भोजशाला: ASI रिपोर्ट में उजागर हुआ वाग्देवी मंदिर से मस्जिद बनने का क्रम! छेनी-हथोड़े से मंदिर के अवशेष मिटाए गए
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भोजशाला: ASI रिपोर्ट में उजागर हुआ वाग्देवी मंदिर से मस्जिद बनने का क्रम! छेनी-हथोड़े से मंदिर के अवशेष मिटाए गए

रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान ढांचे के नीचे बेसाल्ट पत्थरों की 10वीं–11वीं शताब्दी की नींव पाई गई। इन पत्थरों पर ‘शारदा सदन’ शब्द अंकित है, जो देवी सरस्वती या वाग्देवी के निवास का संकेत देता है। साथ ही सुप्रसिद्ध साहित्यिक कृति ‘पारिजात मंजरी’ के उल्लेख वाले शिलालेख भी मिले हैं।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी — edited by Mahak Singh
Feb 27, 2026, 12:06 pm IST
inमध्य प्रदेश
धार स्थित भोजशाला

धार स्थित भोजशाला

धार की ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर सदियों से चल रहा विवाद अब निर्णायक मोड़ पर है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की 98 दिन चली वैज्ञानिक पड़ताल और 2189 पृष्ठों की विस्तृत रिपोर्ट ने इस स्थल के अतीत की कई परतें खोल दी हैं। रिपोर्ट में क्रमबद्ध तथ्यों, शिलालेखों, स्थापत्य अवशेषों और वैज्ञानिक जांच के आधार पर यह निष्कर्ष निकालती है कि वर्तमान ढांचा मूल रूप से 10वीं–11वीं शताब्दी का मूल रूप से परमारकालीन वाग्देवी (सरस्वती) मंदिर और एक प्रतिष्ठित शिक्षण केंद्र था, जिसे बाद के काल में संरचनात्मक बदलाव कर मस्जिद और कमाल मौला की दरगाह का रूप दिया गया। रिपोर्ट में दर्ज स्थापत्य अवशेष, शिलालेख, मूर्तिकला और वैज्ञानिक परीक्षण इस परिवर्तन की कहानी को सिलसिलेवार ढंग से सामने रखते हैं।

नींव में मिला परमारकालीन ‘शारदा सदन’

रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान ढांचे के नीचे बेसाल्ट पत्थरों की 10वीं–11वीं शताब्दी की नींव पाई गई। इन पत्थरों पर ‘शारदा सदन’ शब्द अंकित है, जो देवी सरस्वती या वाग्देवी के निवास का संकेत देता है। साथ ही सुप्रसिद्ध साहित्यिक कृति ‘पारिजात मंजरी’ के उल्लेख वाले शिलालेख भी मिले हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि यह स्थान पूजा का केंद्र होने के साथ ही शिक्षा और नाट्य गतिविधियों का प्रमुख स्थल भी था।

तीन चरणों में निर्माण, अंतिम चरण में मस्जिद स्वरूप

वैज्ञानिक परीक्षणों से एएसआई ने निष्कर्ष निकाला है कि परिसर का निर्माण तीन चरणों में हुआ। सबसे प्राचीन परत मंदिर की है। इसके ऊपर क्षतिग्रस्त संरचना के अवशेष और फिर अंतिम चरण में मस्जिदनुमा ढांचा निर्मित किया गया। रिपोर्ट कहती है कि मस्जिद निर्माण के दौरान मंदिर के स्तंभों, शिलाखंडों और सजावटी पत्थरों का पुनः उपयोग किया गया। जिसमें कि निर्माण में समरूपता का अभाव स्पष्ट दिखता है। कई पत्थर उल्टे या आड़े-तिरछे लगाए गए, जिन पर संस्कृत शिलालेख खुदे थे। कुछ अक्षरों को घिसकर मिटाने के प्रयास भी मिले हैं। इससे यह संदेह प्रबल होता है कि मूल पहचान को छिपाने की कोशिश की गई।

