अफगान-पाक जंग: टूटा ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या-ला इला इल्ललाह’ का झूठा भ्रम
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अफगान-पाक जंग: टूटा ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या-ला इला इल्ललाह’ का झूठा भ्रम

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच खुली जंग छिड़ गई है। ऑपरेशन गजब-लिल-हक में पाक ने काबुल-कंधार पर हमले किए। डूरंड लाइन विवाद और अंग्रेजों की 'बांटो-राज करो' नीति के कारण इस्लामिक एकता का भ्रम टूट रहा है। अखंड भारत ही समाधान?

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by कुलदीप सिंह
Feb 27, 2026, 12:45 pm IST
inविश्व
pak Afghan War

इतिहास करवट ले रहा है, न केवल मोहम्मद अली जिन्ना की धर्म के आधार पर ‘द्विराष्ट्र का सिद्धांत’ धाराशाही हो रहा है बल्कि ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या-ला इला इल्ललाह’ के नाम से गढ़ा गया वैश्विक इस्लामिक भ्रातृभाव का भ्रम भी धाराशाही हो रहा है। वैसे यह कोई पहला अवसर नहीं है, पर अब दो इस्लामिक देश पाकिस्तान और अफगानिस्तान टकरा गए हैं। पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच गुरुवार को सीमा विवाद बढऩे के बाद जंग शुरू हो चुकी है। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन ‘गजब-लिल-हक’ शुरू किया, जिसमें काबुल, पक्तिया और कंधार जैसे शहरों में कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया है।

इससे पहले अफगानिस्तान में तालिबान प्रशासन ने दावा किया था कि उसने बड़े पैमाने पर हवाई हमलों में 55 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया और  19 पाकिस्तानी चौकियों पर कब्जा कर लिया है। इससे पहले तालिबान बलों ने दोनों देशों के बीच सीमा पर स्थित डूरंड लाइन के साथ तैनात पाकिस्तानी सैनिकों पर हमला किया था, जिसे उन्होंने पहले हुए घातक हमलों का प्रतिशोध बताया था।

अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति

अंग्रेजों ने भारत में अपने शासनकाल के दौरान बांटो और राज करो की नीति को चलाया जिससे भारत के केवल पाकिस्तान के रूप में ही नहीं बल्कि अफगानिस्तान, बर्मा (ब्रह्मदेश, वर्तमान में म्यांमार), श्रीलंका (सिंहलीद्वीप), तिब्बत, नेपाल सहित कई टुकड़े हुए। इसी तरह पाक-अफगानिस्तान का टकराव भी उसी की देन है। दरअसल, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान खींची गई विवादित सीमा रेखा डूरंड रेखा समय-समय पर दोनों देशों के बीच गोलीबारी और राजनयिक तनाव का केंद्र बनी हुई है। इसको लेकर लंबे समय से विवाद जारी है। दोनों देश एक-दूसरे पर हमले और आतंकियों को छिपाने का आरोप लगाते रहते हैं। 2021 में अफगानिस्तान हुकूमत पर तालिबान के नियंत्रण के बाद से तनाव और बढ़ गया है।

1893 में बीजे गए वर्तमान युद्ध के बीज

औपनिवेशिक डूरंड रेखा आज भी पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच शत्रुता को बढ़ावा दे रही है। 1893 में ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के बीच सीमा के रूप में खींची गई डूरंड रेखा, पश्तून जातीय क्षेत्रों को दो भागों में बांटती है। अफगानिस्तान ने इसे कभी मान्यता नहीं दी, क्योंकि वह इसे मनमाना थोपा हुआ मानता था। इस दुर्गम भूभाग से होकर गुजरने वाली करीब 2400 किलोमीटर लंबी यह रेखा लंबे समय से उग्रवादियों, नशीले पदार्थों और शरणार्थियों की तस्करी का मार्ग रही है, और दोनों पक्ष एक-दूसरे पर घुसपैठ का आरोप लगाते रहे हैं।

