हैं। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ना होगा। हमारे विजन दस्तावेज़ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ओडिशा देश के समग्र विकास में किस प्रकार अधिकतम योगदान दे सकता है । विकास आयुक्त देवरंजन कुमार सिंह ने कहा कि भारत कोई सामान्य राष्ट्र नहीं है। भारतीय सभ्यता की प्राचीनता पर आज भी शोध जारी है, जो इसकी गहराई और व्यापकता को दर्शाता है। उन्होंने नरेन्द्र मोदी का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने “विकास भी, विरासत भी” का मंत्र दिया है।

सिंह ने कहा कि अनेक संस्कृत शब्दों का अंग्रेजी में पूर्ण अनुवाद संभव नहीं है, क्योंकि उनमें गहन सभ्यतागत अर्थ निहित हैं। उन्होंने कहा कि भारत में राजधर्म — अर्थात् शासन का नैतिक कर्तव्य सर्वोपरि रहा है। आज भले ही राजा नहीं है, लेकिन सरकार और प्रशासन चलाने वालों को यह स्मरण रखना चाहिए कि प्रजा की भलाई में ही उनकी भलाई निहित है। प्रजा का हित सर्वोपरि है । कार्यक्रम में ओसीआईडी (नॉलेज एंड रिसर्च पार्टनर) आयोजन सचिव, राणा पृथ्वीराज सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।

Topics: Vision OdishaGovernment of OdishaLokseva BhawanConvention Centre
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