23 साल बाद इंसाफ! इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्यारोपी को किया बरी, जज ने कहा- ...नहीं सुधरेगी न्याय व्यवस्था
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23 साल बाद इंसाफ! इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्यारोपी को किया बरी, जज ने कहा- …नहीं सुधरेगी न्याय व्यवस्था

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पत्नी और तीन बच्चों की हत्या के मामले में 23 वर्ष जेल काट चुके आरोपी को साक्ष्यों के अभाव में बरी किया। अदालत ने आपराधिक न्याय प्रणाली पर भी कड़ी टिप्पणी की।

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Shivam Dixit
Feb 26, 2026, 06:07 pm IST
inभारत, उत्तर प्रदेश
Allahabad High Court

प्रयागराज (हि.स) । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पत्नी और तीन बच्चों की निर्मम हत्या के आरोप में करीब 23 वर्ष जेल में बिताने वाले एक व्यक्ति को साक्ष्यों के अभाव में बरी किया।

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा है। साथ ही न्यायालय ने आपराधिक न्याय प्रणाली पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल सम्मेलन और बैठकों से स्थिति नहीं सुधरेगी, बल्कि जजों की संख्या, सहायक स्टाफ और आधारभूत ढांचे में वास्तविक वृद्धि की आवश्यकता है।

खंडपीठ की टिप्पणी- आत्ममंथन की जरूरत

जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने अपने 10 पृष्ठों के निर्णय में कहा कि यह मामला आपराधिक न्याय वितरण प्रणाली पर दुखद टिप्पणी है और आत्ममंथन की आवश्यकता है। पीठ ने कहा कि ठोस सुधारात्मक कदम समय की मांग हैं।

2003 की घटना का विवरण

मामले के अनुसार 29 और 30 अगस्त, 2003 की रात को रईस पर आरोप था कि उसने घरेलू विवाद के बाद अपनी पत्नी और तीन बच्चों की चाकू से गला रेतकर हत्या कर दी। मृतका के मामा ने एफआईआर दर्ज कराई। ट्रायल कोर्ट ने उसे चार हत्याओं का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

बाल गवाह के बयान पर हाईकोर्ट की जांच

दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील पर सुनवाई करते हुए हाइकोर्ट ने अभियोजन के साक्ष्यों की गहन जांच की। विशेषकर एकमात्र कथित प्रत्यक्षदर्शी, आरोपित के पांच वर्षीय जीवित पुत्र अजीम के बयान की। क्रॉस एक्जामिनेशन के दौरान बाल गवाह ने स्वीकार किया कि उसने सूचना देने वाले और एक सरकारी वकील के कहने पर बयान दिया। उसने यह भी कहा कि यदि वह उनके अनुसार, गवाही नहीं देता तो उसे घर से निकाल देने की धमकी दी गई।

घटना के समय पिता के गांव से बाहर होने का दावा

बच्चे ने अदालत में बताया कि घटना के समय उसका पिता गांव से बाहर भूसा बेचने गया और पत्नी के हत्या की सूचना मिलने के बाद अगली सुबह लौटा। उसने यह भी कहा कि जब उसके पिता घर पहुंचे और शवों को देखकर रोए, तब उनके कपड़ों पर खून के धब्बे लग गए। बाद में सूचना देने वाले से कहासुनी हुई और उसी के बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

भूमि विवाद और अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति पर सवाल

अदालत ने भूमि विवाद को लेकर सूचना देने वाले और आरोपित के बीच पूर्व शत्रुता का भी संज्ञान लिया, जिससे उसके आरोपों की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न हुआ। अभियोजन द्वारा प्रस्तुत कथित अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति को भी अदालत ने अस्वीकार किया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के सहादेवन बनाम तमिलनाडु राज्य के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे बयानों को सावधानी से परखा जाना चाहिए। यहां जांच अधिकारी ने दो महीने की अस्पष्ट देरी के बाद बयान दर्ज किए और यह स्वाभाविक नहीं लगता कि आरोपित किसी दूसरे गांव के ऐसे व्यक्तियों के सामने अपराध स्वीकार करता, जिनसे उसका कोई घनिष्ठ सम्बंध नहीं था।

मेडिकल साक्ष्य अभियोजन कहानी से मेल नहीं खाते

मेडिकल साक्ष्य भी अभियोजन की कहानी से मेल नहीं खाते पाए गए। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार घाव किसी भारी धारदार हथियार से किए गए, जिससे गर्दन लगभग धड़ से अलग हो गई थी। इससे यह सिद्धांत कमजोर पड़ गया कि साधारण चाकू से ऐसी घातक चोटें पहुंचाई गईं। पीठ ने आरोपित के साथ कथित पुलिस अत्याचार के साक्ष्यों पर भी ध्यान दिया जो जांच अधिकारी के उस कथन से विपरीत है, जिसमें उसने हिरासत में मारपीट या नाखून उखाड़ने से इनकार किया।

संदेह का लाभ देते हुए बरी

इन सभी परिस्थितियों में हाइकोर्ट ने कहा कि यद्यपि यह अत्यंत जघन्य अपराध है लेकिन उपलब्ध साक्ष्य यह सिद्ध नहीं करते कि यह अपराध अपीलकर्ता ने ही किया। संदेह का लाभ देते हुए अदालत ने उसे बरी कर दिया और निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।

अदालत की मार्मिक टिप्पणी

अदालत ने मार्मिक टिप्पणी करते हुए कहा कि आरोपित की वास्तविक पीड़ा अब शुरू होगी। संभव है उसके माता-पिता और भाई-बहन जीवित न हों। उसकी पत्नी और तीन बच्चे पहले ही मर चुके हैं। उसका जीवित पुत्र, जो अब लगभग 25-26 वर्ष का होगा, क्या अपने पिता को स्वीकार करेगा, यह भी निश्चित नहीं है।

Topics: हत्या मामलाजस्टिस जय कृष्ण उपाध्यायउत्तर प्रदेशसहादेवन बनाम तमिलनाडु राज्यप्रयागराजबाल गवाहआपराधिक न्याय प्रणालीAllahabad High Court acquittal news23 years jail acquitted murder casePrayagraj High Court judgmentchild witness cross examination casecriminal justice system remarks High Courtइलाहाबाद उच्च न्यायालयSahadevan vs State of Tamil Nadu judgmentआजीवन कारावासजस्टिस सिद्धार्थ
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