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कानून की पटखनी से टूटा ‘सपना’

ट्रंप टैरिफ गाथा ने भले ही अमेरिकी नीति की सीमाएं उजागर की हों, लेकिन भारत के लिए यह अपने 'कूटनीतिक कैल्क्युलेटर' का कौशल दिखाने का अवसर बन गई जहां भावनात्मक उबाल की जगह शांत, ठंडी गणना पर जोर है।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Feb 27, 2026, 02:02 pm IST
inसम्पादकीय
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

एक पल मुस्कुराते, दूसरे पल तिलमिलाते हैं और अगले ही क्षण त्योरियां चढ़ाते अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कहानी अजब है।
ट्रंप के ऊंचे टैरिफ की ‘सपनीली मीनार’ वास्तव में आर्थिक राष्ट्रवाद के नाम पर 21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था को 19वीं सदी की सोच के आधार पर ऊंचा उठाने का अटपटा प्रयोग थी। अमेरिका की सबसे ऊंची अदालत ने इस विसंगति को कानूनी आधार पर भांप लिया और उसके झटका देते ही सपना बीच में ही टूट गया।

अमेरिका के शीर्ष न्यायालय ने स्पष्ट बता दिया कि आपातकाल का बहाना लेकर राष्ट्रपति को असीमित शुल्क लगाने का अधिकार देना न तो संवैधानिक है, न ही लोकतांत्रिक। कर लगाना ‘कैपिटल हिल’ से तय होगा, ‘व्हाइट हाउस’ से नहीं। यानी आर्थिक राष्ट्रवाद की तलवार खूब लहराई गई, पर चूंकि कानूनी आधार ही भुरभुरा था, सो पैंतरों का प्रदर्शन बीच में ही ढह गया।

अमेरिका के नागरिकों को ऐसा सपना दिखाया गया, जैसे ऊंचे टैरिफ का चाबुक चलाने से अमेरिका की औद्योगिक महानता का घोड़ा सरपट दौड़ने लगेगा, किंतु वास्तविकता यह है कि पिछले कुछ दशकों में अमेरिकी अर्थव्यवस्था का चेहरा ही बदल चुका है।
विनिर्माण का एक हिस्सा चाहे एशिया की ओर खिसक गया हो, पर अमेरिका ने तकनीक, बौद्धिक संपदा और सेवाओं में अपनी पकड़ मजबूत की और यहीं से उसकी नई वैश्विक शक्ति स्थापित हुई है, न कि स्टील पर चढ़े अतिरिक्त 10-15 प्रतिशत शुल्क से।
बिना गहराई से सोचे तेवर दिखाने का परिणाम यह हुआ कि टैरिफ ने फैक्टरियों से ज्यादा चोट आम उपभोक्ता की जेब पर की। महंगे आयात, बढ़ी कीमतें और व्यापारिक सहयोगियों में असंतोष, पर राजनीतिक मंच पर अमेरिकी राष्ट्रपति के राष्ट्रवादी भाषणों की गर्मी बनी रही।

अदालत के फैसले ने यह भ्रम तोड़ा कि आपातकालीन प्रावधानों के नाम पर राष्ट्रपति जो चाहे, जितना चाहे शुल्क नहीं लगा सकता है। न्यायालय ने साफ कहा कि इतनी व्यापक आर्थिक-राजनीतिक महत्व वाली नीति के लिए स्पष्ट विधायी अधिकार चाहिए, जिसे प्रशासन दिखा नहीं सका। इससे यह भी उजागर हुआ कि अमेरिकी व्यापार नीति अक्सर आंतरिक राजनीतिक खींचतान, पालेबन्दी (लॉबीइंग) और चुनावी गणित से संचालित होती है।

आज जो टैरिफ ‘राष्ट्रीय हित’ कहलाता है, कल वही अदालत में असंवैधानिक ठहर सकता है। अब बात करते हैं अपनी। यानी भारत की।
अमेरिका के राष्ट्रपति ही बदलती दुनिया में पुरातन पंथ के सपने से पीड़ित हों, ऐसा नहीं है। खुद को वामपंथी बताने वाला वहां का अधिकांश मुख्यधारा मीडिया भी इससे पीड़ित है। इसी कारण भारत को अमेरिका, या कहिए पश्चिम में, अक्सर ऐसे चित्रित किया जाता है मानो ‘ट्रम्प’ की छींक पर दिल्ली को भी बुखार चढ़ जाता हो।

हुआ उल्टा, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने अमेरिका में कंपकपी पैदा की ही थी कि अनिश्चितता की इस उहापोह में भारत ने भी चादर खींच ली। भारत ने अमेरिका के साथ अंतरिम व्यापार समझौते की वार्ता पर फिलहाल ‘पॉज’ बटन दबा दिया, न कि घबराकर हस्ताक्षर के लिए भागा।

