2020 Delhi Riots : दिल्ली दंगों की कड़वी सच्चाई, हिंदू पीड़ितों की दर्दनाक आपबीती
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2020 Delhi Riots : दिल्ली दंगों की कड़वी सच्चाई, हिंदू पीड़ितों की दर्दनाक आपबीती

दिनेश कुमार खटीक सुबह अपने बच्चों के लिए दूध लेने निकले लेकिन लौट के घऱ न आ सके

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु'
Feb 25, 2026, 06:47 pm IST
inदिल्ली
दिल्ली दंगा 2020

दिल्ली दंगा 2020

फरवरी 2020 दिल्ली के लिए एक ऐसा महीना था जो इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज रहेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान CAA-NRC विरोध के नाम पर शुरू हुए प्रदर्शन धीरे-धीरे हिंसा में बदल गए। 23 से 26 फरवरी तक चले इन दंगों में 53 लोगों की जान गई। इनमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग शामिल थे, लेकिन कई कहानियां ऐसी हैं जो बताती हैं कि हिंसा ने धर्म के नाम पर निर्दोषों को निशाना बनाया।

यह कहानी उन हिंदू पीड़ितों की है जो रोजमर्रा की जिंदगी जी रहे थे-दूध लाने गए, ड्यूटी पर गए, घर से बाहर निकले- लेकिन उनकी एकमात्र ‘गलती’ उनकी हिंदू पहचान थी। वे सभी जाति-वर्ग के थे: दलित, सामान्य वर्ग, पुलिसकर्मी, नौजवान, बुजुर्ग। दंगे जाति देखकर नहीं हुए, बल्कि हिंदू होने के कारण हुए। ये कहानियां अफवाहों और झूठ के खिलाफ सच्चाई की आवाज हैं।

दिनेश कुमार खटीक: दूध की तलाश में खो गई जान

दिनेश कुमार खटीक, एक साधारण इलेक्ट्रिकल दुकान का सेल्समैन, सुबह अपने बच्चों के लिए दूध लेने निकला। घर के पास दुकान बंद थी, तो वह थोड़ा दूर चला गया। राजधानी पब्लिक स्कूल के पास पहुंचते ही गोली की आवाज गूंजी। दिनेश के सिर में गोली लगी और वहीं उसकी मौत हो गई। उसके भाई ने बाद में कहा, “पूरे मुस्तफाबाद ने मेरे भाई को मार डाला। यह जिहाद था।” दिनेश की गलती सिर्फ इतनी थी कि वह हिंदू था और गलत समय पर गलत जगह पहुंच गया। उसके परिवार को आज भी सवाल है—क्यों मारा गया एक बेगुनाह पिता?

अंकित शर्मा: आईबी अधिकारी की क्रूर हत्या

26 साल के अंकित शर्मा इंटेलिजेंस ब्यूरो में काम करते थे। 25 फरवरी को जब हिंसा चरम पर थी, अंकित ने सोचा कि उसके घर के बाहर लड़ रही भीड़ को शांत किया जा सकता है। वे जानते हैं, बात कर लेंगे। लेकिन भीड़ उन्हें घसीटकर ताहिर हुसैन की बिल्डिंग में ले गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, 6-7 लोगों ने 2-4 घंटे तक चाकुओं से उन्हें गोदा। पोस्टमॉर्टम में 400 से ज्यादा घाव मिले। उनका शव नाले में फेंका गया। अंकित की मां-बहन आज भी रोती हैं कि उनका बेटा/भाई सिर्फ इसलिए मारा गया क्योंकि वह हिंदू था और देश की सेवा कर रहा था।

दिलबर सिंह नेगी: जलते घर में जिंदा जला दिया

20 साल का दिलबर सिंह नेगी शिव विहार में मिठाई की दुकान पर काम करता था। 24 फरवरी शाम को हिंसा भड़की तो दंगाइयों ने उसे पकड़ लिया। तलवार से उसके अंग काटे गए, फिर जलते घर में फेंक दिया। उसकी जलकर राख हुई लाश की वीडियो वायरल हुई। दिलबर की शादी होने वाली थी, सपने थे। लेकिन उसकी पहचान हिंदू होने की वजह से सब कुछ खत्म हो गया। परिवार आज भी पूछता है—क्या अपराध था उसका?

