सावरकर पर माफी का झूठा इल्ज़ाम, डांगे की याचिका पर चुप्पी: वामपंथियों का दोगलापन देखिए
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सावरकर पर माफी का झूठा इल्ज़ाम, डांगे की याचिका पर चुप्पी: वामपंथियों का दोगलापन देखिए

वीर सावरकर की माफी याचिका को लेकर वामपंथी प्रचार की सच्चाई क्या है? एस.ए. डांगे और नलिनी दास गुप्ता ने भी ब्रिटिश को समान याचिका दी थी। ऐतिहासिक तथ्य और द्विपक्षीय विश्लेषण।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by कुलदीप सिंह
Feb 26, 2026, 12:35 pm IST
in विश्लेषण, पंजाब
Veer Savarkar vs SA Dange

वीर सावरकर और एसए डांगे (बाएं से)

स्वतन्त्रता संग्राम में हर विचारधारा ने अपना योगदान दिया लेकिन स्वतन्त्रता मिलने के बाद कई लोग अपने योगदान का महिमामण्डन कर राजनीतिक लाभ उठाने और दूसरे स्वतन्त्रता सेनानियों व क्रान्तिकारियों को न केवल कमतर बताने लगेे बल्कि गाली गलौच भी करने लगे। इन प्रताड़ित स्वतन्त्रता सेनानियों में नाम लिया जा सकता है वीर सावरकर का, जो न केवल खुद विपल्ववादी बल्कि क्रान्तिकारियों की प्रेरणा, महान विचारक, कवि, लेखक, चिन्तक, समाज सुधारक, योजनाकार और संगठनकर्ता भी थे।

दुष्प्रचार किया जाता है कि उन्होंने अंग्रेजों से माफी मांगी, जबकि सच्चाई यह है कि जिस याचिका पर उन्होंने हस्ताक्षर किए वह प्रशासनिक औपचारिकता थी, जो अंग्रेजों ने राजनीतिक बन्दियों के लिए निर्धारित की थी। परन्तु वामपन्थी इसी आधार पर उनका नाम लेकर कुतर्क करते हैं। वे भूलते हैं कि इसी तरह की याचिका पर भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के संस्थापक सदस्य श्रीपाद अमृत डांगे व नलिनी दास गुप्ता भी हस्ताक्षर कर चुके हैं। हम इन दोनों नेताओं का पूरा सम्मान करते हैं और हमारा किसी के प्रति दुराग्रह नहीं है। हमारा उद्देश्य तो केवल यह बताना है कि कामरेड डांगे व गुप्ता की तरह अगर वीर सावरकर किसी याचिका पर हस्ताक्षर कर रिहा हुए तो वह वामपन्थियों की नजरों में गलत कैसे हो गए ?

वीर सावरकर को लेकर फैलाया भ्रम

लेखक विक्रम संपथ ‘सावरकर-इकोज फ्रॉम ए फॉरगॉटन पास्ट’ में बताते हैं कि क्रान्तिकारी वीर सावरकर को लेकर यह बहुत बड़ा भ्रम फैलाया जाता है कि उन्होंने अंग्रेजों से माफी मांगी थी। सच तो यह है कि ये कोई दया याचिका नहीं, सिर्फ एक याचिका थी। जिस तरह हर राजबन्दी को एक वकील करके अपना मुकदमा लड़ने की छूट होती है। उसी तरह सारे राजबन्दियों को याचिका देने की छूट दी गई थी। सावरकर को 50 साल का आजीवन कारावास सुनाया गया था, तब वह 28 साल के थे।

अगर सावरकर जिन्दा वहां से लौटते तो 78 साल के हो जाते। इसके बाद क्या होता? न तो वह परिवार के लिए कुछ कर पाते और न ही देश की आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दे पाते। उनकी मंशा थी कि किसी तरह जेल से छूटकर देश के लिए कुछ किया जाए। 1920 में उनके छोटे भाई नारायण ने महात्मा गांधी जी से बात की थी और कहा था कि आप पैरवी कीजिए कि कैसे भी ये छूट जाएं। गांधी जी ने खुद कहा था कि आप बोलो सावरकर को कि वह एक याचिका भेजें अंग्रेज सरकार को और मैं उनकी सिफारिश करूंगा। सावरकर जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ‘अगर मैंने जेल में हड़ताल की होती तो मुझसे भारत पत्र भेजने का अधिकार छीन लिया जाता।’ इसी बात को सावरकर के खिलाफ इस्तेमाल में लिया गया। वीर सावरकर एक चतुर क्रान्तिकारी थे। उनकी योजना थी कि देश की आजादी के लिए काम किया जाए। सावरकर इस पचड़े में नहीं पड़े कि उनके याचिका दायर करने पर लोग क्या कहेंगे। उनकी सोच ये थी कि अगर वह जेल के बाहर रहेंगे तो वह जो करना चाहेंगे, वह कर सकेंगे।