भारतीय टीम की वाशिंगटन यात्रा टालना यह दर्शाता है कि जब अमेरिकी पक्ष खुद अपने नए टैरिफ ढांचे का कानूनी ढांचा समझने में जुटा है, तो हमें भी आंकड़े और शर्तें फिर से गणना करने का समय मिलना चाहिए। यह व्यवहार प्रतिक्रियात्मक नहीं, गणनात्मक व्यापार कूटनीति का उदाहरण है, जो उभरती शक्ति के आत्मविश्वास को दर्शाता है। पहला अहम बिंदु यह है कि भारत अब क्लासिक ‘सस्ता निर्यात करो, बाजारों तक पहुंच मांगो’ मॉडल में फंसा विकासशील देश नहीं रह गया। तेजी से बढ़ती घरेलू मांग और बढ़ता मध्य वर्ग भारत के अपने बाजार को एक रणनीतिक संसाधन में बदल रहे हैं, जिसकी पहुंच बनाए रखना अब अमेरिका सहित कई देशों की प्राथमिकता है। इसलिए दबाव की पुरानी धुन, कि भारत को समझौता करना ही पड़ेगा वरना बाजार खो देगा, अब उतनी असरदार नहीं रही, मोलभाव की मेज पर कुर्सी बदल चुकी है, सिर्फ संवाद की भाषा अभी पुरानी पड़ोस की आदतों से बाहर आ रही है।

दूसरा, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला दोबारा आकार ले रही है। इस पुनर्संरचना में भारत की भूमिका ‘भविष्य की संभावना’ भर नहीं, बल्कि वास्तविक निवेश और रणनीति का हिस्सा बन चुकी है। ‘चीन प्लस वन’ सोच के तहत अमेरिकी और पश्चिमी कंपनियां भारत को दीर्घकालिक विनिर्माण व वैकल्पिक (बैकअप) केंद्र के रूप में देख रही हैं, ताकि उत्पादन जोखिम सिर्फ एक देश पर निर्भर न रहे। ऐसे परिदृश्य में अस्थायी अमेरिकी टैरिफ खींचतान से भारत की बुनियादी आकर्षण क्षमता नहीं बदलती किसी को बाजार के लिए अपना सामान किस कारखाने में बनाना है, यह तय होने के बाद नक्शे पर उस कारखाने की स्थिति किसी अल्पकालिक शुल्क पर नहीं बदलती। यह दशकों के स्थायित्व, संस्थागत ढांचे और बाजार के आधार पर तय होता है।

तीसरा, भारत ने कृषि, गहन बाजार पहुंच और संवेदनशील घरेलू क्षेत्रों को जल्दबाजी में खोलने से परहेज किया। यह वही सबक है जो पिछली वैश्विक उदारीकरण की लहर से सीखकर लगाया गया है। अब व्यापार समझौते सिर्फ ‘निर्यात के नए अवसर’ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका और सामाजिक स्थिरता की कसौटी पर भी तोले जा रहे हैं। यानी इस बार मेज पर सिर्फ टैरिफ की दर नहीं, लंबे समय की सुरक्षा भी रखी है।

चौथा, अमेरिकी टैरिफ उथल-पुथल ने भारत को बहुध्रुवीय विकल्पों पर गति बढ़ाने का मौका दिया। ब्रिक्स ढांचा, वैश्विक दक्षिण के साथ साझेदारी, स्थानीय मुद्रा में व्यापार और क्षेत्रीय समझौतों में सक्रियता भारत को इस स्थिति में लाती है कि वह वाशिंगटन के साथ रिश्ते मजबूत रखे, लेकिन उन पर निर्भर न रहे।

विश्व व्यवस्था में खेल के मैदान और नियम बदल रहे हैं और भारत एक नए खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है। नया नियम यही है कि ‘यदि एक ध्रुव अनिश्चितता पैदा करे, तो बाकी ध्रुवों के साथ अपने विकल्प पहले से तैयार रखें।’ भारत अब इन नए समीकरणों का महत्वपूर्ण हिस्सा है और उसकी यह भूमिका किसी पर आश्रित होने के कारण नहीं, बल्कि अपनी क्षमता विकास के कारण है।

पांचवां बिंदु, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है, यह है कि सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय दिखाता है कि अमेरिकी प्रशासनिक आश्वासन और स्थायी नीति, दोनों हमेशा एक नहीं होते। आज किसी प्रशासन ने जो प्रतिबद्धता दी है, वह कल अदालत या नए कानून के जरिए पलट सकती है ऐसे में भारत का ‘रुको, पहले देखो’ वाला रुख महज सतर्कता नहीं, बल्कि परिपक्व जोखिम प्रबंधन है। इस पूरी तस्वीर में भारत की भूमिका को सिर्फ ‘बातचीत ठप’ जैसी पंक्ति में समेटना अन्याय होगा। असल कहानी यह है कि भारत आर्थिक स्वायत्तता, रणनीतिक धैर्य और बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन के बीच अपनी वार्ता क्षमता को व्यवस्थित तरीके से बढ़ा रहा है।
ट्रंप टैरिफ गाथा ने भले ही अमेरिकी नीति की सीमाएं उजागर की हों, लेकिन भारत के लिए यह अपने ‘कूटनीतिक कैल्क्युलेटर’ का कौशल दिखाने का अवसर बन गई, जहां भावनात्मक उबाल की जगह शांत, ठंडी गणना पर जोर है।

X@hiteshshankar

 

Topics: परिपक्व कूटनीतिसंवैधानिक मर्यादाहितेश शंकरआर्थिक/व्यापार आर्थिक राष्ट्रवादअमेरिकी सुप्रीम कोर्टटैरिफ (शुल्क)असंवैधानिकअंतरिम व्यापार समझौतापाञ्चजन्य विशेषआर्थिक स्वायत्तताराष्ट्रपति ट्रंपवैश्विक आपूर्ति श्रृंखला भारतराजनीतिकmain. FEATUREDकानूनी झटका
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हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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