106 स्तंभ, 82 अर्धस्तंभ और कीर्तिमुख

सर्वे में पाया गया कि पूरी संरचना 106 मुख्य स्तंभों और 82 अर्धस्तंभों पर आधारित है। अधिकांश स्तंभ चूना पत्थर के हैं, जिनका रंग हल्का लाल और धूसर है। इन पर कीर्तिमुख, नागबंध, चैत्य गवाक्ष और उल्टे पत्तों की नक्काशी उकेरी गई है। कीर्तिमुख भारतीय मंदिर वास्तुकला की विशिष्ट आकृति है, जिसे सिंहमुख रूप में दर्शाया जाता है और जिसे दुष्ट शक्तियों से रक्षा का प्रतीक माना जाता है। स्तंभों के शीर्ष पर गोलाकार अभाकस, अष्टकोणीय पट्ट और त्रिकोणीय आधार स्पष्ट रूप से मध्यकालीन मंदिर शैली को दर्शाते हैं।

150 से अधिक संस्कृत शिलालेख, 56 अरबी-फारसी अभिलेख

रिपोर्ट में 150 से अधिक संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख दर्ज किए गए हैं। इसके विपरीत 56 शिलालेख अरबी और फारसी में पाए गए। यह अनुपात भी मूल संरचना के मंदिर और शैक्षणिक केंद्र होने की ओर संकेत करता है। फर्श और दीवारों में लगे कई पत्थरों पर खुदे अक्षरों को जानबूझकर घिसा गया या उल्टा लगा दिया गया ताकि उन्हें पढ़ा न जा सके। एएसआई के अनुसार यह ‘आइकॉनोग्राफिक इरेजर’ का स्पष्ट उदाहरण है।

मूर्तियों के साक्ष्य: गणेश से अर्धनारीश्वर तक

सर्वे रिपोर्ट में 94 मूर्तियों और उनके अवशेषों का उल्लेख है। इनमें गणेश, ब्रह्मा, नृसिंह और चार भुजाओं वाले अन्य देवताओं की आकृतियां शामिल हैं। परिसर से पूर्व में प्राप्त अर्धनारीश्वर, कुबेर और नायिका की मूर्तियों को भी साक्ष्य के रूप में जोड़ा गया है। ये प्रतिमाएं वर्तमान में संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। खिड़की फ्रेम पर देवी-देवताओं की अपेक्षाकृत सुरक्षित मूर्तियां और एक स्तंभ पर कटी-फटी आकृतियां इस बात की ओर संकेत करती हैं कि मूल प्रतिमाओं को क्षति पहुंचाई गई।

1455 ईस्वी का शिलालेख और ऐतिहासिक संदर्भ

परिसर में स्थित मकबरे के प्रवेश द्वार पर लगे शिलालेख का उल्लेख रिपोर्ट के खंड चार, पृष्ठ 260 पर किया गया है। यह शिलालेख मालवा सल्तनत के शासक महमूद खिलजी के काल (हिजरी 859/1455 ईस्वी) का है। एएसआई द्वारा किए गए अनुवाद के अनुसार उसमें उल्लेख है कि एक पुराने आश्रम को ध्वस्त कर मूर्तियों को नष्ट किया गया और उसे नमाज की जगह में परिवर्तित किया गया। इस संदर्भ में उल्‍लेखित है कि रिपोर्ट इस अभिलेख को ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रत्यक्ष साक्ष्य मानती है।

कारीगरों के 139 निशान और युद्ध दृश्य

स्तंभों पर 139 से अधिक प्रकार के चिह्न जैसे त्रिशूल, स्वास्तिक और अन्य प्रतीक मिले हैं। इन्हें कारीगरों के सिग्नेचर या कोड के रूप में देखा गया है। दीवारों पर हाथी और सैनिकों के युद्ध दृश्य भी उकेरे गए हैं। एक स्थान पर बच्चे के हाथ का निशान भी मिला है, जो निर्माणकालीन गतिविधियों का मानवीय संकेत देता है।