क्या है वामपन्थी नेताओं का मामला

कम्युनिस्ट नेता एसए डांगे ने साल 1924 में कारावास से रिहाई के बदले में ब्रिटिश ताज के प्रति अपनी अधीनता और वफादारी की प्रतिज्ञा के पत्र पर हस्ताक्षर किए। डांगे की 1924 में अंग्रेजों को दी दया याचिकाओं से पता चलता है कि कम्युनिस्ट अपने शुरुआती दिनों से ही अंग्रेजों के प्रति वफादार थे। भाकपा की स्थापना 1920 में हुई थी। देश की राजनीति में अपने पहले कदम के दौरान, भाकपा के आतंकित नेतृत्व ने कानपुर के ब्रिटिश जिला प्रशासन और गवर्नर जनरल को कानपुर में बोल्शेविक षड्यन्त्र मामले में उनकी संलिप्तता के लिए माफी वाले पत्र लिखे थे।

इसे भी पढ़ें: पंजाब में बम धमकियों का सिलसिला: हाईकोर्ट, स्कूल, सचिवालय पर खतरा, बांग्लादेश कनेक्शन और ISI की साजिश?

कानपुर के जिलाधिकारी को सम्बोधित पत्र में कामरेड श्रीपाद डांगे और नलिनी दास गुप्ता ने कहा कि ‘वो सरकार को कोई ऐसा और अपराध नहीं करने का वचन देने के लिए सहमत हैं, जिसके लिए उन्हें दोषी ठहराया गया है। वे सरकार से अनुरोध करते हैं कि उन्हें जल्द से जल्द रिहा किया जाए क्योंकि वे ऐसी पीड़ा झेल रहे हैं जिसे वे सहन नहीं कर सकते।’ उन्होंने पत्र में लिखा कि ‘हम व्यक्तिगत रूप से आपके आभारी होंगे यदि आप (कानपुर जिला प्रशासनिक अधिकारी) हमारी याचिका के लिए सरकार के साथ व्यवस्था करेंगे।’ वामपन्थी नेताओं एसए डांगे और नलिनी गुप्ता का कानपुर के जिलाधिकारी को लिखे शपथपत्र याद रखना जरूरी है, क्योंकि कि वामपन्थी अकसर राष्ट्रवादी नेता व महान क्रान्तिकारी वीर सावरकर को इसलिए गालियां बकते हैं क्योंकि उन्होंने इसी तरह की याचिका पर हस्ताक्षर किए थे।

सावरकर और कम्युनिस्टों के जेलों में अंतर

वीर सावरकर ने दशकों तक अण्डमान की सेलुलर जेल में असहय पीड़ा झेली। जबकि भारत में बोल्शेविक क्रान्ति में शामिल होने के लिए कम्युनिस्ट नेताओं को सामान्य जेल में ही डाला गया था। यह कथित क्रान्ति रूस में हुई थी। अंग्रेज सरकार की ओर से इस केस में वामपन्थी नेताओं पर ब्रिटिश भारत की सम्प्रभुता के खिलाफ विद्रोह करने का आरोप लगाया गया था। भारत के गवर्नर जनरल को सम्बोधित कर लिखे पत्र में डांगे ने बोल्शेविक षड्यन्त्र मामले में उनकी सजा को माफ करने की प्रार्थना की गई। फिर वे लिखते हैं- ‘यदि महामहिम (ब्रिटिश सम्राट्) यह सोचकर प्रसन्न होते हैं कि मुझे उस पद (प्रभावशाली कम्युनिस्ट नेता के रूप में) का उपयोग आपकी महामहिम सरकार और देश की भलाई के लिए करना चाहिए, तो मुझे ऐसा करने में खुशी होगी।’ उसके बाद वो लिखते हैं कि ‘कारावास ने भारत में ब्रिटिश सम्राट् की सम्प्रभुता के प्रति उसके दृष्टिकोण में एक स्वाभाविक परिवर्तन आया है। मैं महामहिम (ब्रिटिश सम्राट) को सूचित करना चाहता हूं कि मैं कभी भी अपने लेखन या भाषणों में महामहिम (ब्रिटिश सम्राट) के प्रति विश्वासघाती नहीं रहा हूं और न ही भविष्य में ऐसा करने का मेरा इरादा है।’ उसी पत्र के अन्त में हस्ताक्षर करते हैं और महामहिम के सबसे आज्ञाकारी सेवक के रूप में अपने को प्रस्तुत करते हैं।