रतन लाल: ड्यूटी पर गए, घर नहीं लौटे

दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतन लाल बुखार के बावजूद 24 फरवरी को गोकुलपुरी में ड्यूटी पर गए। उन्होंने परिवार को फोन कर दंगों के बारे में बताया। लेकिन वही दंगे उनकी जान ले ले गए। गोकुलपुरी में गोली लगी और वे शहीद हो गए। रतन लाल परिवार के इकलौते कमाने वाले थे। उनकी मां होली पर बेटे का इंतजार कर रही थीं, लेकिन बेटा कभी नहीं लौटा। एक पुलिसकर्मी जो कानून की रक्षा कर रहा था, कानून के नाम पर मारा गया।

आलोक तिवारी: खाना खाकर निकले, लौट न सके

आलोक तिवारी ने 26 फरवरी को खाना खाया और घर से बाहर निकले। बाहर माहौल शांत लग रहा था। लेकिन दंगाइयों ने पत्थर मारे। घायल आलोक को जीटीबी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन खून बहने से उनकी मौत हो गई। उनकी पत्नी को किसी और ने फोन किया। जब तक पहुंचीं, बहुत देर हो चुकी थी। आलोक की गलती? वह हिंदू था और अपने घर के पास निकल आया।

रोहित सोलंकी: शादी से पहले छिन गई जान

हरि सिंह सोलंकी का बेटा रोहित अप्रैल में शादी करने वाला था। निजी कंपनी में नौकरी करता था। लेकिन दंगाइयों की गोली ने उसे नहीं बख्शा। बाबूनगर, मुस्तफाबाद में गोली लगी और रोहित चला गया। परिवार के सपने चकनाचूर हो गए।

विनोद: ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे के बीच मारा गया

विनोद पर भीड़ ने हमला किया। ‘अल्लाहु अकबर’ और ‘नारा-ए-तकबीर’ के नारे लगाते हुए उसे मारा, बाइक जलाई। आसपास के हिंदुओं को धमकी दी गई कि रात भर लाशें मिलती रहेंगी। विनोद की मौत ने पूरे इलाके में दहशत फैला दी।

नितिन और विवेक: क्रूरता हद से पार हुई

नितिन घर के बाहर निकला तो गोली या पत्थर से घायल हो गया। अस्पताल में सिर की चोट से मौत। 19 साल के विवेक पर दुकान में हमला हुआ। दंगाइयों ने ड्रिल मशीन से उसके सिर में छेद कर दिया। डॉक्टर हैरान थे, लेकिन विवेक की जिंदगी बच गई—हालांकि घायल होकर।

अनूप सिंह और दिलीप: मरते-मरते बचे

अनूप सिंह को ताहिर हुसैन के गुंडों ने गोली मारी, लेकिन चमत्कार से बच गए। अस्पताल जाते वक्त भीड़ पत्थर फेंक रही थी। दिलीप अपनी दुकान में ताला लगाकर बैठे थे, लेकिन 40-50 दंगाइयों ने ताला तोड़ा, दुकान जलाई।

हिंदू कहां जाए?

ये कहानियां सिर्फ मौत की नहीं, बल्कि एक सवाल की हैं-हिंदू कहां जाए? पड़ोस में अल्पसंख्यक होने पर मारा जाता है, देश में बहुसंख्यक होने पर पीड़ित बनता है। दंगे जाति-वर्ग नहीं देखते, सिर्फ हिंदू पहचान देखते हैं। ये 53 मौतों में से कुछ हैं, जहां हिंदू पीड़ित थे। ये कहानियां बार-बार याद दिलाती हैं कि हिंसा का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन जब धर्म के नाम पर हो, तो निर्दोष सबसे ज्यादा दुख झेलते हैं। दिल्ली दंगों की ये सच्चाई भुलाई नहीं जा सकती।

 

Topics: उत्तर पूर्वी दिल्लीपाञ्चजन्य विशेषDelhi riots-2020दिल्ली दंगे 2020हेड कांस्टेबल रतन लालदिल्ली दंगे हिंदूआईबी अधिकारी अंकित शर्मा
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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