98 दिन का सर्वे और 2189 पृष्ठों की रिपोर्ट

उल्‍लेखनीय है कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ के निर्देश पर 22 मार्च से 27 जून 2024 तक 98 दिनों तक परिसर का वैज्ञानिक सर्वे किया गया। 4 जुलाई 2024 को एएसआई ने 10 खंडों में विभाजित 2189 पृष्ठों की रिपोर्ट कोर्ट में प्रस्तुत की। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 22 जनवरी को हाई कोर्ट को वास्तविक धार्मिक स्वरूप पर निर्णय करने का निर्देश दिए जाने के बाद यह रिपोर्ट कानूनी बहस का मुख्य आधार बन गई है।

पक्ष और प्रतिपक्ष की दलीलें

हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के प्रदेश उपाध्यक्ष और याचिकाकर्ता आशीष गोयल यह दावा करते हैं कि यहां मिले शिलालेख और स्थापत्य साक्ष्य स्पष्ट कर रहे हैं कि यहां प्राचीन मंदिर और मठ था, जिसे ध्वस्त कर मस्जिद बनाई गई। अब इतने स्‍पष्‍ट तथ्‍य सामने आने के बाद अब और क्‍या प्रणाम चाहिए कि धार में ये वाग्‍देवी मंदिर है। वे फिर अपनी बात दोहराते हैं और कहते हैं, “एएसआई की रिपोर्ट क्रमबद्ध साक्ष्यों के आधार पर यह साफ बता देती है कि वर्तमान मस्जिदनुमा ढांचे के नीचे और भीतर एक भव्य वाग्देवी मंदिर और शैक्षणिक केंद्र के अवशेष हैं। शिलालेखों के साथ छेड़छाड़, मूर्तियों की क्षति और पुनः उपयोग किए गए स्तंभ इस परिवर्तन की कहानी आज स्‍वयं ही कह रहे हैं।”

इसके साथ ही हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के प्रदेश संयोजक आशीष जनक का कहना है,  “जिस तरह से वाग्‍देवी के मंदिर से जुड़े साक्ष्‍यों को मिटाकर उसके अस्‍तित्‍व को ही समाप्‍त करने का कार्य इतिहास में हुआ है, अब उसके साक्ष्‍य इस एएसआई रिपोर्ट के माध्‍यम से सभी के सामने आ चुके हैं। वर्षों तक योजनाबद्ध तरीके से भोजशाला से जुड़ा सच देशवासियों से छिपाया गया है, लेकिन अब इतिहास स्‍वयं सामने आकर अपना परिचय दे रहा है और बता रहा है कि ये कोई मस्‍जिद या दरगाह नहीं है, यह करोड़ों करोड़ हिन्‍दुओं की आस्‍था का केंद्र वाग्‍देवी, मां सरस्‍वती का आराधना स्‍थल है।”

कमाल मौलाना वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष अब्दुल समद का तर्क कि 1903–04 के एएसआई सर्वे में इसे मस्जिद माना गया था और नई रिपोर्ट में तथ्य बदले हुए प्रतीत होते हैं। के संदर्भ में भी आशीष जनक का कहना था कि “ पहले क्‍या हुआ, क्‍या नहीं, आज के समय में इसका बहुत महत्‍व नहीं रह जाता, क्‍योंकि वर्तमान साक्ष्‍य सीधे तौर पर स्‍पष्‍ट कर रहे हैं कि यहां बने मंदिर को मिटाकर इसे मस्‍जिद और दरगाह में बदला गया है।आपत्‍त‍ियां दर्ज करने का अधिकार सभी को है, वे करें अपनी आपत्‍त‍ियां दर्ज, किंतु इससे सत्‍य नहीं बदल जाएगा कि ये हमारी वाग्‍देवी का मंदिर है।” मामला वर्तमान में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में विचाराधीन है। कोर्ट ने सभी पक्षों को 16 मार्च तक लिखित आपत्तियां दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं। इस बीच वाग्देवी की प्रतिमा, जो 1930 में ब्रिटिश काल में बाहर ले जाई गई थी और वर्तमान में लंदन के संग्रहालय में सुरक्षित है, उसे भारत वापस लाने का मुद्दा भी इन दिनों मध्‍य प्रदेश की विधानसभा में उठ चुका है।

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डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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