पत्र कैसे आया प्रकाश में

ब्रिटिश सरकार को कामरेड एस.ए. डांगे के पत्र को पहली बार मुम्बई से प्रकाशित पत्रिका ‘द करण्ट’ द्वारा सार्वजनिक किया गया था, जिसने 1964 में इस पत्र को प्रकाशित किया। मामला उस समय प्रकाश में आया जब कम्युनिस्ट पार्टी में गृहयुद्ध का दौर चला और पार्टी का विभाजन हुआ। डांगे के विरोधियों ने पत्रों का फायदा उठाया और उन्हें नेतृत्व से हटाने और अंग्रेजों के साथ सहयोग करने की उनकी जांच करने की भी मांग की थी।

क्या है बोल्शेविक षड्यन्त्र?

कानपुर बोल्शेविक षड्यन्त्र का मामला ब्रिटिश भारत में 1924 में चला। साल 1922 में पेशावर के बाद, दो और षड्यन्त्र के मामले ब्रिटिश सरकार द्वारा सामने लाए गए-एक कानपुर (1924) और दूसरा मेरठ (1929)। मामलों में आरोपी थे वामपन्थी नेता एसवी घाटे, एसए डांगे, मुजफ्फर अहमद, नलिनी गुप्ता, रफीक अहमद और शौकत उस्मानी। 17 मार्च, 1924 को एसए डांगे, एमएन रॉय, मुजफ्फर अहमद, नलिनी गुप्ता, शौकत उस्मानी, सिंगारवेलु चेट्टियार, गुलाम हुसैन और दूसरों पर आरोप लगाया गया कि वे कम्युनिस्टों के रूप में हिंसक क्रान्ति द्वारा भारत को साम्राज्यवादी ब्रिटेन से पूरी तरह स्वतन्त्र करने, ब्रिटिश भारत के राजा की सम्प्रभुता को वञ्चित करने की कोशिश कर रहे थे। इन्होंने भारत में हिंसक के लिए कॉमिन्टर्न योजना के प्रति लोगों को प्रेरित किया। इस केस में सरकार ने सिंगारवेलु चेट्टियार को बीमारी के कारण छोड़ दिया गया था। एमएन रॉय देश से बाहर थे और इसलिए उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सका। गुलाम हुसैन ने स्वीकार किया कि उसे काबुल में रूसियों से पैसे मिले थे, उन्हें माफ कर दिया गया। पूरे केस में मुजफ्फर अहमद, गुप्ता, शौकत उस्मानी और डांगे को चार साल कैद की सजा सुनाई गई थी।

कौन हैं श्रीपाद अमृत डांगे?

श्रीपाद अमृत डांगे (10 अक्टूबर, 1899-22 मई, 1991) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य और भारतीय ट्रेड यूनियन आन्दोलन के एक दिग्गज नेता थे। ब्रिटिश राज के दौरान डांगे को ब्रिटिश अधिकारियों ने कम्युनिस्ट और ट्रेड यूनियन गतिविधियों के लिए गिरफ्तार किया था और कुल मिलाकर 13 साल की जेल हुई थी। देश की स्वतन्त्रता के बाद चीन-सोवियत मुद्दे, चीन के साथ युद्ध और डांगे प्रकरण के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन हो गया। पूरे प्रसंग के बाद अब कौन है जो वामपंथी बुद्धिजीवियों को दोमुंही कहने से अपने आप को रोक पाएगा ?

Topics: सेलुलर जेलसावरकर माफी याचिका सचएसए डांगे माफी याचिकाकानपुर बोल्शेविक षड्यंत्रveer savarkarSavarkar pardon petition truthवीर सावरकरSA Dange pardon petitionFreedom Struggleस्वतंत्रता संग्रामवामपंथी प्रचारLeftist PropagandaCellular Jail
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