बाडबंदी से भड़का तालिबान

पाकिस्तान द्वारा हाल ही में की गई बाड़बंदी (जिसका 90 प्रतिशत से अधिक काम 2025 के मध्य तक पूरा हो चुका था) ने झड़पों को जन्म दिया है, क्योंकि तालिबान के रक्षक इस्लामाबाद द्वारा क्षेत्रीय अतिक्रमण का दावा करते हुए बाड़ों को हटा रहे हैं।

पख्तूनों को बांटती है डूरंड रेखा

बता दें कि ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के बीच डूरंड लाइन समझौता 1893 में हुआ था।  डूरंड रेखा अफगानिस्तान के पख्तून समुदाय को दो देशों में बांटती है। अफगानिस्तान हमेशा से इसके विरोध में रहा है। उसने कभी इस डूरंड  रेखा समझौता को मान्य नहीं किया। डूरंड लाइन की लंबाई 2430 किमी है, जो कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के कबायली क्षेत्र से गुजरती है। अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार तालिबान इसे मानता नहीं है। साथ ही इस समझौते को खत्म करने की मांग उठाता रहा है।

कौन था डूरंड

बता दें कि डूरंड रेखा का नाम ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव सर हेनरी मोर्टिमर डूरंड के नाम पर रखा गया था, जिन्होंने अफगानिस्तान के अमीर अब्दुर रहमान खान के साथ समझौता किया था। मालूम हो कि यह विवादित लाइन का पश्चिमी सिरा ईरानी सीमा से लगता है, जबकि पूर्वी सिरा चीन की सीमा से सटा है। दरअसल, रूस के दक्षिण की ओर बढ़ते आहत को रोकने के लिए ब्रिटेन ने 1839 में अफगानिस्तान पर हमला किया था, जिसमें ब्रिटिश सेना को हार झेलनी पड़ी। वहीं अब पाकिस्तान पर तालिबान के हमले के बाद खुली जंग का एलान हो चुका है। पाकिस्तान की तरफ से काबुल और कंधार पर बमबारी की गई। पाकिस्तान ने ऑपरेशन गजब-लिल-हक में 133 की मौत का दावा किया है। वहीं अफगानिस्तान ने भी जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी है। अफगान सैनिकों ने सीमा पर हमले तेज कर दिए हैं।

अखण्ड भारत समस्त समस्याओं का समाधान

अफगानिस्तान से लेकर म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल आदि आदि जो जो हिस्से भारत से अलग हुए वे आज न केवल खुद परेशान हैं बल्कि उनके चलते भारत और कहीं न कहीं दुनिया भी परेशान है। श्रीलंका पर चीन की नजरें हैं, तो म्यांमार सैनिक शासन झेल रहा है और यहां बौद्धों व मुस्लिमों में टकराव लंबे समय से चला आरहा है। बांग्लादेश अराजक विपल्व को झेल चुका है और शनै-शनै इस्लामिक कट्टरवाद की और सरक रहा है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान की दयनीय हालत के वृतांतों से तो दुनिया भर के समाचार पत्र भरे रहते हैं। केवल यह देश ही नहीं भारत भी इन टकरावों की आग को झेल रहा है। पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद रह-रह कर सिर उठाता रहता है तो कश्मीर में अलगाववाद व आतंकवाद की लपटें उठती रही हैं।

दक्षिण एशियाई इस क्षेत्र में उक्त टकरावों से न केवल असंख्या जानें जा रही हैं बल्कि आकूत धनसंपदा भी युद्धों में तबाह हो रही है। विदेशी शक्तियां इन टकरावों की आग पर अपना स्वार्थ का हलवा-पूरी सेक रही हैं। इन सभी टकरावों का एक समाधान दिखाई देता है कि देश को पुन: अखण्ड बनाया जाए। जब काबुल से रंगून और ल्हासा से कोलंबो तक विशाल भू-भाग वाला सशक्त, एकजुट, समरस, लोकतांत्रिक अखण्ड भारत होगा तब दुनिया की किसी शक्ति की इस ओर तीछी नजरें करने की हिम्मत नहीं होगी और उक्त टकराव स्वत: समाप्त हो जाएंगे।

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