संघ शताब्दी वर्ष के अवसर पर 22 फरवरी को भरतपुर में एक गोष्ठी आयोजित हुई। इसे संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि भारत की राष्ट्रीय चेतना आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आधार पर निर्मित है तथा विविध अभिव्यक्तियों के बावजूद उसकी सांस्कृतिक आत्मा एक है।
इस एकत्व की भावना को ही भारतीयता अथवा हिंदुत्व कहते हैं। यह विचार किसी के विरोध का नहीं, बल्कि मानवता के कल्याण की दृष्टि से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रबोध और समाजबोध का विकास भारत की उन्नति के लिए अनिवार्य है। भारत की पहचान उसकी आध्यात्मिक परंपरा, सांस्कृतिक निरंतरता और सामाजिक चेतना में निहित है। यही वैचारिक अधिष्ठान राष्ट्र को सशक्त बनाता है और समाज को संगठित करता है।
भारत को अनेक संस्कृतियों का देश कहना उचित नहीं, बल्कि यहां संस्कृति एक है, जिसकी अभिव्यक्ति भिन्न-भिन्न रूपों में दिखाई देती है। भाषा, परंपरा, पर्व और जीवनशैली में विविधता हो सकती है, किंतु उनके मूल में एक समान सांस्कृतिक भाव विद्यमान है। इसी आधार पर राष्ट्रीय एकता का निर्माण होता है। उन्होंने कहा कि संघ का कार्य व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्रीय चरित्र निर्माण करना है। व्यक्तिगत चरित्र और राष्ट्रीय चरित्र दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
यदि व्यक्ति में ईमानदारी, प्रामाणिकता और अनुशासन है, तो उसमें राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना भी होनी चाहिए। देश की वर्तमान परिस्थितियों पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि भारत वैश्विक स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति कर रहा है। विज्ञान, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा में वृद्धि के साथ-साथ सामाजिक चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है। राष्ट्र की एकता को कमजोर करने वाले तत्वों के प्रति सजग रहना आवश्यक है। कहा कि समाज के भीतर भेदभाव और असमानता राष्ट्र को कमजोर करते हैं।
सामाजिक न्याय, परस्पर सम्मान और समता का वातावरण बनाना समय की आवश्यकता है। समाज को अपनी कमियों को स्वीकार कर सुधार के लिए आगे आना चाहिए। मंच पर जयपुर प्रांत संघचालक श्री महेंद्र सिंह मग्गो और मुख्य अतिथि के रूप में ‘अपना घर’ संस्थान की संस्थापक डॉ. माधुरी भारद्वाज उपस्थित रहे।

















